अगर सदियां, साल, महीने, दिन और घंटे कभी बात कर पाते तो 1984 को भारत के इतिहास से हटाने की बात करते. उस साल एक के एक बाद हादसे हुए थे. ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या, सिखों के क़त्लेआम और भोपाल गैस कांड जैसी त्रासदियों से देश कराह उठा. पहली तीन घटनाएं आपस में गुत्थमगुत्था थीं और आख़िरी तंत्र की लापरवाही का नतीजा थी. आइए, पहली तीन घटनाओं पर नज़र डालते हैं.

ऑपरेशन ब्लू स्टार की ज़रूरत क्यों पड़ी?

सिखों द्वारा अलग राज्य की मांग को लेकर किया गए आंदोलनों का इतिहास भारत की आजादी के साथ जुड़ा हुआ है. सिखों को लगता था कि विभाजन में सबसे ज़्यादा प्रभावित होनेवाले वही हैं. कुछ हद तक बात सही भी है. विभाजन के बाद सिखों ने अलग सूबे की मांग की थी जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने ठुकरा दिया. भाषा के आधार पर राज्यों गठन हुआ पर यहां भी सिखों के हाथ कुछ नहीं आया. फिर कई सालों के प्रयासों के बाद पंजाब राज्य की स्थापना हुई.

लेकिन फिर हालात दूसरी तरफ करवट लेने लगे. सिखों को डर लगने लगा कि पंजाब में हिंदू बहुसंख्यक बन जायेंगे और उनके पास कुछ भी नहीं रहेगा. आग लगाने का कुछ काम हिंदू संगठनों ने भी किया. माना जाता है कि कांग्रेस ने पंजाब की सबसे बड़ी पार्टी अकाली दल की काट के लिए कट्टरपंथी नेताओं को बढ़ावा दिया और इसी प्रक्रिया के तहत जरनैल सिंह भिंडरावाले का उदय हुआ.

धीरे-धीरे भिंडरावाले के जादुई व्यक्तित्व का प्रभाव पंजाब में बढ़ने लगा. उसने बेरोज़गार सिखों की फ़ौज तैयार कर हिंदुओं ने ख़िलाफ़ हिंसक आंदोलन शुरू कर दिए. जब हिंदुओं ने जवाब देना शुरू कर दिया तो मामला अलग रंग लेने लग गया. अतिवादी सिख हिंसा पर उतर आए. पंजाब में आतंकवाद की शुरुआत हो गयी.

हालात खराब हो गए. एक के बाद एक राजनैतिक हत्याएं होने लगीं. पंजाब पुलिस भिंडरावाले को गिरफ़्तार करने की हिम्मत नहीं कर पाती थी. एक बार किया भी तो तब केंद्र की कांग्रेस सरकार के गृह मंत्री जैल सिंह ने उस पर लगे सारे इल्ज़ाम हटवा कर उसे रिहा करवा दिया. जैल सिंह और अन्य कांग्रेसी उसे अकालियों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रहे थे. इस बीच वह सिखों की प्रमुख धार्मिक शिक्षण संस्था दमदमी टकसाल का अध्यक्ष बन गया. हिंदुओं के अलावा अतिवादी सिखों ने निरंकारियों को भी निशाना बनाया. इसी दौरान 13 अप्रैल 1978 को हुई एक हिंसक झड़प में 20 से अधिक निरंकारी मार दिए गए.

अब बात केंद्र के हाथ से निकलती जा रही थी. दोबारा गिरफ़्तार होने से बचने के लिए भिंडरावाले ने दमदमी टकसाल से निकलकर अमृतसर स्थित हरमंदर साहब या स्वर्ण मंदिर में अपना ठिकाना बना लिया. अब यहां वह महफूज़ था, पुलिस यहां नहीं पहुंच सकती थी.

इसके बाद तो जैसे पंजाब में हिंदुओं पर अपराधों की बाढ़ आ गई. एक घटना में 22 हिंदुओं को बस से उतारकर गोलियों से भून दिया गया. इससे पहले पंजाब पुलिस के उपमहानिरीक्षक एएस अटवाल की दिन दहाड़े स्वर्ण मंदिर परिसर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. यह 1983 की बात है.

केंद्र सरकार की तमाम कोशिशें बेकार साबित होने लगीं. भिंडरावाले ख़ुलेआम दिल्ली की सत्ता को आंख दिखाने लगा. यहां तक कि पंजाब से बाहर जाने वाले गेहूं पर भी उसने रोक लगा दी. संत लोंगोवाल और गुरचरण सिंह टोहरा जैसे अन्य सिख नेता भिंडरावाले के बढ़ते प्रभाव को देखकर उसके सुर में सुर मिलाने लगे. जब तक इंदिरा गांधी जागतीं, काफ़ी देर हो चुकी थी. उन्होंने पंजाब में दरबारा सिंह की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त कर दिया और राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया. लेकिन यह भी काम नहीं आया. ऐसे हालात में इंदिरा गांधी ने अपने ही बनाये हुए भस्मासुर को ख़त्म करने का प्लान बनाया. नतीजतन ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ.

क्या इंदिरा ने अंतिम समय ऑपरेशन ब्लू स्टार को टालने की कोशिश की थी?

धर्मनिरपेक्ष हिंदुस्तान में ऑपरेशन ब्लू स्टार को हादसा माना जाता है. इसके पीछे जानकार कई कारण बताते हैं. पहला, यह कांग्रेस की गलतियों का नतीजा था. दूसरा, सैनिक कार्रवाई के बजाय बातचीत से हल निकाला जा सकता था. तीसरा, फ़ौज के बजाय अर्धसैनिक बलों से कार्यवाही करवाई जा सकती थी.

चर्चित पत्रकार हरमिंदर कौर ‘1984-लेसंस फ़्रॉम हिस्ट्री’ नाम की अपनी किताब में लिखती हैं, ‘सरकार और असंतुष्टों के बीच 1984 में छह बार मीटिंग हुई. आख़िरी मीटिंग मई, 26, 1984 को हुई जो बेनतीजा रही. न इंदिरा गांधी मानने को राज़ी थीं और न ही भिंडरावाले गुट के लोग’.

कुछ लोग मानते हैं कि इंदिरा गांधी ने आख़िरी वक़्त तक सिखों को धोखा दिया. उनका कहना था कि दो जून की रात को वे सिखों के नाम संदेश में हिंसा छोड़ने की अपील कर रही थीं और तीन दिन बाद फ़ौज ने स्वर्ण मंदिर पर चढ़ाई शुरू कर दी. उनके मुताबिक इससे ज़ाहिर होता है कि केंद्र सरकार ने फ़ौजी कार्रवाई का पहले ही निर्णय ले लिया था.

मुकम्मल तौर नहीं कहा जा सकता कि पर राष्ट्र के नाम संदेश इंदिरा गांधी की आख़िरी कोशिश थी या दिखावा. रिटायर्ड मेजर जनरल कुलदीप सिंह बरार, जिन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार को अंजाम दिया, अपनी इसी नाम से लिखी क़िताब में ज़िक्र करते हैं कि जब इंदिरा के पास कोई चारा नहीं बचा तो उन्होंने सैन्य कार्रवाई का निर्णय लिया.

वरिष्ठ पत्रकार खुशवंत सिंह ने भी ऐसी ही बात कही है. अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ़ सिख्स’ में वे लिखते हैं कि इंदिरा ने भिंडरावाले को ख़त लिखकर समझाने का अंतिम प्रयास किया था. खुशवंत लिखते हैं कि स्वर्ण मंदिर के तत्कालीन लाइब्रेरियन देवेंदर सिंह दुग्गल के दावे के मुताबिक़ उन्होंने (दुग्गल) इंदिरा का ख़त तीन जून ,1984 को भिंडरावाले को पढ़कर सुनाया था. दुग्गल के मुताबिक़ ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान वह ख़त जल गया. कुछ पत्रकार बताते हैं कि इंदिरा ने तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को ऑपरेशन ब्लू स्टार के बारे में नहीं बताया था. सात जून को भिंडरावाले और उसके साथियों की मौत के बाद मोटे तौर ख़त्म हुए ऑपरेशन में कुल 83 सैनिक शहीद हुए और क़रीब 492 आतंकी और श्रद्धालु मारे गए.

जानकारों का एक वर्ग मानता है कि इस अभियान में अर्धसैनिक बलों की अपेक्षा सेना का इस्तेमाल सही कदम थ, क्योंकि जिस तरह की तैयारियां भिंडरावाले के समर्थकों ने की थीं और जो हथियार आतंकियों ने इस्तेमाल किये थे, उनसे अर्धसैनिक बल नहीं निपट पाते. कुलदीप सिंह बरार लिखते हैं, ‘अतिवादियों के पास राकेट चालित ग्रेनेड लांचर्स थे जो टैंकों को ध्वस्त करने की क्षमता रखते हैं.’. हालांकि, भिंडरावाले का ऑपरेशन शुरू होने से पहले तक यही अनुमान था कि सरकार सेना का इस्तेमाल नहीं करेगी.

इंदिरा गांधी की हत्या

स्वर्ण मंदिर पर सेना की कार्रवाई ने सिखों का मनोबल तोड़ दिया. जो कौम, ‘राज करेगा खालसा’ की भावना को लेकर आगे बढ रही थी, उसके स्वाभिमान को ज़बरदस्त ठेस लगी थी. खुशवंत सिंह लिखते हैं, ‘जो लोग सिखों के बारे में कुछ भी जानते हैं उन्हें मालूम होना चाहिए कि हरमंदिर साहब और अकाल तख़्त के स्वरूप का बिगड़ना सिखों के ज़ेहन से मिट नहीं सकता था और न ही वो उनको माफ़ करते जो उनकी नज़र में ज़िम्मेदार हैं.’

ब्लू स्टार के बाद इंदिरा और सेना के वे अफ़सर जिन्होंने इसे अंजाम दिया था, आतंकियों के निशाने पर आ गए थे. पत्रकार हरमिंदर कौर लिखती हैं कि नेशनल काउंसिल ऑफ़ खालिस्तान’ के स्व-घोषित अध्यक्ष जगजीत सिंह चौहान ने इंदिरा की हत्या करने वाले को एक लाख अमेरिकी डॉलर इनाम देने की घोषणा तक कर डाली. सिखों ने बदला लेने की ठान ली थी.

इधर, इंदिरा गांधी की चौकसी बढ़ा दी गयी थी, एक एंबुलेंस जिसमें उनके ब्लड ग्रुप वाला खून और डॉक्टर हमेशा उनके साथ रहते. इंदिरा की सुरक्षा में तैनात जवान सिख थे. जब सुरक्षा संस्थाओं ने इस ओर उनका ध्यान दिलाया, तो उन्होंने तपाक से पूछा, ‘क्या हम धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं?’ बात यहीं ख़त्म हो गयी. जानकार बताते हैं कि उनको अपनी मृत्यु का पुर्वाभास होने लग गया था. 30 अक्टूबर को पार्टी मीटिंग में उन्होंने कहा था, ‘अगर मेरी (इंदिरा) मृत्यु हो जाती है तो...’

31 अक्टूबर की सुबह नौ बजे के लगभग इंदिरा गांधी का मशहूर अभिनेता और नाटककार पीटर उस्तीनोव के साथ इंटरव्यू तय था. उनके निजी सचिव आर के धवन उनके साथ थे. जो उस दिन हुआ, वह धवन की आंखों देखी कुछ यूं था. इंदिरा एक सफ़दरजंग रोड निवास से सटे हुए उनके दफ़्तर, एक अकबर रोड की तरफ चलीं. दोनों के बीच में सिर्फ़ घास की फेंसिंग थी. रास्ते में उन्हें बटलर पीटर उस्तीनोव के लिए चाय ले जाते हुए मिला. उन्होंने नए टी-सेट में चाय ले जाने को कहा.

यह कहकर वे घर से बाहर निकल कर बगीचे में आई ही थीं कि उनके सुरक्षा कर्मी बेअंत सिंह ने अपनी पिस्तौल निकाली और उनकी तरफ़ गोली चला दी. गोली निशाने पर लगी, वे गिरीं और इतने में सतवंत सिंह ने उन पर फायरिंग शुरू कर दी. कुल मिलाकर उनके शरीर में 18 गोलियां लगी थीं.

सुरक्षा संस्थाएं वही ग़लती कर बैठीं, जो 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के समय हुई थी. तब सरदार पटेल ने गांधी के विरोध और ज़िद के आगे झुकते हुए उनकी सुरक्षा कम करने का घातक निर्णय लिया था. संयोग देखिये, 48 के अंकों का क्रम बदल दीजिये तो 84 हो जाता है!

धवन ने बयान दिया था कि उस दिन प्रधानमंत्री निवास पर एम्बुलेंस नहीं थी. वे और सोनिया गांधी उन्हें एंबेसडर कार में एम्स ले गए . शायद रास्ते में ही उन्होंने अंतिम हिचकी ले ली थी. डॉक्टर फिर भी उन्हें ऑपरेशन कक्ष में ले गए, पर कोशिशें नाकाम रहीं.

धवन के मुताबिक़ गोली मारते ही बेअंत सिंह ने पंजाबी में कहा था कि उन्होंने अपना काम कर दिया, आपको (पुलिस) जो करना है कर लो. यह कहते हुए दोनों ने हथियार डाल दिए. बदला पूरा हो गया था. एक अध्याय समाप्त हो गया. पर फिर जो हुआ, वह देश को इन दोनों घटनाओं से ज़्यादा शर्मसार कर गया.

सिखों का क़त्लेआम

एम्स के बाहर भीड़ जमा होने लगी. राजीव गांधी दिल्ली में नहीं थे. इंदिरा गांधी की मौत ने दिल्ली की हवाओं में ज़हर भर दिया. ‘खून का बदला खून’ के नारे लगने लगे. सिखों की जान सांसत में आ गयी. दिल्ली में महज़ 7.5 फीसदी सिख थे. जहां मुसलमान अक्सर एक साथ रहते हैं, सिख हिंदुओं के साथ रहते थे, अपनी पगड़ी की वजह से वे आसानी से पहचाने जाते.

राष्ट्रपति जैल सिंह विदेश गए हुए थे. दौरा रद्द करके वे एयरपोर्ट से सीधे एम्स गए. माहौल इतना गरम हो चुका था कि उनकी गाड़ी पर पथराव हो गया. आखिरकार, वे भी सिख ही थे. अस्पताल के नज़दीक सिखों ने अक्टूबर की सर्द हवाओं में गर्मी महसूस करनी शुरू कर दी थी.

जैल सिंह ने आनन् फ़ानन में राजीव गांधी को शपथ दिलाकर प्रधानमंत्री बना दिया. राजीव ने अपने पास रक्षा और विदेश मंत्रालय रख लिए. शाम होते-होते कनॉट प्लेस की दुकानों को लूटकर आग के हवाले कर दिया गया था. अफवाहों के तंत्र अपना काम करने लगे. ख़बरें आने लगी कि हिंदुओं की लाशों से अटी एक ट्रेन पंजाब से दिल्ली आ रही है. फिर तो यह आग बढती ही गई. घरों में निकाल-निकालकर सिखों को सरियों और लाठियों से पीट-पीट कर मारा गया. पुलिस तमाशबीन बनकर देख रही थी.

एक बड़ा वर्ग मानता है कि यह सब कांग्रेस के कुछ नेताओं के इशारे पर हो रहा था. कहा जाता है कि राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा से गुज्जर, जाट और पिछड़ी जातियों के लोगों को दंगों के लिए लाया गया. उन्हें कहा गया, ‘सरदार मारो और उनका सामान और औरतें सब तुम्हारा’. दंगाइयों ने मारने के तरीक़े ईजाद किये. सिखों के गले में टायर डालकर उनके हाथ बांध दिए और उन्हें जला दिया. बच्चों को भी नहीं बख्शा गया.

तत्कालीन गृह मंत्री पीवी नरसिम्हा राव आश्वासन देते रहे कि पुलिस और प्रशासन क़त्लेआम रोकने का काम कर रहे हैं. पर हक़ीक़त कुछ और ही थी. उधर, नए प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी रेडियो और टेलीविज़न पर लोगों से शांति बनाने की अपील करते रहे. वे रक्षा मंत्रालय का प्रभार संभाल रहे थे, पर उन्होंने सेना को हालात काबू करने के आदेश नहीं दिए, जबकि दिल्ली में भारी तादात में सेना मौजूद रहती है.

सरकार की लापरवाही थी या कुछ और कि पहली रात तो शहर में कर्फ्यू तक नहीं लगाया गया. पूरे तीन दिन तक दंगाई बेगुनाह सिखों और उनके परिवारों का सफ़ाया करते रहे. जब केंद्र सरकार पर दबाव पड़ने लगा और दंगाई क़त्ल, लूट और बलात्कार करते-करते थक गए तो सेना को दिल्ली की कमान दे दी गयी और कहने को सब ख़ामोश हो गया. दिल्ली के अलावा भी कई और राज्यों में सिखों के ख़िलाफ़ हिंसा हुई.

जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है

19 नवंबर को इंदिरा गांधी का जन्मदिन मनाया गया. राजीव गांधी ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि इंदिरा जी के बाद दुनिया को यह लगने लगा कि भारत हिल रहा है. आगे उन्होंने कहा कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है. इस बयान से यह संदेश गया कि वे सिखों के विरुद्ध हुए दंगों को सही ठहरा रहे हैं. इस भाषण में उन्होंने दंगों में मरने वालों के प्रति कोई सहानभूति नहीं जताई. शायद पुत्र की भावनाएं प्रधानमंत्री के कर्तव्य और आचरण से बड़ी हो गई थीं. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने इस भाषण में दंगों को सही ठहराया हो. आप यह भाषण सुनकर खुद फ़ैसला करें कि उनके कहने का आशय क्या था.

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जांच कमेटियां और न्याय के लिए इंतज़ार

जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार और एचकेएल भगत सहित कांग्रेस के कई नेताओं पर दंगों में शामिल होने का आरोप लगा. दिल्ली पुलिस ने क़रीब 1800 लोगों को गिरफ्तार करके छोड़ दिया. सब तरफ़ लीपापोती चल रही थी. पर कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं ने पहल दिखाते हुए, पीड़ितों से बात की और जानकारी जुटाई. उन्होंने आंकड़े जमा कर एक रिपोर्ट पेश की जिसका शीर्षक था, ‘हू आर दी गिल्टी’. मतलब ‘दोषी कौन हैं’

सरकार ने जस्टिस रंगनाथ मिश्र की अध्यक्षता में एक जांच आयोग बिठाया. खुशवंत सिंह लिखते हैं कि उन्हें बख़ूबी मालूम था कि इन दंगों में कांग्रेस के किन लोगों की भूमिका है, पर प्रधानमंत्री ने भी उन लोगों के ख़िलाफ़ जांच में कोई दिलचस्पी नहीं ली. कोई रसूख वाला इन दंगों के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया. 84 के दंगों में मारे जाने वाले सिखों के परिवार अभी भी न्याय के इंतजार में हैं.