‘मिर्जापुर’ की झलकियों में दो चीजें हतप्रभ कर देती हैं.

किसी भी फिल्म या वेब सीरीज के प्रति आशावान होने के लिए पूरे ट्रेलर से प्रेम करना कभी आवश्यक नहीं होता. कई बार केवल एक-दो झलकियां उत्सुकता की खिड़की खोलने के लिए काफी होती हैं. हमें मालूम है कि अवैध हथियारों के इर्द-गिर्द बुनी गैंगवॉर की कहानी कहने वाली ‘मिर्जापुर’ में हिंसा वैसे ही सर्वव्यापी होगी जैसे अगर कभी मलीहाबाद शहर पर फिल्म बनी तो दशहरी आम! लेकिन सवाल है कि वो हिंसा कितनी कल्पनाशील होगी?

अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में अगर मार्टिन स्कॉरसेसी, टेरंटिनो, डेविड फिंचर, माइकल हैनके, गैस्पर नोए जैसे दिग्गज निर्देशक हिंसा को ‘विचलित करने वाली खूबसूरती’ देने के लिए जाने जाते हैं, तो हिंदी सिनेमा में हिंसा के विजुअल्स गढ़ने में अनुराग कश्यप का कोई सानी नहीं है. उनकी फिल्मों की हिंसा कविता वाली खूबियां लिए होती है. इसलिए जब उनकी ही फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की याद दिलाने वाली वेब सीरीज का ट्रेलर आता है तो वो ट्रेलर हमसे कुछ कहे उससे पहले हमारा उससे पूछना जरूरी हो जाता है - भाई मेरे, इसमें नया क्या है?

पहला नयापन ट्रेलर की उस झलक में नजर आया जो पलक झपकाते ही गायब हो जाती है, और तब आती है जब एक पुलिस वाला गन चलाता है और गोली सीधे जाकर कार से खुशी-खुशी बाहर झांक रही एक महिला – जो कि बड़े साइज का काला चश्मा पहने हुए है – की आंख फोड़ देती है. बेहद विचलित करने वाला यह दृश्य – और आगे चलकर इसी अंदाज में एक खोपड़ी का खुलना - स्थापित कर देता है कि अनुराग कश्यप और दूसरे अंतरराष्ट्रीय निर्देशकों के स्तर वाले कल्पनाशील हिंसक विजुअल्स ‘मिर्जापुर’ में देखने को हर हाल में मिलने वाले हैं.

दूसरा नयापन ट्रेलर के एक हफ्ते पहले आए टीजर में नजर आता है. क्राइम आधारित किसी भी वेब-सीरीज के लिए इन दिनों यह जरूरी है कि नायक या खलनायक की पृष्ठभूमि बेहद रोचक रखी जाए. गैंगवॉर और आपसी कॉन्फ्लिक्ट्स के एपीसोड दर एपीसोड उभरने से पहले उनका ‘धंधा’ नयनाभिराम तरीके से स्थापित किया गया हो. उदाहरण के लिए हर दिल अजीज ‘नार्कोस’ को याद किया जा सकता है और ब्रिटिश सीरीज ‘पीकी ब्लाइंडर्स’ को भी. ‘मिर्जापुर’ का एक टीजर अपने मुख्य खलनायक ‘कालीन भईया’ को स्थापित करते वक्त उनके धंधे की झलक देकर मन मोहता है और इन दिलचस्प सीरीज के स्तर का होने का प्रयास करता हुआ मालूम होता है. उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर शहर में कालीन बनाने का व्यवसाय प्रचलन में है और ‘मिर्जापुर’ नामक यह वेब सीरीज उसी व्यवसाय का उस्ताद बनाकर पंकज त्रिपाठी को हमारी नजर करती है. और फिर, गोल-गोल तह करके रखी कालीनों के अंदर से झांकती गनों के विजुअल्स हमें हतप्रभ कर देते हैं.

Play

थे न कितने खूबसूरत विजुअल! कारखाने में तह करके रखे गए कालीन ही कालीन और उनमें लिपटी गन व लाश के पैर. जब सिनेमा यथार्थ में अपने पैर इस अंदाज में जमाता है, तो उत्सुकता की खिड़की चौड़ी खुल ही जाती है!

पंकज त्रिपाठी को हास्य-विनोद में डूबे किरदारों से मशहूरियत ज्यादा मिली है, लेकिन उनके घनघोर क्रूर खलनायक वाले किरदार ज्यादा बेजोड़ हैं. इन्हें मुख्यधारा के दर्शकों द्वारा खूब देखा जाना चाहिए क्योंकि तभी इस एक्टर की रेंज का भान दर्शकों को होगा. ‘गुड़गांव’ फिल्म का केहरी सिंह और नेटफ्लिक्स पर दिखाई जा रही सीरीज ‘पाउडर’ का नावेद अंसारी उनके ऐसे दो किरदार हैं जो न्यूनतम भाव-भंगिमाओं वाले अद्भुत मिनिमलिस्ट अभिनय के उदाहरण हैं. खासकर नावेद अंसारी, क्योंकि वो 26 एपीसोड के दरमियान आप पर धीरे-धीरे चढ़ता है और बेहिसाब असर छोड़ता है. नौ एपीसोड होने की वजह से ‘मिर्जापुर’ का फैलाव भी कालीन भईया को नावेद अंसारी जितनाप्रभावी और यादगार बना सकता है, ऐसा इस वेबसीरीज का ट्रेलर कहता है!

Play

मिर्जापुर से गृहमंत्री राजनाथ सिंह की राजनीति शुरू हुई थी और 70 के दशक में वे उस शहर के एक कॉलेज में फिजिक्स पढ़ाया करते थे. ‘मिर्जापुर’ की राजनीतिक समझ भी शार्प नजर आ रही है, क्योंकि इसके ट्रेलर के अंत में बेहतरीन नजर आ रहे अली फजल अमेरिका की गन-संस्कृति को निशाना बनाकर एक करारा संवाद बोलते हैं – ‘अटैक में भी गन, डिफेंस में भी गन, हम बनाएंगे मिर्जापुर को अमरीका! धड़-धड-धड़-धड़-धड़!’