पोलियो क्या है, इस बात से तो आप भली-भांति परिचित होंगे. नहीं हैं तो सबसे पहले संक्षेप में इसके बारे में जान लेते हैं. यह एक संक्रामक रोग है, जिसे पोलियोमेलाइटिस के नाम से भी जाना जाता है. मुख्य रूप से इसका वायरस मुंह के जरिए आपके शरीर में प्रवेश करता है. इसके बाद यह वायरस रक्त कोशिकाओं के माध्यम से केंद्रीय स्नायुतंत्र (सेंट्रल नर्वस सिस्टम) पर आघात करता है. इसके चलते हड्डियों का विकास रुक जाता है और बच्चा अपंग हो जाता है. इसका सबसे अधिक प्रभाव पांच साल तक के बच्चों पर होता है इसलिए इसे शिशु अंगघात भी कहा जाता है. विज्ञान अभी तक इसका इलाज नहीं तलाश पाया है. लेकिन पोलियो के टीके या ड्रॉप के जरिए किसी बच्चे को इसका शिकार होने से पहले बचाया जरूर जा सकता है.

आज से करीब 63 साल पहले 1955 में इस घातक बीमारी से रक्षा के लिए एक वैक्सीन (टीके) की खोज हुई थी. इसकी बदौलत दुनियाभर में करोड़ों बच्चों को पोलियो का शिकार होने से बचाया जा सका. इस टीके की खोज में सबसे अहम भूमिका निभाई थी अमेरिकी वैज्ञानिक जोनस सॉल्क ने. वे इस टीके का सफल परीक्षण करने वाली टीम के प्रमुख थे. इस टीके का सबसे पहला परीक्षण बंदरों पर किया गया. इसके बाद टीके का परीक्षण उन लोगों पर किया गया जो पहले से पोलियोग्रस्त थे. कई परीक्षणों से गुजरने के बाद साल 1955 में अमेरिकी सरकार द्वारा इसे इस्तेमाल के लिए सुरक्षित घोषित कर दिया गया. हालांकि 1961 में एल्बर्ट सेबिन द्वारा खोजी गई नई वैक्सिन के बाद सॉल्क की पोलियो वैक्सीन पर रोक लगा दी गई. लेकिन साल 2000 में अमेरिका ने एक बार फिर से सॉल्क की पोलियो वैक्सीन का इस्तेमाल शुरू कर दिया. इन्हीं डॉक्टर सॉल्क को सम्मान देने के लिए पोलियो से लड़ने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था रोटरी क्लब ने 2007 में 24 अक्टूबर को विश्व पोलियो दिवस घोषित कर दिया. बता दें कि सॉल्क का जन्मदिन अक्टूबर की 28 तारीख को मनाया जाता है.

भारत में पोलियो के खिलाफ लड़ाई

भारत में पोलियो उन्मूलन के लिए सबसे पहले 1995 में पल्स पोलियो प्रतिरक्षण (पीपीपी) अभियान की शुरुआत की गई थी. तब तक हमारे देश में पोलियो वायरस के करीब डेढ़ लाख मामले प्रतिवर्ष दर्ज किए जाते थे. इस बीमारी से निपटने के लिए देशभर में करीब 23 लाख पोलियो सहायकों की टीम तैयार की गई. 33 हजार निगरानी केंद्र बनाए गए. घर-घर जाकर पांच साल से छोटे बच्चों को पोलियो की ड्रॉप पिलाने का अभियान शुरू किया गया. लेकिन इस अभियान का कोई खास असर देखने को नहीं मिला. क्योंकि उस दौरान आई खबरों के अनुसार लोग अपने बच्चों को पोलियो ड्रॉप पिलाने से हिचकिचाते थे. उनका कहना होता था कि यह दवाई उनके बच्चों में नपुंसकता और बांझपन को बढ़ावा देगी. इस वजह से फिर 2001 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से व्यापक पैमाने पर जागरुकता अभियान की शुरुआत की गई. लेकिन 2002 में फिर से पोलियो के मामलों में बढ़ोतरी होने लगी. 2004 के दौरान दुनियाभर में नाइजीरिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और भारत केवल चार देश ऐसे बचे थे जहां पोलियो के केस सामने आ रहे थे. स्थिति की गंभीरता को समझते हुए फिर भारत ने वैश्विक संगठनों से मदद लेेने का मन बनाया.

इसके बाद भारत सरकार ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की मदद से 2004 में एक बार फिर ज्यादा बड़े स्तर पर और ज्यादा कुशलता के साथ पल्स पोलियो अभियान शुरू किया. इस बार लक्ष्य रखा गया कि पोलियो ड्रॉप आठ करोड़ बच्चों को पिलाई जाएगी. यह अभियान इतना बड़ा था कि इसका असर भी व्यापक स्तर पर दर्ज किया गया. भारत में पोलियो संक्रमण के मामलों में भारी गिरावट आई. लेकिन अभी भी यह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था. 2009 के दौरान भारत में पोलियो वायरस 741 मामले ही दर्ज किए गए, लेकिन यह संख्या उस वर्ष पूरी दुनिया में सामने आए मामलों की करीब आधी थी. हालांकि तब तक यह बात साफ हो गई थी कि बीमारी काफी हद तक काबू में आ चुकी है और भारत आने वाले कुछ सालों में पोलियो मुक्त हो जाएगा.

इस अभियान के चलते आगामी दो सालों में भारत ने पोलियो उन्मूलन की दिशा में अभूतपूर्व सफलता हासिल की. इस अभियान में जुटे 23 लाख पोलियो सहायकों की मदद से 2011 तक पोलियो को भारत से लगभग खत्म कर दिया गया. चूंकि उस साल के बाद भारत में पोलियो का कोई मामला दर्ज नहीं किया गया तो 2012 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को पोलियोग्रस्त देशों की सूची से बाहर कर दिया. इसके दो साल बाद यानी 2014 में भारत को औपचारिक तौर पर पोलियोमुक्त राष्ट्र घोषित कर दिया गया. दिलचस्प बात है कि इसी वर्ष जोनस सॉल्क का 100वां जन्मदिन भी था.