हिमालयी वायग्रा के नाम से जानी जाने वाली कीड़ा जड़ी पर जलवायु परिवर्तन के चलते खतरा मंडरा रहा है. पीटीआई के मुताबिक वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ता तापमान नौ हजार फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर पाई जाने वाली इस फंगस के लिए प्रतिकूल परस्थितियां पैदा कर रहा है.

कीड़ा जड़ी जंतु-वनस्पति की एक साझा विशिष्ट संरचना है जो उच्च हिमालयी क्षेत्रों की एक तितली के लार्वा पर फफूंद के संक्रमण से बनती है. इसका वानस्पतिक नाम ‘कार्डिसैप्स साईनोन्सिस’ है. कीड़ा जड़ी का आधा भाग जमीन के नीचे और आधा ऊपर रहता है. आम तौर पर इसकी लंबाई 7 से 10 सेमी होती है. कीड़ा जड़ी को तिब्बत और नेपाल के कुछ इलाकों में यारसा गंबू भी कहा जाता है. चीन में तो इसकी कीमत कई बार सोने से भी तीन गुना ज्यादा हो जाती है. माना जाता है कि यह नपुंसकता से लेकर कैंसर तक तमाम बीमारियों के इलाज में कारगर है.

प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज नाम के चर्चित जर्नल में छपी एक रिपोर्ट में कीड़ा जड़ी के बारे में कहा गया है, ‘यह दुनिया की सबसे कीमती जैविक वस्तु है जो इसे एकत्रित करने वाले हजारों लोगों के लिए आय का अहम स्रोत है.’ उत्तराखंड, नेपाल और तिब्बत में एक बड़ी आबादी बरसात के दो महीनों में इसे खोजने निकलती है.

अब तक यह कहा जाता रहा है कि कीड़ाजड़ी के उत्पादन में यह कमी इसके अत्यधिक दोहन से हो रही है. लेकिन शोधकर्ताओं ने इसकी वजह जानने के लिए इसे इकट्ठा करने वालों और व्यापारियों का साक्षात्कार किया. पुराने आंकड़े भी खंगाले गए. शोध करने वालों ने मौसम और तापमान से जुड़े बदलावों पर भी गौर किया. इसके बाद वे इस नतीजे पर पहुंचे कि भले ही अब कीड़ा जड़ी का दोहन कम भी कर दिया जाए तो भी जलवायु परिवर्तन के चलते इसका उत्पादन गिरता रहेगा.