उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर का नाम बदल कर प्रयागराज किया जाना भारत ही नहीं दुनिया भर में चर्चा बटोर रहा है. अंतरराष्ट्रीय मीडिया में राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार के इस फ़ैसले को ‘हिंदूवादी’ क़दम बताया गया है. वहीं, सरकार का दावा है कि इलाहाबाद के लोगों और साधु-संतों की इच्छा पर ही शहर को उसका ‘ऐतिहासिक’ नाम वापस लौटाया गया है.

उधर, मीडिया का एक हिस्सा भी इस फ़ैसले को सही साबित करने की कोशिश करता दिखता है. कई समाचार चैनलों और वेब मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ इलाहाबाद से पहले इस शहर का नाम प्रयागराज ही था. कहा जा रहा है कि सन् 1583 में मुग़ल शहंशाह अकबर ने यहां क़िला बना कर शहर का नाम ‘इलाहाबास’ (अल्लाह का शहर या घर) रखा. बाद में अंग्रेज़ों ने इसे रोमन में ‘अलाहाबाद’ लिखा जो आगे चल कर इलाहाबाद हो गया. कई मानते हैं कि वर्तमान सत्ता की विचारधारा और उसके समर्थकों द्वारा फिर यही साबित करने की कोशिश की जा रही है कि ‘आक्रमणकारी मुसलमानों (यानी मुग़ल) के राज में हिंदू धर्म, संस्कृति और विरासत का नाश हुआ जिसे अब बहाल किया जा रहा है’.

लेकिन क्या इलाहाबाद के लोग भी यही सोचते हैं? क्या वाकई इलाहाबाद का नाम आक्रांताओं की विरासत है? सत्याग्रह ने कुछ इलाहाबादियों से ही बात कर इन सवालों के जवाब टटोलने की कोशिश की.

‘इलाहाबाद, प्रयागराज नहीं हो पाएगा’

इलाहाबादियों से चर्चा में यह बात मज़बूती से निकल कर आती है कि यह कदम सांप्रदायिक विचारधारा से प्रेरित है जो इलाहाबाद को कभी ‘प्रयागराज’ नहीं बना पाएगा. समकालीन जनमत पत्रिका के संपादक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता केके पांडेय इलाहाबाद में ही रहते हैं. योगी सरकार के फ़ैसले पर वे न सिर्फ़ दुख जताते हैं, बल्कि उन्हें इसकी सफलता पर भी संदेह है. सत्याग्रह से बातचीत में वे कहते हैं, ‘यह बहुत ख़राब हुआ है और दुखद है. प्रतीकों की राजनीति में ऐसा कर दें तो शहर न होकर यह एक तीर्थ हो जाएगा. इलाहाबाद ऐतिहासिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण जगह है. संगम के आसपास के हिस्से को पहले भी प्रयागराज कहा जाता था और अभी भी कहा जाता है. यहां इस नाम से रेलवे स्टेशन भी है, मोहल्ला भी है. लेकिन उस इलाक़े के आगे जो इस शहर का नक़्शा है वह मुग़ल काल में विकसित हुआ. बाद में अंग्रेज़ आते हैं और सिविल लाइन का हिस्सा डेवलप होता है. जैसे सरकारी इमारतें, विश्वविद्यालय, हाई कोर्ट और बाक़ी चीज़ें हैं.’

यह पूछने पर कि क्या इलाहाबाद के जनमानस में शहर का नाम बदलने की इच्छा थी केके पांडेय कहते हैं, ‘यहां ऐसा कोई जनांदोलन नहीं था. ऐसे में पूरे शहर का नाम प्रयागराज करने का कोई औचित्य नहीं था. दूसरा यह कि जब आप एक शहर का नाम बदलते हैं तो उसके साथ बहुत सारी चीज़ें बदलती हैं. आप न सिर्फ जनता के पैसे को ग़ैर-ज़रूरी तरीक़े से बर्बाद कर रहे हैं बल्कि एक पूरे शहर की संस्कृति ख़त्म कर रहे हैं.’

केके पांडेय के मुताबिक़ इलाहाबाद के लोग ‘प्रयागराज’ को नहीं अपना पाएंगे. वे बताते हैं, ‘20 साल पहले यहां कुछ मोहल्लों के नाम बदले गए थे. जैसे एक मोहल्ला है अल्लाहपुर. बरसों पहले उसका नाम बदल कर भारद्वाजपुरम कर दिया गया था. सरकारी काग़ज़ पर वह भारद्वाजपुरम है. लेकिन आप यहां किसी आदमी से पूछ लीजिए कि भारद्वाजपुरम कहां है, वह नहीं बता पाएगा. मैं जहां रहता हूं उस इलाक़े का नाम लुकरगंज है. इसका नाम कई साल पहले संत झूलेलाल नगर कर दिया गया. लेकिन आज कोई नहीं जानता कि झूलेलाल नगर कहां है. तो अब कोई कहेगा कि प्रयागराज जाएंगे?’ यह बात कहते हुए केके पांडेय हंस पड़ते हैं.

‘नाम बदलने वालों को अपने अतीत का भी ज्ञान नहीं’

योगी सरकार के इस क़दम को लेकर इलाहाबादियों की राय में नकारात्मकता का भाव भी साफ़ देखने को मिलता है. वरिष्ठ पत्रकार और इतिहास के विद्यार्थी रहे अखिलेश कुमार इलाहाबाद के झूंसी इलाक़े से आते हैं. वे भाजपानीत राज्य सरकार के फ़ैसले और उसकी दलीलों की तीखी आलोचना करते हुए कहते हैं, ‘ये अपने अतीत के बारे में भी अज्ञानी ही हैं. न तो इन्हें पढ़ाई-लिखाई से कोई लेना-देना है और न ही ये उन ऋषि-मुनियों का सम्मान करते हैं जिन्होंने किसी भी स्थिति में रहते हुए सनातन परंपरा का निर्माण किया और उसकी मिसाल क़ायम की.’

वे आगे कहते हैं, ‘ये हिंदू पौराणिक विषयों के भी जानकार नहीं हैं. हक़ीक़त यह है कि इलाहाबाद का नाम दीन-ए-इलाही के नाम पर नहीं रखा गया. दरअसल मनु की पुत्री का नाम इला था जिन्हें पुराणों में देवी माना जाता है. झूंसी जहां से मैं आता हूं वहां वे पैदा हुई थीं. देवी इला के नाम पर ही इलाहाबाद का नाम ‘इलावास’ पड़ा था.’

अखिलेश के मुताबिक प्राचीन ग्रंथों में यह कहीं नहीं मिलता कि पूरे इलाहाबाद का नाम पहले प्रयागराज था. उन्होंने कहा, ‘पुराणों में प्रयाग का ज़िक्र है लेकिन, ऐतिहासिक संदर्भों में देखा जाए तो जैसे छठी शताब्दी ईसा पूर्व में जो महाजनपद होते थे, उसमें भी प्रयाग नाम का कोई जनपद नहीं था. वत्स जो एक महाजनपद था, उसकी राजधानी कौशांबी थी जो इसके (प्रयाग) बग़ल का ही इलाक़ा है.’

हमने अखिलेश से इस मुद्दे को लेकर हो रही मीडिया रिपोर्टिंग पर भी बात की. उन्होंने कहा, ‘मीडिया भी कितना बेचारा है. एक तो अकबर ने इलाहाबाद नाम नहीं रखा था, बल्कि जहांगीर ने इसे यह नाम दिया था. उससे पहले वह इलावास के नाम से जाना जाता था. अबुल फ़ज़्ल इब्न मुबारक ने अकबरनामा के तीसरे खंड ‘आइन-ए-अकबरी’ में अकबर के प्रशासनिक कार्यों का उल्लेख किया है. उसमें कहीं नहीं लिखा कि इलाहाबाद नाम रखा गया. जानकारी के लिहाज़ से इतिहास ही नहीं अपने धार्मिक साहित्य के संदर्भ में भी शून्यता की स्थिति है.’

‘यह सांप्रदायिक राजनीति के कारण हुआ है’

इलाहाबाद के जानकार निवासी यह भी कहते हैं कि इलाहाबाद का नाम प्रयागराज किया जाना ग़लत अवधारणा से ज़्यादा सांप्रदायिक राजनीति का नतीजा है. इलाहाबाद हाई कोर्ट के वकील केके राय कहते हैं, ‘नाम ग़लत अवधारणा की वजह से नहीं बदला गया. यह सब सांप्रदायिक राजनीति के कारण हुआ है. औरंगज़ेब रोड को एपीजे अब्दुल कलाम रोड कर रहे हैं. ये सब मुग़ल इतिहास को छिन्न-भिन्न करने के लिए किया जा रहा है, ताकि मुसलमान को (बहुसंख्यकों से) विखंडित कर दिया जाए. लेकिन इलाहाबाद का आदमी इसे नहीं मानता. वह प्रयाग को मानता है लेकिन इलाहाबाद की परंपरा से ख़ुद को जोड़ कर रखता है. यह मुसलमान का मसला है ही नहीं. यह इलाहाबादियों का मसला है, राष्ट्रवादी-धर्मनिरपेक्ष ताक़तों का मसला है.’

केके पांडेय और अखिलेश कुमार की तरह केके राय भी कहते हैं कि इलाहाबाद के लोगों ने ऐसी कोई मांग नहीं की कि शहर का नाम बदल दिया जाए. वे बताते हैं, ‘किसी ने यह ज़रूरत महसूस नहीं की कि शहर का नाम बदलना चाहिए. हर शहर का अपना एक व्यक्तित्व होता है अपनी एक विरासत होती है. हमारे संविधान के अनुच्छेद 51 में भी है कि आपकी विरासत और आपके कल्चर के साथ छेड़छाड़ नहीं होना चाहिए.’

वे आगे कहते हैं, ‘जहां गंगा और यमुना मिलती हैं वह और उसके आसपास का इलाक़ा प्रयाग ही है. जो बसाया गया उसका नाम इलाहाबाद ही है. कौशांबी में शिलालेख मौजूद है. उसमें लिखा है कि यह बहुत समृद्ध व्यापारिक केंद्र था. यहां 16 महाजनपद थे. उसी में से एक था कौशांबी. रामायण में भी यह ज़िक्र नहीं है कि प्रयाग के वासी राम को घेरे बैठे हैं. वह तो वन वाला इलाक़ा था. रामायण में ऋषि भारद्वाज के आश्रम का ज़िक्र है जिससे राम अपने वनवास के दौरान होकर गए थे. आश्रम वनों में बनाए जाते थे.’

भाजपा समर्थक इलाहाबादी भी हैरान

इलाहाबाद में ही रहने वालीं और पेशे से अध्यापिका चारु लेखा कहती हैं कि इलाहाबाद में प्रयाग नाम से पहले से बहुत कुछ है, जैसे प्रयाग स्टेशन और घाट. इससे अलग वे इलाहाबाद के इलाक़ों के नामों को लेकर ध्यान खींचती हैं. चारु कहती हैं, ‘नाम ऐसे नहीं बदलते. उनके साथ पूरा इतिहास और कल्चर होता है. इलाहाबाद के आसपास ज़्यादातर क़स्बों के नाम ‘सराय’ से हैं. इतने हैं कि स्कूल जाते समय हमें याद भी नहीं रहते. सराय (मुसाफ़िरख़ाना) मुग़लों के समय बनते थे. ये यात्रियों के ठहरने के स्थान होते थे. अब इन नामों का आप क्या करेंगे?’

वे आगे जोड़ती हैं, ‘अल्लाहपुर को तो कोई भारद्वाजपुरम नहीं कह रहा, अल्लाहपुर ही चल रहा है. अब अल्लाह मूल रूप से अरबी है और पुर हिंदी. अलीगढ़ में अली उर्दू है और गढ़ हिंदी. आप क्या-क्या बदलेंगे? गंज उर्दू का शब्द है उसके साथ हिंदी नाम जुड़े हुए हैं, जैसे गोपीगंज इलाक़ा है. पहले लोगों को चीज़ों को (धर्म के आधार पर) अलग-अलग करना याद नहीं रहता था, सो ‘गढ़’ जोड़ दिया, ‘पुर’ जोड़ दिया. कोई भी नाम हो जाता था. अब ये लोग अलग कर रहे हैं.’

चारु लेखा का भी मानना है कि इलाहाबाद का समाज योगी सरकार के इस क़दम को स्वीकार नहीं कर पाएगा. वे कहती हैं, ‘वे भी स्वीकार नहीं कर पाएंगे जो भाजपा और दक्षिणपंथ के समर्थक हैं. उन्हें इससे झटका लगा है क्योंकि यह नाम उनके भी बचपन से जुड़ा हुआ है. हां, सत्ताधारी पक्ष के कट्टर समर्थकों को यह अच्छा लग सकता है लेकिन, जो आम लोग हैं उनके लिए यह हैरान करने वाला है.