छत्तीसगढ़ की 90 सीटों के लिए विधानसभा चुनाव दो चरणों में होने हैं. इससे पहले साल 2003, 2008 और 2013 के चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस को मात दी थी. इस तरह बीते 15 वर्षों से राज्य की सत्ता पर भाजपा काबिज है. अब 2018 के चुनाव में पार्टी की यही उपलब्धि उसकी सबसे बड़ी चुनौती बनती हुई दिख रही है. माना जा रहा है कि इस बार पार्टी को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है. साथ ही नोटा (सभी उम्मीदवारों को खारिज करने का विकल्प) भी पार्टी नेतृत्व के सामने खड़ी इस चुनौती को बढ़ाता दिखता है.

शायद संघ परिवार को भी इसका अहसास है. हाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत भी नोटा को लेकर लोगों को सावधान करते हुए दिखे. बीते महीने विजयादशमी के मौके पर उनका कहना था कि चुनावों में नोटा का इस्तेमाल राष्ट्रहित के खिलाफ है. उन्होंने कहा कि सभी को खारिज करने का विकल्प सबसे अयोग्य उम्मीदवारों के पक्ष में ही जाता है. इससे पहले बीते महीने विज्ञान भवन में आयोजित संघ के कार्यक्रम में भी उन्होंने नोटा पर इसी तरह की बातें की थी.

माना जा रहा है कि भागवत के इस बयान की वजह वे खबरें हैं जिनमें कहा जा रहा है कि अनुसूचित जाति-जनजाति (एससी-एसटी) कानून पर मोदी सरकार के रुख ने भाजपा के कोर वोटर माने जाने वाले सवर्ण तबके को नाराज कर दिया है. मोदी सरकार ने एक विधेयक लाकर इस कानून के कुछ प्रावधानों को ढीला करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया था. इस नाराजगी को जाहिर करने के लिए भाजपा समर्थक इस समाज के एक तबके ने चुनावों में नोटा के इस्तेमाल की चेतावनी दी है. माना जा रहा है कि इसके जरिये ये समर्थक पार्टी को यह संदेश देना चाह रहे हैं कि वे भाजपा को छोड़कर किसी अन्य दल के साथ तो नहीं जा रहे, लेकिन वे भाजपा के साथ भी नहीं हैं.

छत्तीसगढ़ में 2013 के चुनावों में कुल मतदाताओं में तीन फीसदी (चार लाख) ने नोटा का इस्तेमाल किया था. यह आंकड़ा 2013 में नोटा का विकल्प दिए जाने के बाद किसी विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक है. ऐसे में माना जा रहा है कि राज्य की भाजपा सरकार अपने समर्थकों की नाराजगी यदि दूर नहीं कर पाई तो छत्तीसगढ़ अपने पुराने रिकॉर्ड को भी तोड़ सकता है. ऐसी स्थिति में नोटा चुनाव के नतीजे तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है.

सूबे में अब तक के सभी तीनों चुनावों पर नजर डालें तो कांग्रेस और भाजपा के वोट प्रतिशत का अंतर लगातार घटता हुआ दिखता है. यानी दोनों पार्टियों के बीच करीबी मुकाबला रहा है. साल 2003 के चुनावों में वोट शेयर के मामले में भाजपा, कांग्रेस से 2.5 फीसदी आगे थी. वहीं, 2008 और 2013 में यह आंकड़ा घटकर केवल 0.5 फीसदी रह गया. ये आंकड़े नोटा को लेकर भाजपा की चिंता को वाजिब ठहराते हुए दिखते हैं. यानी यदि भाजपा समर्थक मतदाताओं का एक छोटा सा हिस्सा भी चुनावों में नोटा को चुनता है तो इससे भाजपा के सामने बड़ी मुसीबत पैदा हो सकती है.

भाजपा नेतृत्व की नोटा को लेकर आशंका को वोटरों द्वारा नोटा चुनने का पैटर्न भी बढ़ाता हुआ दिखता है. बीते पांच वर्षों में नोटा का सबसे अधिक इस्तेमाल माओवाद प्रभावित इलाकों के साथ दलित और आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों पर किया गया है. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की एक रिपोर्ट के मुताबिक उन सीटों पर, जहां आदिवासियों की आबादी 50 फीसदी से अधिक है, कुल मतों में 2.4 फीसदी हिस्सेदारी नोटा की रही है. वहीं, इनकी आबादी 10 फीसदी से कम होने पर यह आंकड़ा घटकर एक फीसदी रह गया. सूबे की 90 सीटों में से 39 सीटें आरक्षित हैं. इनमें से अधिकांश सीटें माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में आती हैं. इनमें नोटा के बढ़ते चलन के पीछे की वजह गैर-आदिवासियों का विरोध मानी गई है. इसकी पुष्टि 2013 के चुनावी नतीजों के अध्ययन से भी होती है. सूबे की अनारक्षित 51 सीटों पर औसतन 3,570 मतदाताओं ने नोटा का इस्तेमाल किया था. वहीं, आरक्षित सीटों के लिए यह आंकड़ा बढ़कर 5,615 हो गया.

छत्तीसगढ़ में 17 सीटें ऐसी हैं जिन पर पिछले चुनाव में उम्मीदवारों की हार-जीत का अंतर नोटा को हासिल मतों से कम रहा है. तखतपुर का उदाहरण लें. यहां भाजपा के राजू सिंह शास्त्री ने कांग्रेस उम्मीदवार को 608 मतों से मात दी थी. इस सीट पर 1,557 मतदाताओं ने ईवीएम पर नोटा का बटन दबाया था.

ये सभी आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि नोटा की वजह से छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार को लगातार चौथी बार राज्य की सत्ता हासिल करने में भारी चुनौती का सामना करना पड़ा सकता है. माना जा रहा है कि इस चुनौती को ही भांपते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने नोटा को लेकर न सिर्फ चिंता जाहिर की बल्कि इसके इस्तेमाल को राष्ट्रहित से जोड़कर वे भाजपा के पक्ष में एक सोच पैदा करने की कोशिश करते हुए भी दिखाई दिएं.