हर साल विजयादशमी पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सदस्यों को सर संघचालक के संबोधन का इंतजार रहता है. केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी समेत संघ के दूसरे सहयोगी संगठन भी इस संबोधन को ध्यान से सुनते हैं क्योंकि इस संबोधन से संघ के स्वयंसेवकों और संघ के सहयोगी संगठनों के कामकाज को एक वैचारिक दिशा मिलती है. संघ में सर संघचालक के विजयादशमी संबोधन की पुरानी परंपरा रही है. इस बार संघ प्रमुख मोहन भागवत का विजयादशमी पर जो संबोधन हुआ है, उससे 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए कुछ जरूरी संकेत मिलते हैं.

राम मंदिर

अपने भाषण में संघ प्रमुख ने यह साफ किया अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण बहुत लोगों के स्वाभिमान से जुड़ा हुआ है. उन्होंने समय से राम मंदिर का निर्माण कराने के लिए सरकार को कानून लाने की सलाह भी दी. भागवत की इस बात के बाद यह माना जा रहा है कि अगले लोकसभा चुनावों में राम मंदिर के मुद्दे को हवा देने का प्रयास संघ और भाजपा दोनों की ओर से किया जा सकता है. राम मंदिर का मसला अभी उच्चतम न्यायालय में है और एक वर्ग को फैसले की उम्मीद भी है. इसके बावजूद संघ प्रमुख द्वारा इस मसले पर कानून लाने की बात करके आम मतदाताओं को यह संकेत देने की कोशिश की जा रही है कि राम मंदिर के निर्माण को लेकर संघ और भाजपा दोनों गंभीर हैं. राम मंदिर कैसे चुनावी मुद्दा बनेगा, इसका संकेत छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में मिल भी रहे हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी एक सभा में यह कहा कि बहुत जल्दी ही राम जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर का निर्माण शुरू होने वाला है.

एससी-एसटी समुदाय को लुभाने की कोशिश

संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में भीमराव अंबेडकर का नाम सात बार लिया. उन्होंने कहा कि अंबेडकर ने देश को जो संविधान दिया है, उसे और गहराई से पढ़ने की जरूरत है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बारे में उन्होंने कहा कि इन वर्गों के लिए जो योजनाएं बनाई जा रही हैं, उनका क्रियान्वयन तेजी से नहीं हो रहा है और इस काम में गति लाने की जरूरत है. मोहन भागवत की इस बात से यह अंदाजा भी लगाया जा रहा है कि संघ और उसके सहयोगी संगठन एससी/एसटी को भाजपा के पक्ष में लाने के लिए प्रयास करेंगे.

दलित अधिकारों की बात करने वाले कई संगठन केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को दलित विरोधी कहते आए हैं. ऐसे में मोहन भागवत द्वारा बार-बार अंबेडकर का नाम लेकर दलितों को यह संकेत देने की कोशिश की जा रही है कि जिस संविधान को दलित वर्ग अंबेडकर का संविधान मानता है, उसके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी. भागवत की ओर से यह बयान आना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मोहन भागवत ही थे जिन्होंने 2015 में बिहार विधान सभा चुनावों के पहले आरक्षण नीति की समीक्षा की बात कहकर विवाद खड़ा कर दिया था.

नोटा के खतरे को टालने की कोशिश

इसके अलावा मोहन भागवत ने 100 फीसदी मतदान का लक्ष्य हासिल करने की भी अपील की है. उन्होंने यह भी कहा कि नोटा का इस्तेमाल करने से बात नहीं बनेगी. नोटा के तहत मतदाता सभी उम्मीदवारों को नकार देते हैं. संघ प्रमुख को इस बात का अहसास है कि जमीनी स्तर पर नोटा को लेकर जागरूकता बढ़ी है और बहुत सारे लोग इस बार नोटा इस्तेमाल करने की बात कर रहे हैं. राजनीतिक तौर पर बेहद सक्रिय माने जाने वाले बिहार और उत्तर प्रदेश में गांव-गांव तक इस बार नोटा के प्रति एक खास वर्ग का रुझान दिख रहा है. इस पृष्ठभूमि में संघ प्रमुख द्वारा नोटा नहीं इस्तेमाल करने की अपील को भी भाजपा की चुनावी संभावनाओं से जोड़कर देखा जा रहा है. क्योंकि जिस वर्ग में नोटा के प्रति रुझान दिख रहा है, उनमें से अधिकांश भाजपा के मतदाता रहे हैं.

सेना और पाकिस्तान

मोहन भागवत ने संबोधन में यह संकेत भी दिया कि 2019 के लोकसभा चुनावों में पाकिस्तान भी एक मुद्दा रहेगा. संघ प्रमुख ने पाकिस्तान का नाम लिए बगैर कहा कि पश्चिमी सीमा के देश में सत्ता परिवर्तन हो गया, लेकिन जम्मू कश्मीर और पंजाब में उसकी प्रत्यक्ष और परोक्ष गतिविधियों में न तो कोई कमी आई है और न ही अपेक्षित है. उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे में सेना को और मजबूत करने की जरूरत है ताकि सीमावर्ती इलाकों के लोग सुरक्षित महसूस करें.

मोहन भागवत के इस बयान से साफ है कि सेना और पाकिस्तान दोनों चुनावी मुद्दा रहेंगे. सेना और उसके कामकाज से संबंधित सकारात्मक बातों को आम लोगों के बीच ले जाने के लिए मोदी सरकार और भाजपा दोनों सक्रिय दिखती है. इसी तरह पाकिस्तान को लेकर भी सरकार और पार्टी के स्तर पर लगातार बयानबाजी हो रही है. पाकिस्तान की नई इमरान खान सरकार ने बातचीत की इच्छा जताई थी, लेकिन कश्मीर की जमीनी परिस्थितियों का हवाला देते हुए भारत ने बातचीत से इनकार किया. संघ प्रमुख के संबोधन और मोदी सरकार के रुख को देखते हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान का भी यह बयान आ गया कि पाकिस्तान भारत में चुनावी मुद्दा है, इसलिए अब पाकिस्तान बातचीत की पहल भारत में अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों के बाद करेगा.

कुल मिलाकर देखें तो मोहन भागवत का इस बार का संबोधन भाजपा के चुनावी अभियान को मुद्दों के स्तर पर एक दिशा देने वाला संबोधन है.