बीते शुक्रवार को हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक खबर का कहना था - ‘ग्रामीण भारत व्हाट्सएप पर आंखें मूंदकर भरोसा नहीं करता है.’ एचटी ने 14 राज्यों में किए गए एक ‘लिमिटेड सर्वे’ के हवाले से कहा कि यह जानकारी सुरक्षा एजेंसियों, सरकारों और व्हाट्सएप के लिए राहत की खबर हो सकती है. अखबार के इस दावे की वजह यह थी कि सर्वे में महज 8.2 फीसदी लोगों ने कहा था कि वे फेसबुक पर मिलने वाली खबरों पर पूरी तरह यकीन करते हैं. इसके अलावा सर्वे में यह भी बताया गया है कि करीब 70% लोग व्हाट्सएप पर आने वाली खबरों को पूरी तरह सही नहीं मानते हैं. लेकिन अखबार की रिपोर्ट के साथ प्रकाशित किए गए आंकड़ों को ध्यान से देखें तो व्हाट्सएप पर आने वाले संदेशों को लेकर सुरक्षा एजेंसियों, सरकारों और खुद व्हाट्सएप के लिए राहत का अनुभव करना आसान नहीं है.

हिंदुस्तान टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में जिसका हवाला दिया है, वह सर्वे दिल्ली के एक गैर-सरकारी संगठन, डिजिटल एम्पॉवरमेंट फॉउंडेशन (डीईएफ) ने किया है. इसमें भाग लेने वाले लोगों को विश्वसनीयता के लिए व्हाट्सएप को एक से 10 के बीच रेटिंग देने के लिए कहा गया था. एक रेटिंग देने का मतलब था कि वे व्हाट्सएप पर मिलने वाली खबरों पर बिलकुल भरोसा नहीं करते हैं और 10 का मतलब था इन पर पूरी तरह से भरोसा करते हैं. इस सर्वे में 14 राज्यों के 1018 लोगों को शामिल किया गया था. यानी एक राज्य से केवल 72 लोग. सबसे पहले तो इतने कम लोगों के आधार पर सवा सौ करोड़ लोगों के बारे में कोई राय बना पाना ठीक नहीं लगता. अगर इसे नजरअंदाज कर भी दें तो इस सर्वे से जुड़े बाकी आंकड़े ही अखबार और सर्वे की रिपोर्ट से उल्टी बात कहते नजर आते हैं.

इस सर्वे में बताया गया है कि करीब 70% लोगों ने व्हाट्सएप की विश्वसनीयता को 1 से 5 के बीच रेट किया है. यानी वे इस पर आने वाली सभी खबरों पर भरोसा नहीं करते हैं. डीईएफ के इसी दावे को अखबार ने अपनी रिपोर्ट और उसके शीर्षक - भारतीय ग्रामीण व्हाट्सएप के संदेशों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करते - का आधार बनाया है. लेकिन खबर के साथ प्रकाशित चार्ट (ऊपर) पर गौर करें तो पता चलता है कि व्हाट्सएप को 5 रेटिंग देने वाला व्यक्ति इस पर आने वाली खबरों में से आधी को सच मानता है. इस तरह व्हाट्सएप को 5 से 10 के बीच रेट करने वाले लोग व्हाट्सएप पर आने वाली आधी से ज्यादा खबरों को सही मानते हैं. ऐसे लोगों का कुल प्रतिशत 48.6 है. यानी इस सर्वे में भाग लेने वाले आधे लोग व्हाट्सएप पर आने वाली आधी या उससे ज्यादा खबरों पर यकीन करते हैं. इसके अलावा 2 से 4 के बीच रेटिंग करने वाले करीब 37 फीसदी लोग भी व्हाट्सएपर मिली सभी सूचनाओं को पूरी तरह से नहीं नकारते हैं.

इसे सरल भाषा में ऐसे भी समझा जा सकता है कि अगर ग्रामीण भारत में 10 करोड़ व्हाट्सएप यूजर हैं तो इनमें से पांच करोड़ से ज्यादा लोग व्हाट्सएप पर आये आधे से ज्यादा संदेशों को सही मानते हैं. और बचे हुओं में से करीब साढ़े तीन करोड़ लोग भी हर 10 में से करीब दो या उससे ज्यादा संदेशों को सही मानते हैं. यह आंकड़ा इतना बड़ा है तो फिर सुरक्षा एजेंसियों या सरकार या फिर एक सामान्य व्यक्ति के लिए राहत की बात कैसे हो सकता है!

इसके अलावा डीईएफ की इस रिपोर्ट में यह आंकड़े भी पेश किए गए हैं कि सर्वे में शामिल 45 फीसदी लोगों को रोजाना 6 से 20 फॉर्वर्डेड मैसेज मिलते हैं. अगर इन्हें प्रति व्यक्ति 10 मेसेज भी मान निया जाए तो सर्वे में शामिल आधी जनता रोजाना व्हाट्सएप पर मिलने वाले कम से कम 5 संदेशों को सही मानती है.

इससे हटकर, सर्वे की रिपोर्ट का एक तीसरा डेटा एक और चिंताजनक बात की तरफ इशारा करता है - 20 प्रतिशत लोग नहीं मानते हैं कि व्हाट्सएप पर वायरल संदेश हिंसा का कारण बन सकते हैं. यानी कि ग्रामीण व्हाट्सएप यूजर्स के पांचवे हिस्से के लिए, जो कि एक बड़ा आंकड़ा है, व्हाट्सएप पर फैलाए जाने वाले हेट-मैसेजेज चिंता का कोई कारण ही नहीं है. ऐसे में मीडिया का यह छाप देना कि ग्रामीण भारत में व्हाट्सएप मैसेज चिंता की कोई बात ही नहीं है, खुशखबरी नहीं उसकी खुशफहमी ज्यादा लगती है.