पूर्व मिस इंडिया और अदाकारा तनुश्री दत्ता द्वारा अभिनेता नाना पाटेकर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाए जाने के साथ ही भारत में भी ‘मी टू’ अभियान का आगमन हो गया. इस अभियान ने पहले हिंदी फिल्म जगत और फिर पत्रकारिता की दुनिया में अपनी दस्तक दी. फिल्मी दुनिया के आलोक नाथ, रजत कपूर और सुभाष घई जैसे चर्चित लोगों से लेकर जाने-माने पत्रकार और भाजपा नेता एमजे अकबर सरीखे लोगों का नाम यौन शोषण करने वालों की फेहरिस्त में शामिल हो गया. यह सूची लगातार लंबी होती जा रही है.

हालांकि अभी भी आमजन की नजरों में उन्हीं कुछ मुट्ठी भर लोगों के नाम आए हैं जो चर्चित हैं और कई लोगों के आदर्श रहे हैं, जबकि कार्यस्थलों पर महिलाओं का उत्पीड़न एक व्यापक समस्या है. पिछले कुछ सालों में कार्यस्थलों पर उत्पीड़न के मामलों में तेजी से उछाल आया है. आइए इस मुद्दे से संबंधित कुछ आंकड़ों पर नजर डालते हैं.

1. पांच सालों में 43 फीसदी का इजाफा

महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2014 से 2018 के बीच कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न के मामलों में 43 फीसदी का इजाफा हुआ है. साल 2014 में इस तरह के मामलों की संख्या 371 थी जबकि इस साल के शुरुआती सात महीनों में ही कार्यस्थलों पर उत्पीड़न के 533 मामले दर्ज किए जा चुके हैं. 2014 के बाद से ही उत्पीड़न के मामलों में भारी उछाल दर्ज किया गया है. 2014 के बाद से ऐसा कोई साल नहीं रहा जब यौन उत्पीड़न के मामलों की संख्या 500 के नीचे गई हो. अब तक इस लिहाज से 2017 सबसे खराब साल रहा. इस वर्ष कार्यस्थलों पर उत्पीड़न के 570 मामले दर्ज हुए.

2. रोजाना दो महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न

साल 2015 से जुलाई 2018 तक यानी पिछले करीब चार सालों में कार्यस्थलों में यौन उत्पीड़न के कुल 2,535 मामले दर्ज हुए हैं. यह आंकड़ा रोज औसतन दो का है.

3. उत्तर प्रदेश सबसे आगे

इस साल जुलाई में लोकसभा में यौन उत्पीड़न के मामलों से संबंधित आंकड़े पेश किए गए थे. इनके अनुसार उत्तर प्रदेश (यूपी) भारत का वह राज्य है जहां कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न के सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए हैं. सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए आकंड़ों के अनुसार पिछले चार सालों के दौरान उत्तर प्रदेश में कार्यस्थल पर उत्पीड़न के 726 मामले दर्ज किए गए. यह देश भर में दर्ज ऐसे कुल मामलों का 29 फीसदी है. इसके बाद 369 मामलों के साथ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली दूसरे स्थान पर रही. हरियाणा 171 मामलों के साथ तीसरे, 154 मामलों के साथ मध्य प्रदेश चौथे और 147 मामलों के साथ महाराष्ट्र पांचवें स्थान पर रहा. वहीं मेघालय और मणिपुर दो ऐसे राज्य हैं जहां 2015 से 2018 तक कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का एक भी मामला दर्ज नहीं किया गया.

4. महिलाएं आवाज क्यों नहीं उठातीं?

इंडियन बार एसोसिएशन द्वारा 2017 में इसी सवाल को लेकर एक सर्वे किया गया था. इस सर्वे में करीब छह हजार महिलाओं ने हिस्सा लिया था. सर्वे में शामिल लगभग 70 फीसदी महिलाओं का कहना था कि वे भविष्य में हो सकने वाले दुष्प्रभावों को ध्यान में रखकर यौन उत्पीड़न की शिकायत नहीं करतीं. कार्यस्थलों पर होने वाले उत्पीड़न पर शोध करने वाले अनघ सरपोतदार ने इंडियास्पेंड से बातचीत के दौरान बताया कि कार्यस्थलों पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज न उठाना उस संस्था की लैंगिक संवेदनशीलता पर निर्भर करता है. कई बार महिलाएं अंतरिम समितियों के पास शिकायत लेकर जाने में इसलिए झिझकती हैं क्योंकि उन्हें समितियों की ईमानदारी पर ही शक होता है.