ईस्ट-इंडिया कंपनी के राजनयिक रहे कर्नल जेम्स टॉड (1829) ने अपनी किताब ‘एनल्स एंड एंटीक्विटीज़ ऑफ राजस्थान’ में लिखा है, ‘राजपूतों के बिना हिंदुस्तान के इतिहास की कल्पना नहीं की जा सकती.’ यदि राजस्थान की राजनीति के संदर्भ में देखें तो यह बात इतिहास ही नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी सटीक नज़र आती है.

1952 में पहले आम चुनाव के बाद से ही राजस्थान की लोकतांत्रिक राजनीति का ताना-बाना राजपूतों के इर्द-गिर्द बुना जाता रहा है. इस समुदाय का प्रभाव ही था जिसने राजशाही के मुखर विरोधी प्रजामंडल आंदोलन के प्रमुख नेता जयनारायण व्यास को भी जसवंत सिंह (दाउदसर) जैसे जागीरदारों को कांग्रेस में शामिल करने की पैरवी के लिए मजबूर कर दिया था. प्रदेश की राजनीति में राजपूतों के निर्णायक होने का जो सिलसिला जोधपुर के पूर्व महाराज हनवंत सिंह के साथ शुरु हुआ था वह पूर्व मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत से लेकर खुद को राजपूत बेटी कहने वाली मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और हाल ही में भाजपा से बाग़ी होकर कांग्रेस में शामिल हुए मानवेंद्र सिंह तक बरकरार है.

बीते दो साल में कुछ राजपूत संगठनों ने फिल्म पद्मावत और कुख्यात अपराधी आनंदपाल के एनकाउंटर की जांच को लेकर जिस तरह उत्पात मचाया, उसने इस समुदाय की उसी सामंतवादी छवि को पुष्ट करने का काम किया जिसे साहित्य और सिनेमा ‘ठाकुर दुर्जन सिंह या शैतान सिंह’ जैसे किरदारों के रूप में गढ़ता रहा है. यह पूरा घटनाक्रम अपने पीछे कुछ बड़े सवालों की भरपूर गुंजाइश भी छोड़ता दिखता है. जैसे- क्या राजस्थान के सभी राजपूत इतने ही सामंतवादी हैं? यदि हां, तो फिर क्यों राजस्थान की जनता उन्हें लोकतंत्र के कई दशक बाद भी चुनाव दर चुनाव मजबूत करती जा रही है?

राजस्थान विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ा है. मौजूदा विधानसभा की बात करें तो यहां 200 में से सर्वाधिक 26 विधायक राजपूत जाति से ही आते हैं. प्रदेश से लोकसभा जाने वाले कुल 25 सांसदों में से भी चार इसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. विभिन्न स्रोतों से जुटाए गए आंकड़े बताते हैं कि सूबे की करीब 120 विधानसभा सीटों पर राजपूत प्रत्याशी अलग-अलग चुनावों में अपना परचम लहराने में सफल रहे हैं.

ऐसा नहीं है कि राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस राजपूत प्रत्याशियों को तुलनात्मक तौर पर ज्यादा मौके देती हैं. सूबे में दोनों दल मिलाकर 400 में से करीब 40 टिकट राजपूतों के नाम करते हैं. राज्य में सिर्फ तीन- शेरगढ़ (जोधपुर), कोलायत (बीकानेर) और विद्याधरनगर (जयपुर) विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां इस समुदाय के प्रत्याशी आमने-सामने ताल ठोकते हैं. यानी राजस्थान में राजपूत विधायकों के जीतने की तय संख्या सिर्फ तीन है जो इस कौम के प्रतिद्वंदी माने जाने वाले जाट समुदाय की औसतन संख्या अठारह से काफी कम है.

राजस्थान की तरह उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की राजनीति में भी राजपूतों का जबरदस्त वर्चस्व है. लेकिन राजस्थान के मामले में यह बात इसलिए दिलचस्प हो जाती है कि दूसरे प्रदेशों की तुलना में यहां राजपूत आबादी (अनुमानित पांच से छह फीसदी) ना कुछ के बराबर है. साथ ही इस समुदाय के पूरे प्रदेश में बिखरे हुए होने की वजह से इक्का-दुक्का ही विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां सिर्फ अपनी ही जाति के बूते कोई राजपूत प्रत्याशी जीत पाने का दम भर सके.

तो फिर राजस्थान की राजनीति में राजपूतों का इतना असर क्यों है. वरिष्ठ समाजशास्त्री राजीव गुप्ता कहते हैं, ‘सदियों तक शासन करने की वजह से राजपूतों के प्रति लोगों के जेहन में निष्ठा, भय, धर्म, संस्कृति और सम्मान का मिला जुला भाव प्रकट होता है. यह इनके पक्ष में सकारात्मक माहौल तैयार करता है.’ वहीं वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ बताते हैं, ‘खुद को लेकर प्रबल आग्रह रखने वाले समुदायों या जातियों की छवि अतिवादी के तौर पर स्थापित हो जाती है. लेकिन राजस्थान में राजपूत खुद को अपेक्षाकृत सौहार्दप्रिय के तौर पर स्थापित करने में सफल रहे हैं. बारेठ के शब्दों में ‘दूसरे प्रदेशों की तरह राजस्थान के कुछ इलाकों में भी इस कौम से जुड़े लोग अराजकता फैलाते रहे हैं. लेकिन फिर भी सूबे में बड़े स्तर पर इसकी सामाजिक स्थिति सम्मानजनक है.’

राजस्थान में राजपूतों के अलावा गुर्जर, मीणा, जाट और कुछ इलाकों में यादव समुदाय ‘दबंग’ माने जाते हैं. आबादी के लिहाज से सूबे में इनमें से शुरुआती तीन की संख्या राजपूतों से डेढ़ से दोगुनी या उससे भी ज्यादा बताई जाती है. जमीन से जुड़े राजनीतिकारों के मुताबिक जिन इलाकों में दबंग समुदायों की बहुलता होती है वहां के दूसरे निवासियों के मन में एक आशंका का भाव हमेशा महसूस किया जा सकता है. लेकिन राजपूतों के मामले में ऐसा नहीं है. इसलिए ऐसे क्षेत्रों से जब कोई एक दल किसी अन्य प्रभावशाली समुदाय के प्रत्याशी को आगे करता है और दूसरा राजपूत को, तो अन्य जातियों के मतदाताओं में स्वभाविक तौर पर राजपूत प्रत्याशी के साथ जाने की प्रवृत्ति देखी जाती रही है. प्रदेश भाजपा के कद्दावर नेता राजेंद्र राठोड़ (चूरू) को इसके सबसे बड़े उदहारण के तौर पर देखा जा सकता है. इसके अलावा शाहपुरा, सवाईमाधोपुर और बीकानेर सीटें भी इसी श्रेणी में रखी जाती हैं जहां आबादी में कम होने के बावजूद राजपूत प्रत्याशी जीत हासिल करने में सफल रहे हैं.

राजस्थान की राजनीति पर लंबे समय से नज़र रखने वाले शास्त्री कौशलेंद्र दास का मानना है कि मध्यकाल के पहले से ही समाज की कई जातियां जैसे- ब्राह्मण, वैश्य, राजपुरोहित, चारण, प्रजापत और सैन, राजपूतों से जो जुड़ाव महसूस करती थीं वह कहीं न कहीं आज भी मौजूद है. वे कहते हैं, ‘इसलिए जब नेतृत्व के चयन की बारी आती है तो ये सभी राजपूत को आगे करना पसंद करते हैं.’

सिर्फ इन्हीं कुछ जातियों में नहीं बल्कि राजस्थान में दलित, जनजाति और अल्पसंख्यकों के बीच भी राजपूतों को लेकर अपेक्षाकृत अधिक भरोसा महसूस किया जा सकता है. जोधपुर और पटना विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके श्याम लाल जेदिया अपनी किताब ‘एन अनटोल्ड स्टोरी ऑफ भंगी वाइस चांसलर’ में लिखते हैं, ‘राजपूत समाज से शिकायतों की शक्ल में एक लंबा साहित्य मौजूद है जो कई मायनों में सही भी है. लेकिन अपने शोध (खासतौर पर मारवाड़ के संदर्भ में) में मैंने जाना कि इस समुदाय ने दलितों के हित में कई काम भी किए जिसे लेकर कभी इसकी तारीफ नहीं हुई. लेकिन जमीन पर आज भी उसका प्रभाव महसूस किया जा सकता है.’ इस बात के उदहारण के तौर पर जेदिया जोधपुर महाराज उम्मेद सिंह द्वारा अतिदलित विद्यार्थियों के लिए न सिर्फ पाठशालाएं खुलवाने बल्कि उच्च शिक्षण संस्थानों में उनके दाखिले के लिए सीधे हस्तक्षेप करने और झालावाड़ के महाराज द्वारा दलितों को मंदिरों में प्रवेश करवाने जैसे कई उदाहरण गिनवाते हैं.

अपनी किताब में जेदिया इस बात का भी ज़िक्र करते हैं कि मारवाड़ राजघराने ने हरिजन समाज के कुछ लोगों को कूचबंधिया, सांसी और साठिया जैसे कुछ समुदायों के विवादों में न्याय करने का अधिकार भी सौंपा था. ‘मेहतर सा’ नाम से संबोधित किए जाने वाले ये पंच दोषी को आर्थिक दंड से लेकर कारावास तक की सजा सुनाने के लिए अधिकृत थे. अपने शोध के आधार पर जेदिया का कहना है, ‘छप्पनियां अकाल की महात्रासदी के वक़्त जब दानों के लाले थे तब भी राजपूत परिवार हर हाल में मेहतरानी के खाने का इंतजाम करना अपनी जिम्मेदारी समझते थे. इसी के चलते उस दौरान अन्य जातियों के लोगों के हरिजन बन जाने का भी ज़िक्र मिलता है.’ दलित-सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी विभिन्न शोधपत्रों के आधार पर हमें बताते हैं कि प्रदेश में दलितों पर अत्याचार करने में अन्य पिछड़ा वर्ग सबसे आगे है जबकि राजपूत समेत सामान्य वर्ग इस मामले में कहीं पीछे दिखता है.

राजस्थान की जनजातियों के बीच भी राजपूतों के प्रति एक सकारात्मक भाव महसूस किया जा सकता है. इतिहासकार महाराणा प्रताप के दौर से ही भील और गाड़िया-लोहार समुदायों के बीच राजपूतों के प्रति सद्भाव का ज़िक्र करते हैं. यदि राजस्थान में करीब 11 फीसदी आबादी वाले मुस्लिम समुदाय की बात करें तो यहां भी राजपूतों के प्रति अपेक्षाकृत ज्यादा सहजता देखी जा सकती है. 1527 में राणा सांगा के साथ मिलकर बाबर के खिलाफ जंग लड़ने वाले हसन खां मेवाती, 1576 में राणा प्रताप के सिपहसालार हाकिम खां सूरी और कुछ घरानों द्वारा मुग़लों के साथ रोटी-बेटी के संबंध जैसी ऐतिहासिक घटनाओं की वजह से भी अल्पसंख्यक राजपूतों से कहीं न कहीं नजदीकी महसूस करते हैं.

राजनीति शास्त्र के विद्यार्थियों के लिए जाट बहुल नागौर जिले की डीडवाना सीट शोध का विषय हो सकती है जहां राजपूतों के समर्थन से प्रदेश भाजपा के दिग्गज नेता और कैबिनेट मंत्री यूनुस खान अपना परचम लहराने में तीन बार सफल रहे हैं. सूबे के शेखावाटी इलाके में कायमखानी मुसलमानों के न सिर्फ रस्म-ओ-रिवाज़ बल्कि कुछ गोत्र तक राजपूतों से मिलते हैं. पश्चिमी राजस्थान के कई मुसलमान परिवारों में राजपूतों की ही तरह रिश्तेदारों के नाम के साथ ‘सा’ संबोधन इस्तेमाल किया जाता है. मुस्लिम जमात ‘ऑल इंडिया मिली काउंसिल’ के स्टेट सेक्रेटरी अब्दुल लतीफ आर्को इस बारे में कहते हैं, ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आने के बावजूद राजपूतों में दूसरी जातियों की तुलना में मुस्लिमों के प्रति नफ़रत का भाव कम देखने को मिलता है.’

एक मुस्लिम शादी का दावतनामा | क्रेडिट - परवेज़ खान
एक मुस्लिम शादी का दावतनामा | क्रेडिट - परवेज़ खान

राजपूतों की अपनी सामाजिक व्यवस्था भी उनकी स्वीकार्यता को प्रदेश भर में व्यापक बनाती है. दरअसल रजवाड़ों के दौर में किसी एक रियासत या उसके आस-पास की रियासतों में एक ही गोत्र के राजपूतों के निवास करने की वजह से उनके आपसी विवाह-संबंधों को वर्जित माना जाता था. समझने के लिए यदि चौहान वंश की बात करें तो अजमेर से निकले इस गोत्र के राजपूत सवाई माधोपुर, जालौर, सिरोही, कोटा, बूंदी और झालावाड़ तक फैले हैं. नतीजतन चौहान राजपूत परिवार द्वारा अपने बेटे या बेटी की शादी के लिए इन जिलों को छोड़ने की पूरी संभावना रहती है. ऐसे में आम से आम राजपूत परिवार का दायरा भी कई जिलों में फैला रहता है.

शायद यही कारण है कि राजस्थान के एक छोर पर स्थित बीकानेर से आने वाले राजपूत नेता देवीसिंह भाटी बिना किसी संगठन की मदद के ही दूसरे सिरे पर स्थित कोटा में सहजता से हजारों की सभा कर आते थे. ऐसी ही कुछ स्थिति कल्याण सिंह कालवी की भी बताई जाती थी. लेकिन प्रदेश के दूसरे किसी समुदाय के नेता के लिए ऐसा करना टेढ़ी खीर है. उदाहरण के लिए समझें तो पश्चिम राजस्थान से आने वाले दिग्गज जाट नेता हनुमान बेनीवाल के लिए जाट रियासत रह चुके भरतपुर में ही मानो ‘नो-एंट्री’ का बोर्ड लगा है. वहीं सूबे की मीणा राजनीति के सिरमौर किरोड़ीलाल मीणा की अदिवासी बहुल दक्षिण राजस्थान में कुछ खास पकड़ नहीं बताई जाती.

अब रहा सवाल राजपूत समाज के अतिवादी संगठनों का जो हमने ऊपर छोड़ा था, तो इस बारे में सामाजिक कार्यकर्ता यशवर्धन सिंह शेखावत बताते हैं, ‘कट्टर राजपूत संगठनों को देखकर सभी राजपूतों का आकलन करना ठीक वैसा ही है जैसे बजरंग दल को आधार मान हिंदुओं की छवि गढ़ना’. क्षत्रिय युवक संघ नाम के एक संगठन के वरिष्ठ सदस्य महावीर सिंह सरवड़ी का कहना है, ‘जब राजपूतों की आन के नाम पर मॉल जलाए गए या बच्चों की बस पर पत्थर फेंके गए, हम जैसे लोग शर्म से गड़े जा रहे थे.’ वहीं वरिष्ठ पत्रकार श्रीपाल शक्तावत की राय है कि जातिवादी संगठन भावुक मुद्दों की आड़ में सिर्फ अपना हित साधते हैं, उन्हें समाज के हितों से कोई सरोकार नहीं होता. उनके मुताबिक आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग ऐसे संगठनों की शक्ल में चंदे का धंधा करते हैं.

यहां आप पूछ सकते हैं कि राजपूतों का यह बुद्धिजीवी वर्ग तब कहां था जब न सिर्फ राजस्थान बल्कि अन्य राज्यों के भी हालात राजपूत प्रदर्शनकारियों की वजह से लगातार बदतर होते जा रहे थे. इसके जवाब के तौर पर शक्तावत कड़ी नाराजगी ज़ाहिर करते हुए कहते हैं कि उस समय मुख्यधारा का मीडिया उन ही राजपूत नेताओं को ज्यादा से ज्यादा सामने लेकर आई जिन्होंने इस आग में सिर्फ घी डालने का काम किया. वे कहते हैं, ‘इस वजह से समुदाय का एक हिस्सा भ्रमित और उग्र होकर अपनी प्रतिष्ठा पर बट्टा लगवा बैठा.’

हालांकि पिछले कुछ दिनों में इस समुदाय द्वारा अपने नाम पर स्थापित कट्टरवादी संगठनों की अंदरखाने मुखालफत की ख़बरें सुनने को मिली हैं. पहले मानवेंद्र सिंह की स्वाभिमान रैली में ‘श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना’ के संस्थापक सुखदेव सिंह गोगामेड़ी को मंच पर जगह न मिलने और बीते दिनों ‘श्री राजपूत करणी सेना’ के संरक्षक लोकेंद्र सिंह कालवी की जयपुर में आयोजित हुंकार रैली में आयोजकों से भी कम भीड़ जुटने को इसकी बानगी के तौर पर देखा जा सकता है.

श्री राजपूत करणी सेना की हुंकार रैली में खाली पड़ी कुर्सियां|फोटो - पुलकित भारद्वाज
श्री राजपूत करणी सेना की हुंकार रैली में खाली पड़ी कुर्सियां|फोटो - पुलकित भारद्वाज

चलते-चलते हम ‘दुर्जन सिंह’ और ‘शैतान सिंह’ जैसे राजपूत नामों की भी चर्चा कर लेते हैं. दरअसल राजस्थान के ग्रामीण अंचल में शादी के कई वर्षों के बाद या फिर कई बेटियों के बाद पैदा हुए बेटे को बुरी नजर से बचाने के लिए उसका बेतुका या नकारात्मक भाव वाला नाम रखने की मान्यता रही है. इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि बचपन में बुरी नज़र से बचाने के लिए रखे गए ये नाम ही राजपूतों की बुरी छवि गढ़ने का आधार बन गए.