मंगलवार की दोपहर द गार्जियन के दक्षिण एशिया संवाददाता, माइकल सफी ने केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी से जुड़ा एक ट्वीट किया. इस ट्वीट में उन्होंने माहवारी के दौरान महिलाओं के मंदिर जाने पर की गई, स्मृति ईरानी की टिप्पणी पर आश्चर्य व्यक्त किया था. अपने इस ट्वीट में सफी ने इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर का लिंक भी शेयर किया था. उनके यह ट्वीट करने के करीब दस मिनट बाद ही कपड़ा मंत्री की तरफ से इसका जवाब दे दिया गया. इसमें बताया गया था कि यह खबर फेक है और वे जल्दी ही इस बातचीत का पूरा वीडियो अपलोड करेंगी.

हालांकि इस आलेख में बात किसी और मुद्दे पर होनी थी लेकिन फिर भी सबसे पहले इस वाकये का जिक्र करना दो वजहों से जरूरी हो जाता है. पहली यह कि छोटा सा यह उदाहरण बताता है कि अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में भारतीय नेताओं की छवि कैसी बन रही है. और दूसरी इस बनती छवि की उन्हें कितनी चिंता है कि ऐसा न होने देने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं. अगर ऐसा न होता तो ईरानी दस मिनट के भीतर ही सफी के ट्वीट का जवाब नहीं देतीं. और इसमें इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबार की खबर को फेक न्यूज बताने के बजाय तर्कों और तथ्यों के आधार पर कोई ढंग की बात करतीं.

अब आते हैं उस मसले पर जिसे लेकर स्मृति ईरानी मीडिया और सोशल मीडिया पर चर्चा बटोर रही हैं. मंगलवार को मुंबई में एक आयोजन के दौरान स्मृति ईरानी ने केरल के सबरीमला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश दिए जाने के मुद्दे पर अपनी राय जाहिर की. इस मसले पर उनका कहना था कि प्रार्थना का अधिकार सबको है लेकिन किसी चीज को अपवित्र करने का नहीं. अपनी बात को वजन देने के लिए उन्होंने यह तर्क दिया कि ‘क्या आप माहवारी के खून से भीगे हुए सैनिटरी पैड्स अपने दोस्त के घर में ले जाएंगे? नहीं न, तो क्या ईश्वर के घर जाते हुए ऐसा करना सही होगा?’

कुछ समय पहले सुप्रीमकोर्ट ने केरल के सबरीमला मंदिर में माहवारी की आयु वाली महिलाओं को भी प्रवेश दिए जाने का फैसला सुनाया था. अब मंदिर खुलने पर महिलाएं जहां मंदिर के भीतर जाने के लिए प्रदर्शन कर रही हैं वहीं मंदिर ट्रस्ट और समर्थक बरसों पुरानी परंपरा तोड़े जाने के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं. इसी क्रम में पिछले दिनों यह अपुष्ट आरोप भी चर्चा में रहा कि मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश करने वाली एक महिला ने वहां सैनिटरी पैड्स ले जाने की कोशिश की थी.

इस आरोप को ध्यान में रखकर देखें तो स्मृति ईरानी का यह कहना बहुत से लोगों को सही लग सकता है. लेकिन अगर इसकी और स्मृति ईरानी के पूरे कथन की थोड़ी चीड़-फाड़ करें तो पता चलता है कि वे असल में पीरियड्स के दौरान महिलाओं के मंदिर जाने के ही खिलाफ हैं.

माहवारी वाली टिप्पणी करने से ठीक पहले वे कहती हैं कि ‘सुप्रीमकोर्ट के फैसले पर बोलने वाली वे कोई नहीं है क्योंकि वे एक सर्विंग कैबिनेट मिनिस्टर हैं.’ उनका यह कहना ही इस बात की तरफ इशारा करता है कि वे कोर्ट के फैसले पर कुछ ऐसा अप्रिय बोलना चाहती हैं जो बतौर केंद्रीय मंत्री उन्हें नहीं बोलना चाहिए. इसे जरा स्पष्टता से कहें तो वे उस फैसले के खिलाफ कैबिनेट मिनिस्टर होने की वजह से कुछ नहीं कहती जिसके जरिये सुप्रीम कोर्ट ने सभी महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश का अधिकार दिया था.

इस बात को सीधे न कह पाने की भरपाई स्मृति ईरानी अपना व्यक्तिगत अनुभव बांटकर करती हैं. इसमें वे बताती हैं कि वे एक हिंदू हैं जबकि उनके पति और बच्चे पारसी हैं और जब भी वे मुंबई के फायर टेंपल जाती हैं, उन्हें बाहर ही रोक दिया जाता है. ईरानी के अनुसार वे इसका सम्मान करती हैं क्योंकि पूजा करना आपका अधिकार है लेकिन मंदिर को अपवित्र किया जाना गलत है. यह उदाहरण, सबरीमला मंदिर में चल रहे विवाद से किस तरह जुड़ता है, यह समझना बहुत मुश्किल बात नहीं है - अगर परंपरा कहती है तो मंदिर में महिलाओं का जाना ठीक नहीं है.

अब अगर खून से भरे सैनिटरी पैड्स लेकर दोस्त के घर जाने वाली टिप्पणी पर आएं तो यह पहली नजर में जरा उलझाने वाली लगती है. सिर्फ इसे सुनने से यह स्पष्ट नहीं हो पाता है कि स्मृति ईरानी ने यह टिप्पणी सैनिटरी पैड्स लेकर मंदिर जाने की एक महिला की कथित कोशिश पर की है या पीरियड के दौरान महिलाओं के मंदिर जाने पर. लेकिन इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि किसी महिला ने मंदिर के अंदर सैनिटरी पैड्स ले जाने की कोई कोशिश की थी. और इसे वह महिला भी झुठला चुकी है. ऐसे में सिर्फ अपुष्ट आरोपों पर केंद्रीय मंत्री का टिप्पणी करना सही नहीं लगता.

दूसरा उन्होंने फायर टेंपल वाले अपने उदाहरण से जो समझाया था उसके साथ रखकर देखें तो यही लगता है कि उन्होंने पारियड के दौरान महिलाओं के मंदिर जाने की बात पर ही यह सवाल किया था कि ‘क्या आप माहवारी के खून से भीगे हुए सैनिटरी पैड्स अपने दोस्त के घर में ले जाएंगे?’ स्वाभाविक है कि कहीं भी खून से भरे पैड्स कोई हाथ में लेकर तो जाएगा नहीं. इस तरह के पैड्स लेकर जाने का मतलब है कि महिला उस समय उस पैड का इस्तेमाल कर रही है. ऐसे में स्मृति के सवाल का जवाब कुछ यूं हो जाता है कि ‘हां, हम महिलाएं खून से भरे पैड्स लेकर अपने दोस्तों के घर जाती हैं और इस तरह मंदिर भी जा सकती हैं!