अगर तेलंगाना में विधानसभा चुनाव अपने तय समय पर होते तो इस नए राज्य के लोग लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए एक ही समय वोट डालते. लेकिन तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने समय से पहले ही विधानसभा भंग करके सबको हैरानी में डाल दिया. उनके इस निर्णय की वजह से समय से पहले ही तेलंगाना में सक्रिय दलों को चुनाव में उतरना पड़ा.

तेलंगाना में पहले चुनाव कराने को लेकर तेलंगाना की सत्ताधारी पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति के सर्वेसर्वा और मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव पर तरह-तरह के आरोप लग रहे हैं. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता जगत प्रकाश नड्डा यह कह रहे हैं कि राव ने नरेंद्र मोदी के प्रभाव से तेलंगाना विधानसभा चुनाव को बचाने के मकसद से पहले चुनाव कराने का निर्णय लिया. कांग्रेस और तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) भी इसे चंद्रशेखर राव की अवसरवादिता बता रहे हैं.

तेलंगाना के चुनावी मैदान में तीन खेमे स्पष्ट तौर पर दिख रहे हैं. पहला खेमा सत्ताधारी चंद्रशेखर राव की अगुवाई में तेलंगाना राष्ट्र समिति का है. इस खेमे की पहली ताकत यह है कि यह सत्ता में है. सत्ता में होने की वजह से चुनावों को लेकर कई व्यावहारिक फायदे होते हैं, जो इस दल को स्वाभाविक तौर पर मिलेंगे. चंद्रशेखर राव की दूसरी सबसे बड़ी ताकत यह है कि उन्हें लोग तेलंगाना को अलग राज्य बनवाने के अभियान से जोड़कर देखते हैं.

उनकी तीसरी सबसे बड़ी ताकत बतौर मुख्यमंत्री उनका किया गया काम है. कृषि के क्षेत्र में उनके काम की सराहना उनके विपक्षी भी करते हैं. चाहे वह काकतिया परियोजना के तहत सिंचाई व्यवस्था दुरुस्तर करने की बात हो या फिर रायतू बंधु योजना के तहत किसानों को प्रति एकड़ वार्षिक 8,000 रुपये की सरकारी आर्थिक मदद देने की योजना हो. जमीन के रिकाॅर्ड दुरुस्त करने में भी उनकी सरकार ने सराहनीय काम किया है. यही मुद्दे उनके चुनाव अभियानों में दिख रहे हैं और इन्हीं के आधार पर वे और उनके दल के नेता वोट मांग रहे हैं.

दूसरा खेमा कांग्रेस और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की अगुवाई वाली तेलुगु देशम पार्टी का है. पिछला चुनाव टीडीपी भाजपा के साथ मिलकर लड़ी थी. तेलंगाना पहले आंध्र प्रदेश का हिस्सा था, इसलिए स्वाभाविक ही है कि इस राज्य में भी टीडीपी का प्रभाव है. दरअसल, पिछले चुनावों में टीडीपी और कांग्रेस के मिले वोटों को जोड़ें तो यह टीआरएस से अधिक है. टीआरएस को 2014 के चुनावों में 34 फीसदी वोट मिले थे. वहीं कांग्रेस को 25 फीसदी और टीडीपी को 12 फीसदी वोट पड़े. इस अंकगणित की वजह से टीडीपी को यह लगता है कि अगर दोनों दल ठीक से चुनाव लड़ें तो वे चंद्रशेखर राव को सत्ता से बेदखल कर सकते हैं. इस गठबंधन ने अपनी स्थिति और मजबूत करने के लिए कुछ छोटे दलों को भी अपने साथ लाने की कोशिश की है.

वहीं तीसरा खेमा केंद्र की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी का है. जमीनी स्तर पर तेलंगाना में भाजपा की अब तक की चुनावी पूंजी कुछ खास नहीं है. लेकिन पार्टी को लगता है कि जिस तरह से नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा उन राज्यों में भी सत्ता में आई है जहां वह पारंपरिक तौर पर मजबूत नहीं थी, वैसे ही पार्टी तेलंगाना में भी कुछ कमाल कर सकती है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जैसे दूसरे राज्यों के विधानसभा चुनावों में खासे सक्रिय रहते हैं, वैसे ही वे तेलंगाना में भी सक्रिय हैं. लगातार उनकी सभाएं तेलंगाना में हो रही हैं. लेकिन ये सभाएं और केंद्र की सत्ता में काबिज होने की वजह से जमीनी स्तर पर हुआ संगठन विस्तार भाजपा को कितना चुनावी लाभ दिला पाएगा, इस बारे में कुछ अंदाजा लगा पाना मुश्किल हो रहा है.

ऐसे में तेलंगाना की चुनावी स्थिति यह बनती नजर आ रही है कि जिस भरोसे के साथ चंद्रशेखर राव ने अपने कैबिनेट सहयोगियों की राय के खिलाफ जाते हुए जल्दी विधानसभा चुनाव कराने का फैसला किया था, वह दांव अनिश्चितताओं में घिर गया है. 119 सीटों वाली विधानसभा में 100 सीटें हासिल करने का दावा करने वाले चंद्रशेखर राव के लिए अब बहुमत की डगर उतनी आसान नहीं दिख रही. इस स्थिति को पैदा करने में कांग्रेस और टीडीपी गठबंधन की अहम भूमिका है. इस गठबंधन के पक्ष में एक तरफ 2014 का अंकगणित है तो दूसरी तरफ इसने अपने साथ तेलंगाना जन समिति और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को भी अपने साथ जोड़कर इस गठबंधन की संभावनाओं को मजबूत करने का काम किया है.

हालांकि, चंद्रशेखर राव की अपनी ताकत भी है, जो उन्हें अब भी सबसे मजबूत दावेदार बनाए हुए है. इसकी वजह यह है कि एक तरफ चंद्रशेखर राव का चेहरा है तो दूसरी ओर न तो कांग्रेस-टीडीपी गठबंधन ने यह स्पष्ट किया है कि उनका मुख्यमंत्री का उम्मीदवार कौन है और न ही भाजपा ने. एजेंडे के स्तर पर भी चंद्रशेखर राव दूसरे दलों पर भारी पड़ते दिख रहे हैं. उनके पास तेलंगाना आंदोलन की पृष्ठभूमि और बतौर मुख्यमंत्री किया गया काम है. दूसरी तरफ कांग्रेस-टीडीपी और भाजपा के पास घोषणाओं के अलावा कुछ खास नहीं दिख रहा.