मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में तो विधानसभा चुनावों के चलते राजनीतिक उठापटक और शतरंज की बिसातें बिछ रही हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिए बाजियां अभी से खेली जाने लगी हैं. लोकसभा उपचुनावों के नतीजों के बाद विपक्ष के महागठबंधन का जो सोडावाटरी उफान आया था वह अब थम सा गया है. पहले अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने गठबंधन में कांग्रेस को उसकी हैसियत बताई. इसके बाद बसपा ने जिसकी मुखिया मायावती ने छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी को अपने साथ जोड़ कर और मध्य प्रदेश में अकेले दम पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया. रही सही कसर बसपा नेता और पार्टी के एकमात्र प्रवक्ता सुधींद्र भदौरिया ने यह कह कर निकाल दी कि राहुल गांधी की तुलना में मायावती प्रधानमंत्री पद की अधिक मजबूत दावेदार हैं.

ऐसे में भी उत्तर प्रदेश में भगवान भरोसे बैठी कांग्रेस को अभी भी किसी चमत्कार की उम्मीद है. उसे लग रहा है कि एकाएक हवा बदल जाएगी और कांग्रेस यूपी में अश्वमेध यज्ञ के घोड़े पर सवार हो जायेगी. हालांकि आज भी उत्तर प्रदेश कांग्रेस का राज्य संगठन खड़ा नहीं हो पाया है. कामचलाऊ अध्यक्ष राजबब्बर हैं, मगर टीम पुराने अध्यक्ष के जमाने वाली ही है. पार्टी उत्तर प्रदेश में सिर्फ एक नई मीडिया टीम बनाकर चुनाव की वैतरणी पार करने की उम्मीद लगाए बैठी है. बाकी सब उम्मीदें आजादी की लड़ाई और कांग्रेस के इतिहास पर टिकी हैं. हालांकि लखनऊ में एक कार्यक्रम के लिए आये कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने सार्वजनिक तौर पर यह भी स्वीकार कर लिया है कि अब महागठबंधन की संभावनाएं नहीं दिख रहीं लेकिन, यूपी में गठबंधन जरूर होगा.

वैसे उत्तर प्रदेश में गठबंधन की उम्मीद लगाए बैठी पार्टियों में कांग्रेस इकलौती नहीं है. अखिलेश यादव को भी उम्मीद है कि बसपा के साथ तो उसका गठबंधन होना ही है. अजित सिंह का राष्ट्रीय लोकदल भी गठबंधन के सहारे एक आध सीट जीतने और अस्तित्व बचाए रखने की उम्मीद में है. गठबंधन की उम्मीदों में कुछ नए दावेदार भी हैं. इनमें पहला नाम शिवपाल सिंह यादव के सेक्युलर मोर्चे का है. दूसरा नाम बरसों से निर्दलीय के रूप में तुरुप का इक्का बने रहे रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया का है. अब तक भाजपाई दिखते अमर सिंह भी गठबंधन की उम्मीदें बनाने और बिगाड़ने में सक्रिय दिख रहे हैं.

पहले बात शिवपाल यादव की जिन्होंने ना नुकुर करते-करते आखिरकार अपनी अलग राजनीतिक खिचड़ी पकानी शुरू कर ही दी है. सेक्युलर मोर्चे से शुरू उनका सफर अब प्रगतिशील समाजवादी पार्टी तक पहुंच चुका है. चुनाव आयोग में वे चुनाव चिन्ह के लिए आवेदन भी कर चुके हैं. सारे जिलों में उनके जिला अध्यक्ष घोषित हो चुके हैं. मीडिया को साधने के लिए प्रवक्ताओं की टीम भी बन चुकी है और अब तो खुल कर राजनीति करने के लिए मोदी सरकार ने उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री आवास के रूप में मायावती से खाली कराया गया एक आलीशान बंगला भी दे दिया है. शिवपाल अब इसी नये ठिए से अपनी राजनीति चला रहे हैं. समान विचारधारा वाले दलों से अगर कोई गठबंधन का प्रस्ताव आता है तो शिवपाल उस पर विचार करने को तैयार भी हैं. यानी बंगला जरूर बड़ा है मगर दरवाजे खुले हुए हैं.

25 साल से निर्दलीय विधायक रह कर अपनी एकला चलो की राजनीति चला रहे रघुराज प्रताप सिंह पहली बार विधायक बनने के बाद से मायावती को छोड़कर उत्तर प्रदेश की हर सरकार में मंत्री रहे, रुतबे और पावर का मजा लेते रहे. अब राजनीति में 25 वर्ष पूरे करने पर राजा भैया को निर्दलीय से दलीय राजनीति ज्यादा फायदेमंद दिखने लगी है. इसलिए 30 नवंबर को लखनऊ में एक बड़ी रैली में राजा भैया की राजनीतिक पार्टी की घोषणा होने जा रही है. बरसों से राजा भैया खुद अपने इलाके कुंडा और नजदीक की एक सीट से उनका प्रतिनिधि विधानसभा चुनाव जीतते रहे हैं. सूबे में चलने वाली किसी भी लहर से उनकी जीत प्रभावित नहीं हो पायी. हालांकि पहले भी राजा भैया को अपने खोल से बाहर आकर क्षत्रिय राजनीति का अगुवा बनने के अवसर मिले थे, लेकिन वे इससे बचते रहे. मगर अब वे भी 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक पहचान को किसी दल के दायरे में बांध लेना चाहते हैं. उनके मुताबिक सोशल मीडिया के जरिए अपने समर्थकों की राय पूछ कर उन्होंने राजनीतिक दल बनाने का निर्णय कर लिया है.

उधर, अमर सिंह भी एकाएक उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय दिखने लगे हैं. भाजपा के समर्थक दिखने के साथ-साथ उनका लक्ष्य सपा नेता आजम खान से बदला लेना भी दिखता है. इसीलिए उन्होंने एक जागरण यात्रा के बाद लखनऊ के गोमती नगर थाने में आजम खान के खिलाफ 17 अक्टूबर को एक रिपोर्ट दर्ज कराई है. इसमें उन्होंने आजम पर अपनी छवि खराब करने, अपनी बेटियों की हत्या की धमकी, दंगे भड़काने और देश की एकता को खंडित करने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं. एफआईआर की भाषा और आरोपों की स्पष्टता बताती है कि यह रिपोर्ट एक सामान्य आपराधिक शिकायत नहीं है बल्कि इसके स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य भी हैं.

इन तीनों राजनीतिक हलचलों का जो एक मकसद सामान्यतः दिखता है वह बताता है कि इनके पीछे राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं. लेकिन प्रत्यक्षतः यह भी दिखता है कि योगी सरकार इन राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को उभारने में अपनी ओर से पूरा सहयोग कर रही है. शिवपाल सिंह यादव के आईएएस दामाद की प्रतिनियुक्ति के मामले में केंद्र सरकार ने जिस तरह नियमों को किनारे करके शिवपाल को मदद पहुंचाई उसके संकेत बहुत अस्पष्ट नहीं थे. शिवपाल को मायावती वाला बंगला देना इस कड़ी की अगली किश्त मानी जा रही है. शिवपाल खुद कहते हैं, ‘हमारी पार्टी भाजपा को मजबूती देगी या नुकसान पहुंचायेगी यह अब मेरा निर्णय नहीं रह गया है. हम कदम आगे बढ़ा चुके हैं. जिसे हमारे बारे में जो सोचना हो सोचे.’

वैसे शिवपाल के पास अपनी पार्टी बनाने के लिए बहुत सारे और तर्क भी हैं, लेकिन यह बात भी बहुत अस्वाभाविक नहीं लगती कि समाजवादी पार्टी और परिवार में अपनी उपेक्षा और अपमान के बाद वे अपनी बगावत को धार देने के लिए अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों से मदद ले रहे हैं. राजा भैया के बारे में तो पहले से ही यह माना जाता है कि उनकी भाजपा से निकटता रही है. अब प्रचंड बहुमत वाली उत्तर प्रदेश सरकार ने राजधानी लखनऊ का सबसे चर्चित अखिलेश यादव वाला बंगला उन्हें देने की बात करके इस निकटता को और मजबूती दे दी है. राजा भैया की नई पार्टी भाजपा के लिए इस बंगले का रिटर्न गिफ्ट हो सकती है, ऐसा माना जा रहा है.

वैसे तो उत्तर प्रदेश में करीब 433 पंजीकृत राजनीतिक दल मौजूद हैं, लेकिन पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव के दौरान रची गई भाजपा की रणनीति ने राज्य में छोटे राजनीतिक दलों की पौ बारह कर दी है. अपना दल जैसे सीमित जनाधार वाले दल को लोकसभा चुनावों में भाजपा के साथ रहने के पुरस्कार में केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिली थी. ऐसा ही पुरस्कार विधानसभा चुनाव के बाद सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी नामक एक अनजान राजनीतिक दल के ओम प्रकाश राजभर को भी उत्तर प्रदेश में मंत्री की कुर्सी के रूप में मिला. इस बात ने भी उत्तर प्रदेश में छोटे राजनीतिक दलों की संभावनाओं को बढ़ा दिया है क्योंकि एक सीट हासिल होने पर भी सरकार में हिस्सेदारी की संभावनाएं बनी रहती हैं.

कुछ का मानना है कि छोटे-छोटे क्षेत्रीय अथवा जातीय दलों को साथ रखकर या उनके जरिए विपक्षी किलों में सेंधमारी की कोशिश करके भाजपा विपक्ष के वोटों की गिनती छोटी करना चाह रही है. इस बात में वजन भी लगता है. प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोकसभा चुनावों में सीटें हासिल न भी कर पाए, मगर वह अखिलेश यादव के लिए चुनौती जरूर बनी रहेगी. इसी तरह राजा भैया की पार्टी अपनी सीटें हासिल कर या न करे, क्षत्रिय वोटों के नाम पर वह कांग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती है. वैसे तो चर्चाएं मायावती के बदले रुख को लेकर भी हैं कि उनकी रणनीति अब वे स्वयं तय नहीं कर रहीं, बल्कि यह जिस तोते में उनकी जान है उसके पिंजरे के मालिक के इशारों के अनुसार तय हो रही है.

बहरहाल लोकसभा चुनावों ने उत्तर प्रदेश में दस्तक देना शुरू कर दिया है और राजा हो या चाचा, सब उसी के लिए अपने अपने दरवाजे सजा रहे हैं.