अगले दो महीनों के दौरान पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों को 2019 के आम चुनाव के लिहाज से अहम माना जा रहा है. इनमें भी मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ पर सभी की नजर है. इसकी एक बड़ी वजह इन राज्यों में भाजपा का शासन होना है. कई चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में यह बात सामने आ रही है कि पार्टी को इन राज्यों में सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है. आम चुनाव में भाजपा को टक्कर देने के लिए कांग्रेस कितनी तैयार है और महागठबंधन का आकार क्या होगा, ऐसे कुछ सवालों के संभावित जवाब इन विधानसभा चुनावों के नतीजों में दिख सकते हैं. हिंदी पट्टी के इन तीन राज्यों में लोक सभा की कुल 65 सीटें हैं. 2014 में भाजपा ने इनमें से 62 सीटों पर कब्जा किया था.

आम तौर पर इन राज्यों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होता रहा है. लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ में सूबे के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी की जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसी) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के बीच चुनावी गठबंधन ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है. इस गठबंधन के तहत कुल 90 सीटों में से बसपा 35 और जेसीसी 53 सीटों पर लड़ने की तैयारी में है. इसके अलावा बाकी दो सीटें सीपीआई के लिए छोड़ी गई हैं.

कांग्रेस से अलग पहली बार अपनी किस्मत और ताकत आजमा रहे अजीत जोगी की सतनामी संप्रदाय पर अच्छी पकड़ मानी जाती है. इस समुदाय की राज्य की आबादी में 12 फीसदी हिस्सेदारी है. साथ ही मध्य छत्तीसगढ़, जिसमें जांजगीर-चंपा, रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग के इलाके शामिल हैं, में भी अजीत जोगी की ठीक-ठाक पहुंच है. इन क्षेत्रों में विधानसभा की करीब 25 फीसदी सीटें हैं.

दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में बसपा का वोट शेयर चार से सात फीसदी तक रहा है. हालांकि, यह आंकड़ा पार्टी को दो से अधिक सीटें नहीं दिला सका. वहीं, सीपीआई का वोट शेयर भी छह फीसदी के आस-पास रहा है. इन जातीय और राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए माना जा रहा है कि राज्य में त्रिशंकु चुनावी नतीजे आने की स्थिति में अजीत जोगी किंगमेकर की भूमिका में होंगे.

जानकारों के मुताबिक ऐसा होने पर भाजपा से राज्य की कुर्सी छीनने के लिए कांग्रेस को ‘कर्नाटक मॉडल’ की राह चलने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. ऐसा होने पर सूबे की कमान एक बार फिर अजीत जोगी के हाथों में जा सकती है. कांग्रेस में एक तबका अजीत जोगी को पार्टी में शामिल करने के पक्ष में भी दिखता है. राज्य में एकमात्र कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने साल 2014 में पार्टी छोड़ दी थी. इसके करीब दो साल बाद उनके बेटे को भी कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया.

इस साल कांग्रेस ने 2016 में हुए गोवा और मणिपुर विधानसभा चुनावों से सबक लेते हुए भाजपा के पैरों तले से कर्नाटक की सत्ता की कुर्सी छीन ली थी. दरअसल, कर्नाटक में किसी भी पार्टी को बहुमत न हासिल होने की स्थिति में चुनावी नतीजे के दिन ही कांग्रेस ने जनता दल-सेकुलर (जेडीएस) के एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री पद के लिए अपना समर्थन दे दिया. हालांकि, जेडीएस के पास केवल 37 सीटें थीं जबकि कांग्रेस के पास 78. इसे कांग्रेस की बड़ी रणनीतिक जीत के रूप में देखा गया. जानकारों के मुताबिक इससे कांग्रेस ने भाजपा विरोधी दलों को एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की भी कोशिश की. वह संदेश यह था कि भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस कुर्सी पर अपना हक छोड़ भी सकती है. इससे पहले बीते साल गोवा और मणिपुर चुनावों में कांग्रेस के सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बावजूद भाजपा ने अन्य दलों के साथ गठबंधन कर अपनी सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की थी. कर्नाटक में कांग्रेस ने यही किया.

राजनीतिक गलियारों में संभावना जाहिर की जा रही है कि यदि छत्तीसगढ़ के मतदाता इस बार ‘खिचड़ी जनादेश’ देते हैं तो राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस इसी ‘कर्नाटक मॉडल’ को छत्तीसगढ़ में भी लागू कर सकती है. यह 2019 से पहले भाजपा विरोधी दलों को विश्वास में लेने के लिए उसका एक और दांव भी होगा. साल 2014 में कांग्रेस छत्तीसगढ़ की 11 में से केवल एक सीट जीतने में कामयाब हुई थी. इस संभावना की पुष्टि वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी चिदंबरम की बातों से भी होती हुई दिखती है. हाल में एक समाचार चैनल से बातचीत में उन्होंने कहा कि 2019 में राहुल गांधी को कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया जाएगा. उनका कहना है कि भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस पहले गठबंधन चाहती है. पूर्व केंद्रीय मंत्री के मुताबिक देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, यह आम चुनाव के बाद गठबंधन में शामिल दल मिलकर तय किया जाएगा.