उर्दू ज़ुबान में एक लफ्ज है ‘निदा.’ यानी वह पुकार जिसमें दर्द हो, तड़प हो, छटपटाहट हो. ऐसी पुकार अल्लाह तक भी पहुंच जाती है. ऐसी ही एक ‘निदा’ उत्तर प्रदेश के बरेली शहर से भी उठ रही है. लेकिन यह इस ‘दुनिया के रहनुमाओं’ में से किसी के कानों तक नहीं पहुंच रही है. यह निदा भी एक निदा की ही है, निदा खान की. वे पढ़ना चाहती हैं, दहेज प्रताड़ना से जूझ रही हैं और तीन तलाक़ की बेड़ियों में छटपटा रही हैं. लेकिन उनके मौज़ूदा परिवार (ससुराल) के मुखिया (ससुर) इससे बेपरवाह हैं. उनके समुदाय (सुन्नी मुस्लिमों के बरेलवी पंथ) के मुखिया इस पर अपने कान बंद किए बैठे हैं, जबकि रिश्ते में वे उनके जीजा लगते हैं.

प्रदेश और देश में आजकल ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’, ‘दहेज प्रथा’ के उन्मूलन और ‘तीन तलाक़’ की कुरीति के बारे में खूब बातें होती हैं. लेकिन इन्हें करने वालों के कानाें तक उनकी निदा पहुंच नहीं रही. वरना ढाई साल गुजर जाने के बाद भी निदा खान ख़ुद को यूं अकेला न पाती.

वह बसंत का मौसम था, जब ढोल-धमाकों के साथ पतझड़ ने निदा की ज़िंदगी में दस्तक दी थी

तारीख़ 18 फरवरी 2015 की थी. बसंत के मौसम में उस रोज बीएसएनएल (भारत संचार निगम लिमिटेड) में क्लर्क मुसर्रतयार खां की बेटी निदा खान का निक़ाह था. निक़ाह भी कहां? सुन्नी मुस्लिमों के बरेलवी मस्लक (पंथ) के रहनुमाओं के खानदान में. वह खानदान जिसकी अव्वल शख़्सियत इमाम अहमद रज़ा (आला हजरत) ने क़रीब डेढ़ साै साल पहले इतनी बड़ी नज़ीर पेश की थी. परंपरागत नियम-क़ायदों में जकड़े देवबंदी मस्लक से अलग राह अख़्तियार करने का हौसला दिखाया था. परंपराओं में कट्‌टरता छोड़कर सूफियाना मिजाज़ घोला था. जिसके एक सदस्य अहसन रज़ा खान इस वक़्त बरेलवी मस्लक के प्रमुख हैं. जिनकी पत्नी निदा की मौसेरी बहन हैं और जिन्होंने आज तक शायद पत्नी को कभी शिकायत का मौका नहीं दिया. ऐसे ख़ानदान में, इन्हीं अहसन रज़ा के चचेरे भाई शीरान रज़ा से निदा का निक़ाह हो रहा था. रिश्ता भी ख़़ुद चलकर आया था. शीरान की मां सिम्मी ने बात चलाई थी. पर किसे पता था कि इसके वजह से निदा के घर में पसरी खुशी 24 घंटे भी नहीं टिक पाएगी.

जिस निदा ने अपने मायके में कभी बंदिशें नहीं देखी. कभी पढ़ने-पढ़ाने जैसे मसलों पर रोक-टोक नहीं सुनी. जिस आज़ाद ख़्याली की वज़ह से वह शहर के बढ़िया कॉन्वेंट स्कूल के बारास्ते बीकॉम की डिग्री ले सकी थी, वही सब ससुराल में उसके लिए मुश्किल बन गया. ऊपरी परतें पहले ही दिन से हटने लगीं. वह 19 फरवरी 2015 की तारीख़ थी. ‘हमारे अब्बू ने शीरान के परिवार वालों की इच्छा के हिसाब से एक बड़े रिज़ॉर्ट में 2,500 मेहमानों का इंतजाम किया था. स्विफ्ट कार समेत छोटे से लेकर बड़े सामान और सोना-चांदी तक भरपूर दहेज़ दिया. दहेज की लिस्ट पर शीरान के अब्बा ने दस्तख़त कर उसे मंज़ूरी दी थी. पर अगले ही दिन शीरान ने बड़ी गाड़ी की मांग कर दी. उन्हें डस्टर गाड़ी चाहिए थी...’ सत्याग्रह से बातचीत में निदा खान बताती हैं कि उन्हें ससुराल में आये अभी सिर्फ कुछ ही घंटे हुए थे कि पति शीरान रज़ा ने अकेले में मौका देखकर कहा, ‘कार बड़ी चाहिए थी. अपने अब्बू से एक लाख रुपए और देने को कहो तो कार बदल लेंगे.’

निदा खान को पहले लगा यह आम बात है. इसलिए उसने शीरान को समझाने की कोशिश की, ‘हम लोग बाद में अपने पास से कर लेंगे. अब्बू पर क्यों नाहक और बोझ डालें.’ लेकिन यह समझाना शीरान और उसके परिवार को नाग़वार गुजरा. ‘इसके बाद ससुराल वाले भी शीरान की हां में हां मिलाने लगे. कहने लगे कि बाहर जाने पर पूरा परिवार इस गाड़ी में नहीं आ पाएगा. जब मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की तो इसकी सज़ा के तौर पर घर में लगे सभी नौकर हटा दिए गए. परिवार का पूरा काम मेरे कंधों पर डाल दिया गया. बड़ी परेशानी ये थी कि इस पूरे परिवार में सब रात को जागते हैं. दिन में सोते हैं. ऐसी कोई रवायत या ज़रूरत नहीं है. बस अपनी सुविधा से कुछ सालों पहले यह सिलसिला शुरू हुआ था. ऐसे में मुझे रात-दिन जागकर काम करना पड़ता था...’निदा कहती हैं, ‘मुझे काम करते-करते ही झपकी लेनी पड़ती थी. मेरे लिए तमाम नियम बना दिए गए थे. पर्दों की धुलाई हफ़्ते में, बैडशीट और कुशन कवर की धुलाई हर दो दिन में. इसके अलावा सात लोगों का खाना-नाश्ता वग़ैरह. फिर शादी के 20 दिन भी नहीं गुजरे थे कि शीरान ने 25 लाख रुपए की मांग और कर दी. उन्हें एक खाली प्लॉट पर कंस्ट्रक्शन कराना था. कभी कहते - मदरसा बनाना है, कभी कहते - बिजनेस करना है. ये मांगें हम पूरी नहीं कर पाए तो मारपीट और बात-बात पर नीचा दिखाने का सिलसिला शुरू हो गया.’

तालीम हासिल करने की कोशिश के बदले सरेआम ज़लालत मिली

निदा बताती हैं, ‘मैंने एम कॉम का फॉर्म शादी से पहले ही भर दिया था. उस वक़्त ससुराल वालों ने इसकी इजाज़त दे दी थी. लिहाज़ा मैंने पहला पेपर भी दे दिया. लेकिन दूसरे पेपर की बारी आई तो शीरान ने प्रवेश पत्र फाड़ दिया. हालांकि बाद में दूसरा निकलवा दिया अौर जिस रोज़ पेपर था, सुबह-सुबह मायके पहुंचा दिया. मेरे भाई ने मुझे परीक्षा केंद्र छोड़ा. मगर पेपर अभी शुरू ही हुआ था कि शीरान एक शिक्षक के साथ परीक्षा कक्ष में आ धमके. भारी हंगामा किया और मुझे जबरन अपने साथ ले गए. ये तमाशा सबने देखा लेकिन बोला कोई कुछ नहीं. बड़े मज़हबी परिवार का मसला जो था...’

‘...इस घटना की मीडिया ने खबर तो दी लेकिन बच-बचकर. इसी बीच मई में पता चला कि मैं मां बनने वाली हूं. सोचा कि अब शायद बच्चे की किस्मत से हालात बदल जाएं. पर वह भी न हुआ. दो महीने बाद ही 17 जुलाई 2015 को शीरान ने बेरहमी से मार-पीटकर रात करीब तीन बजे घर से निकाल दिया. ससुराल के पास रात भर दरगाह पर जायरीन का आना-जाना रहता है. इसलिए जैसे-तैसे मैं ऑटो से मायके पहुंच सकी. इस मारपीट की वज़ह से मेरा बच्चा भी गिर गया. इसके बाद महीनों तक शीरान और उनके परिवार वालों ने कोई खैर-खबर भी नहीं ली. फिर मई-2016 में पता चला कि शीरान के परिवार वालों ने उनकी दूसरी जगह शादी तय कर दी है. हमें यह ठीक नहीं लगा इसलिए हम लोग लड़की वालों के घर गए और उन्हें पूरा वाक़या बताया. उन लोगों ने रिश्ता वापस कर दिया. इससे ख़फ़ा शीरान और उनके कुछ दोस्त हमारे घर आए और हम लोगों से ख़ासी बदतमीज़ी की...’

‘...हम पुलिस में शिकायत करने गए तो हमारी सुनवाई नहीं हुई. वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को भी जब पता चला कि मामला आला हज़रत के परिवार का है तो वे ठंडे पड़ गए. सुलह कराने की बात करने लगे. आख़िरकार हमें कोर्ट की शरण लेनी पड़ी. तब कहीं जाकर एफआईआर दर्ज़ हो पाई. इससे थोड़ा दबाव बना तो कहा जाने लगा कि शीरान मुझे ‘तीन तलाक़’ कह चुके हैं. जबकि ऐसा कुछ नहीं था. मैंने किसी कागज़ पर दस्तख़त भी नहीं किए थे. इसी आधार पर मैंने अदालत में इस तलाक़ को भी चुनौती दी. वहां से फैसला मेरे हक़ में आया. तलाक़ ख़ारिज़ कर दिया गया. मेरे लिए हर महीने 12,000 रुपए का गुज़ारा भत्ता देने का आदेश भी दिया गया. इस बीच पुलिस जांच के नाम पर रस्म अदायगी कर ससुराल पक्ष को बचाने की कोशिश करती रही. हमने इसका भी विरोध किया तो फरवरी-2017 में नई जांच शुरू हुई. फिर कहीं जून-2018 में आरोपितों के ख़िलाफ़ आरोप पत्र दायर हो पाया. लेकिन किसी की ग़िरफ़्तारी अब तक भी नहीं हुई. सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठने का लगातार बहाना बनाया जा रहा है.’

इस बीच धमकियां, फतवा और सियासत के बीच ‘निदा’ की गूंज बढ रही है

निदा के मुताबिक, ‘हमारा संघर्ष जारी है. लेकिन हम पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है. कभी चोटी काट देने तो कभी तेज़ाब फेंक देने की धमकियां दी जा रही हैं. बल्कि पिता और भाई को झूठे केस में फंसवाने की कोशिश तक हो गई. भीड़ ने घर पर हमला किया. रास्ते में घेरकर लोगों ने हमें धमकाया. पिता को मस्जिद में ज़ुमे की नमाज अदा करने से रोका गया. जैसे-तैसे हमें जिला प्रशासन ने सुरक्षा दिलाई तो इसके बाद इसी 17 जुलाई को हमारे ख़िलाफ़ फतवा ज़ारी करवा दिया गया. इसमें हमारे परिवार के सदस्यों से बात न करने, बीमारी में भी दवा न देने और मरने के बाद कब्रिस्तान में जगह न देने आदि के लिए कहा गया है.’

वैसे यह इत्तेफाक़ ही था कि जब निदा ‘तीन तलाक़’ और ‘दहेज उत्पीड़न’ के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रही थीं तभी सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया. शीर्ष अदालत ने ‘तीन तलाक़’ को अवैध घोषित कर दिया. इस फैसले का श्रेय लेने की कोशिश में सबसे आगे अगर कोई दिखा था तो वह भारतीय जनता पार्टी थी और है भी. ज़ाहिर तौर पर निदा का मामला भाजपा के स्थानीय नेताओं के लिए मददग़ार साबित हो सकता था. लिहाज़ा उन्होंने इसे भुनाने की कोशिश भी की.

‘भाजपा के दो विधायक - केसर सिंह गंगवार और राजेश कुमार मिश्रा - घर पर मिलने आए थे. उत्तराखंड की मंत्री रेखा आर्य भी आई थीं. उन लोगों ने मुझे पार्टी में शामिल करने का प्रस्ताव भी दिया. मुझे भी भाजपा से तमाम असहमतियों के बावज़ूद एक बार लगा कि ‘तीन तलाक’ जैसी परंपराओं को ख़त्म करने का इस पार्टी ने हौसला दिखाया है. इसलिए समाज के हित में, पीड़ित महिलाओं के हक़ में उसका साथ दिया जा सकता है. लेकिन बाद में पता चला कि पार्टी के स्थानीय नेता मेरे ससुराल वालों के दबाव में हैं’ निदा बताती हैं.

‘सत्याग्रह’ ने अपने स्तर पर इस घटनाक्रम की पुष्टि की. हमने केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार के कार्यालय में मौजूद भाजपा के कुछ नेताओं से बातचीत की. उनमें से कई ने नाम न छापने की शर्त पर माना, ‘अंदरूनी विरोध था. इसलिए निदा को पार्टी में शामिल नहीं कराया गया.’ उत्तराखंड की मंत्री रेखा आर्य से भी संपर्क किया गया. उन्होंने मामले को पार्टी नेतृत्व के पाले में डाल दिया. कुल मिलाकर अभी हालात ये हैं कि भाजपा के नेता निदा का नाम भी ज़ुबान पर लाने से हिचकते हैं.

हालांकि निदा अपनी लड़ाई को बेझिझक विस्तार दे रही हैं. वे बताती हैं, ‘‘मैंने सालभर पहले आला हजरत हेल्पिंग सोसायटी बनाकर ‘तीन तलाक़’, ‘घरेलू हिंसा’ और ‘दहेज प्रताड़ना’ से जूझती मुस्लिम महिलाओं की मदद करना शुरू किया. मैं बार-बार कहती हूं कि मैं शरीयत के ख़िलाफ़ नहीं हूं, लेकिन क्या महिला की अपनी पहचान नहीं होना चाहिए? शरीयत के नाम पर मनमाने उसूल गढ़ने वाले दरअसल इस्लामिक शिक्षाओं को बदनाम कर रहे हैं. और उन लोगों को तो ये हरगिज़ नहीं करना चाहिए, जिनको लोग प्रेरणा मानते हैं.’

ससुराल वालों को लगता है कि उनके साथ भी ज़्यादती हुई है

यह विचित्र है. लेकिन जब ‘सत्याग्रह’ ने इस मसले पर निदा के ससुरालवालों से संपर्क किया तो उनके ससुर अंज़ुम मियां ने कहा, ‘हमारी गलती ये है कि हमने ऐसी लड़की से बेटे का रिश्ता किया. हमने कभी सोचा नहीं था कि ऐसा होगा. बदतमीज़ी हमारे साथ हुई है. ज़्यादती हमसे हुई है. हमें इंसाफ की उम्मीद है.’ आला हजरत की दरगाह के सज्जादानशीं अहसन रज़ा से संपर्क करने की कोशिश की गई. लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं मिला. हालांकि दरगाह से जुड़े लोग कहते हैं कि ये ‘रिश्ता बेमेल था. निदा अपने मिजाज़ और शिक्षा में एडवांस हैं. जबकि इस परिवार के अपने उसूल हैं, इसलिए दोनों का तालमेल नहीं हो पाया.’