21 साल के इरफ़ान मीर देख नहीं सकते. अपनी जिंदगी के पहले लगभग 16 साल इधर-उधर घूमने के लिए वे किसी न किसी पर निर्भर रहते थे. उनकी जिंदगी ने तब एक नया रुख लिया जब उन्होंने तीन महीने की एक वर्कशॉप के बाद स्मार्ट फ़ोन इस्तेमाल करना सीख लिया. इसने उन्हें आत्मनिर्भर बना दिया. अब इरफ़ान आज़ाद थे. वे किसी के साथ के बिना भी घूम-फिर सकते थे.

लेकिन बिना इंटरनेट के स्मार्टफोन एक डिब्बा है, जो आपके हाथ में तो है लेकिन किसी काम का नहीं. कश्मीर घाटी में आये दिन सरकार इंटरनेट पर बैन लगा देती है और हर बार इरफ़ान की यह आज़ादी उनसे छिन जाती है.

दक्षिण कश्मीर के पुलवामा ज़िले में रहने वाले इरफ़ान बताते हैं, ‘गूगल मैप्स, वाट्सएप और नेत्रहीन लोगों के लिए तैयार की गईं अनगिनत मोबाइल एप्स ने हमारी जिंदगी आसान बना तो दी, लेकिन कश्मीर में इंटरनेट पर लगने वाले बैन हमें हमारी विकलांगता का एहसास भरपूर तौर से दिलाते रहते हैं.’

पुलवामा ज़िले में लगभग 15 दिन के इंटरनेट बैन के बाद 18 अक्टूबर को 2जी सेवाएं बहाल कर दी गईं. लेकिन लोगों के मुताबिक 4जी के इस दौर में यह इंटरनेट न होने जैसा ही है. पुलवामा में स्थित फोटो पत्रकार यूनिस ख़ालिक़ सत्याग्रह को बताते हैं, ‘2जी बहाल करना मज़ाक से ज़्यादा कुछ भी नहीं है, कम से कम मेरे लिए. क्योंकि मुझे अभी भी अपने दिन भर का काम ऑफिस मेल करने के लिए 10 किलोमीटर दूर ही जाना पड़ रहा है.’

कश्मीर घाटी में इंटरनेट पर प्रतिबंध का सिलसिला-जो सरकार की मानें तो कानून एवं व्यवस्था बनाये रखने के लिए किया जाता है-2012 में शुरू हुआ. इंटरनेट सेवाओं पर रोक का रिकॉर्ड रखने वाली एक वेबसाइट की मानें तो 2012 में जम्मू और कश्मीर में इंटरनेट पर तीन बार प्रतिबंध लगा. 2013 में यह संख्या बढ़कर पांच हो गयी. 2014 और 2015 में भी यह पांच ही रही और 2016 में बढ़ कर 10 हो गयी.

लेकिन इस वेबसाइट के आंकड़े देखें तो 2017 में कश्मीर घाटी में इंटरनेट प्रतिबंधों में लगभग 300 फीसदी (32 प्रतिबंध) का इज़ाफ़ा हुआ है और 2018 में 500 फीसदी (50 प्रतिबंध) का, जबकि अभी साल ख़त्म होने में करीब दो महीने से ऊपर का वक्त बाकी है.

लेकिन ये आंकड़े भी अधूरे हैं क्योंकि ये इन प्रतिबंधों की अवधि नहीं बताते. जैसे 2016 में 10 बार इंटरनेट प्रतिबंध करीब करीब छह महीने तक चले थे. मतलब यह कि प्रतिबंध चाहे जितना भी लंबा चला हो इसको एक ही गिना जाएगा. दूसरी बात यह कि अक्सर ये प्रतिबंध अलग-अलग ज़िलों में लगाए जाते हैं और शायद ही इन छोटे-छोटे प्रतिबंधों को गिना जाता हो.

अब हाल यह हो गया है कि हर सर्च ऑपरेशन, हर एनकाउंटर, हर प्रदर्शन और यहां तक कि अब चुनाव के दौरान भी कश्मीर में पहला शिकार इंटरनेट ही होता है. हाल ही में निपटे नगर निकाय और पंचायत चुनावों को लें. इनके चलते पूरे दक्षिण कश्मीर में लगभग 15 दिन से ज़्यादा इंटरनेट या तो बंद रहा या 2जी स्पीड पर चला, जबकि बाकी जगहों पर सिर्फ चुनाव के दिन यह प्रतिबंध लागू रहा.

अब इन प्रतिबंधों की संख्या और अवधि जो भी हो, एक बात साफ है कि आजकल के दौर में इंटरनेट प्रतिबंध किसी भी जगह को पीछे ही धकेल सकता है, आगे नहीं ले जा सकता. और जब पीछे धकेलने की बात की जाती है तो यह प्रक्रिया सिर्फ आर्थिक रूप से ही नहीं बल्कि समाज, शिक्षा और कला के मोर्च पर भी कश्मीर घाटी को पीछे धकेल रही है. कई जानकार मानते हैं कि इंटरनेट पर लगने वाला यह बैन कश्मीर को भारत की मुख्यधारा से और भी दूर ले जा रहा है.

मुश्किलें

पिछले दस साल से टुअर एंड ट्रैवल कारोबार में काम कर कर रहे आदिल सथू ने दो साल पहले स्टार्टअप के तौर पर कश्मीर का पहला लोकल ट्रैवल पोर्टल तैयार किया. इस पोर्टल की ख़ास बात यह है कि यह कश्मीर के मशहूर शिकारा (डल लेक में जो कश्तियां चलती हैं) को ऑनलाइन लेकर आया है.

33 साल के आदिल पिछले दो साल से ट्रिपशॉप नाम के अपने इस पोर्टल का औपचारिक उदघाटन करना चाह रहे हैं. लेकिन जब भी वे ऐसा करने की सोचते हैं, कश्मीर में किसी न किसी अशांति के चलते इंटरनेट बंद कर दिया जाता है. सत्याग्रह से बातचीत में आदिल कहते हैं, ‘इस पोर्टल पर में अपने पैसे का एक बड़ा हिस्सा लगा चुका हूं, किस्मत देखें जब भी इसको लोगों के पास फॉर्मली लेकर जाना चाहता हूं, इंटरनेट पर बैन लग जाता है.’ वे आगे पूछते हैं, ‘वरना ऐसा कैसे हो सकता था कि कश्मीर का अपना पहला ट्रैवल पोर्टल हो और इस की मोबाइल एप्लीकेशन के सिर्फ 500 डाउनलोड्स हों.’

आदिल कहते हैं, ‘इससे न सिर्फ मेरे पूरे व्यापार पर असर पड़ा है बल्कि मेरी निजी जिंदगी भी प्रभावित हुई है. आप समझ सकते हैं कि अपनी जिंदगी की सारी पूंजी किसी चीज़ पर लगा दो और वापस कुछ न मिल रहा हो तो इंसान की मानसिक हालत कैसी हो जाती है.’

सत्याग्रह ने कई और व्यापारियों से भी बात की जिनके कारोबार को इंटरनेट पर बार-बार लगने वाले बैन के चलते नुकसान हो रहा है. 35 साल के गौहर भट कहते हैं, ‘टैक्स भरना, कारोबारियों से कॉन्टेक्ट, ऑनलाइन ट्रांसएक्शनंस सब प्रभावित है,” 3 गौहर एक स्पेक्ट्रम नामी एडवरटाइजिंग एजेंसी चलाते हैं और इंटरनेट के बिना उनका काम एक दम ठप हो कर रह जाता है. गौहर कहते हैं, ‘डिज़ाइन बनाना, उनको क्लाइंट को मेल करना, फिर प्रिंट के लिए मेल करना- आप नाम लें और मैं बताऊंगा कैसे सब ठप हो जाता है. वहीं दूसरी तरफ और लोग रखने पड़ रहे हैं. जहां बैंक का काम इंटरनेट के होते मैं खुद कर लेता था वही अब उसके लिए भी एक बंदा रखना पड़ रहा है.’

दिल्ली स्थित थिंक टैंक इंटरनेशनल काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकनॉमिक रिलेशंस की मानें तो 2012 से लेकर 2017 तक कश्मीर में इंटरनेट पर प्रतिबंधों के चलते अकेले यहां के कारोबार जगत को करीब 4000 करोड़ रु का नुकसान हुआ है. इसके अलावा पर्यटन, आईटी, मीडिया और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. नए स्टार्टअप्स, शिक्षा और कला भी इस नुकसान की चपेट में हैं.

दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में स्थित स्मार्ट किड्स इनोवेटिव प्ले स्कूल के चेयरमैन इक़बाल जान कहते हैं कि बार बार इंटरनेट सेवाओं पर लग रही रोक का नुकसान उनके छात्रों को भी हो रहा है. वे कहते हैं, ‘आजकल के बच्चों को इंटरनेट की आदत लग गयी है और अच्छा भी है क्योंकि इससे शिक्षा आसान हो गयी है. हमारे स्कूल में भी हम ज़माने के साथ चलते हुए स्मार्ट क्लासेज चला रहे हैं. लेकिन बार-बार के ये इंटरनेट बैन न सिर्फ बच्चों की पढ़ाई पर असर डालते हैं बल्कि इनसे उनकी मानसिकता पर भी नकारात्मक असर पड़ता है.’

इंटरनेट पर लग रहे इन प्रतिबंधों का शिकार कला भी हो रही है. कश्मीर घाटी में पिछले कुछ सालों में युवा कलाकारों की एक नयी पीढ़ी सामने आयी है जिसका लोगों तक पहुंचने का अकेला जरिया इंटरनेट ही है. ऐसे ही एक गायक हैं 23 साल के, यावर अब्दाल, जो पिछले साल फेसबुक पर उनकी एक मिनट की वीडियो क्लिप के चलते काफी मशहूर हुए थे. यावर उसके फ़ौरन बाद अपना एक एल्बम ‘तमन्ना’ लेकर यूट्यूब पर छाए, जहां उनके इस वीडियो को एक महीने में करीब 40 लाख व्यूज मिले.

सत्याग्रह से बातचीत में यावर कहते हैं, ‘अब एक महीना पहले में ने यूट्यूब पे अपना दूसरा एल्बम रिलीज़ किया है और अभी तक उसको सिर्फ दो लाख से थोड़े अधिक व्यूज मिल पाए हैं. वजह यह कि पिछले एक महीने में कश्मीर में सिर्फ कुछ दिन इंटरनेट चला है.’ यावर कहते हैं कि उन जैसे लोगों का पूरा करियर इंटरनेट पर निर्भर करता है. से सवाल करते हैं, ‘इंटरनेट नहीं होगा तो हमें कौन सुनेगा?’ यावर पूछते हैं.

इस सब के बीच देखा जाए तो सिर्फ टेलीकॉम कंपनियां ही मुनाफे में हैं. सत्याग्रह ने कुछ निजी टेलीकॉम कंपनियों में काम कर रहे लोगों से बातचीत की. नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने बताया कि इंटरनेट बंद होने से सबसे ज़्यादा फायदा इन कंपनियों को होता है. एक कंपनी के अधिकारी का कहना था, ‘आज कल के टैरिफ के हिसाब से देखा जाए तो एक जीबी इंटरनेट करीब 4.50 रुपए का पड़ता है, और कश्मीर में करीब-करीब 6.5 लाख मोबाइल सब्सक्राइबर्स हैं जो औसतन एक जीबी इंटरनेट इस्तेमाल कर लेते हैं दिन में. हिसाब लगा लीजिए कितने पैसे की बचत है.’

कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि टेलीकॉम कंपनियां जानबूझकर सुरक्षा एजेंसियों से इंटरनेट बंद करने को बोलती हैं. सिविल सर्विस की कोचिंग देने वाले इम्तियाज़ करीम कहते हैं, ‘वरना डिजिटल इंडिया के ज़माने में ऐसा नहीं हो सकता और ऐसा नहीं होना चाहिए. मैं देखता हूं कि लोगों को कैसी दिक्कतें होती हैं. सरकार भी तो देखती ही होगी न!’

क्या इंटरनेट बंद करना जरूरी है?

आजकल कश्मीर में कोई भी वरिष्ठ पुलिसकर्मी इस बात को लेकर औपचारिक रूप से बात नहीं करता, लेकिन अनौपचारिक ढंग से इनमें से काफी लोग मानते हैं कि इंटरनेट बंद करना किसी भी चीज़ का समाधान नहीं है. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सत्याग्रह को बताते हैं, ‘तीन साल से हम लगातार इंटरनेट बंद करते आ रहे हैं. मुझे बताइए किस चीज़ में कमी हुई है, प्रदर्शनों में, मिलिटेंसी में या किसी और चीज़ में. मेरे हिसाब से तो किसी में नहीं.’

हम उनसे पूछते हैं कि यही बात वे अपने आला अधिकारियों को क्यों नहीं बताते. हंसते हुए उनका जवाब आता है, ‘बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे.’ वे आगे कहते हैं, ‘और अब ये इंटरनेट बंद करना यहां के सिस्टम में घुस गया है. ये आदत अब मुश्किल से ही छूटेगी.’

पिछले साल दिसंबर में राज्य पुलिस के तब के मुखिया एसपी वैद, ने सत्याग्रह को बताया था कि हालात सामान्य रखने के लिए कभी कभी इंटरनेट बंद करना ज़रूरी हो जाता है. साथ ही उन्होंने कहा था कि सुरक्षा एजेंसियां इस बारे में चर्चा कर रही हैं कि क्या कोई बेहतर तरीका हो सकता है. उनका कहना था, ‘हम देख रहे हैं कि इस का विकल्प क्या हो सकता है. मुझे आशा है कि इसका विकल्प हमें जल्दी मिल जाएगा.’

विकल्प तो नहीं मिला. बस इंटरनेट और भी नियमित रूप से बंद होने लग गया. और इसका खामियाजा भुगत रहे हैं इरफ़ान, आदिल, यावर और गौहर जैसे युवा.