तालिबान के बढ़ते प्रभाव और उसके लगातार हमलों से जूझ रही अफ़ग़ानिस्तान सरकार को लगातार झटके लग रहे हैं. 18 अक्टूबर को देश के दक्षिणी प्रांत कंधार में एक उच्चस्तरीय बैठक हो रही थी. इसी दौरान सुरक्षाकर्मी के भेस में आए एक आतंकी ने प्रांतीय पुलिस के मुखिया अब्दुल राज़िक़ और ख़ुफ़िया प्रमुख अब्दुल मोमिन की गोली मारकर हत्या कर दी. हमले की जिम्मेदारी तालिबान ने ली. अब्दुल राज़िक़ अफ़ग़ानिस्तान के लिए कितने महत्वपूर्ण थे इसका अंदाज़ा इसी से लग जाता है कि उनकी मौत के तुरंत बाद कंधार प्रांत के चुनाव स्थगित कर दिए गए. तमाम दूसरी हस्तियों के साथ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस पर शोक जताया.

अब्दुल राज़िक की हत्या के बाद कहा जा रहा है कि इस घटना ने तालिबान के लिए पूरे दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा करने का रास्ता खोल दिया है. क्या वास्तव में ऐसा है?

कई अंतरराष्ट्रीय पत्रकार ऐसा मानते हैं. वे बताते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान, ख़ास तौर पर कंधार प्रांत में अब्दुल राज़िक़ का क़द एक शीर्ष पुलिस अधिकारी से कहीं ज़्यादा हो गया था. वे वहां राष्ट्रीय नायक की तरह थे. उन्हें दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान का सबसे ताक़तवर व्यक्ति माना जाता था जिसे अमेरिका अफ़ग़ान सरकार की अनदेखी करते हुए भरपूर समर्थन देता था. राज़िक़ का इतना प्रभाव था कि कुछ रिपोर्टों के मुताबिक़ उन्होंने बहुत पहले ही अफ़ग़ान सरकार के आदेश तक लेने बंद कर दिए थे. उन्होंने कई बार राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी की आलोचना की जो अमेरिकी हस्तक्षेप के चलते राज़िक़ के ख़िलाफ़ कभी कोई कार्रवाई नहीं कर पाए.

राज़िक़ की मौत तालिबान के लिए जीत जैसी

साल 2014 तक अब्दुल राज़िक़ के नेतृत्व में अफ़ग़ान सेना ने अमेरिकी सहयोग से तालिबान को कंधार से खदेड़ दिया था. उनके रहते तालिबान अफ़ग़ानिस्तान पर दोबारा क़ब्ज़े के लिए हमेशा संघर्ष करता रहा. हालांकि अमेरिकी सैनिकों के अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने के बाद ईरान और रूस की मदद से उसने एक बार फिर कंधार के बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण कर लिया है. जानकारों के मुताबिक़ राज़िक़ की मौत से उसके हौसले और बुलंद हुए होंगे और अब भविष्य की शांतिवार्ताओं (अगर हुईं) में वह हावी रहने वाला है.

एश्ली जैक्सन उन पत्रकारों में शामिल हैं जो अब्दुल राज़िक़ से मिल चुके हैं और उनके क़द व प्रभाव से वाक़िफ़ हैं. उनके मुताबिक़ राज़िक़ को मार कर तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य से जुड़ी एक बड़ी लड़ाई जीत ली है. जैक्सन की मानें तो अफ़ग़ानिस्तान के पास अब्दुल राज़िक़ का कोई योग्य उत्तराधिकारी नहीं है. दूसरे जानकार भी मानते हैं कि उनके जाने से अफ़ग़ान सुरक्षा बलों में एक ‘पावर वैक्यूम’ पैदा हो गया है जो तालिबान के लिए अच्छी ख़बर है.

वहीं, तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच जो थोड़ी बहुत शांतिवार्ताएं हुई हैं, उनमें राज़िक़ की भी भूमिका रही है. उनकी मौत के बाद अफ़ग़ानिस्तान में ताक़तवर सैन्य नेतृत्व के अभाव की स्थिति है. जानकारों के मुताबिक तालिबान इसका फ़ायदा उठाएगा और इलाक़ों के नियंत्रण को लेकर सरकार से अपनी शर्तों को मनवाएगा.

जांबाज़ सिपाही से बड़ी छवि

अब्दुल राज़िक़ के इतने प्रभावशाली होने का एक बड़ा कारण यह रहा कि उनकी छवि केवल युद्धनायक या जांबाज़ सिपाही तक सीमित नहीं रही. अफ़ग़ान लोगों के बीच उन्हें राष्ट्रीय नायक का दर्जा प्राप्त हो गया था. कंधार में वे बहुत लोकप्रिय थे जिसका एक प्रमुख कारण उनका ‘अचकज़ई’ (अब्दुल राज़िक़ का सरनेम) होना था. यह सरनेम कंधार के ‘दुर्रानी’ कबीले से जुड़ा है जिनका कभी अफ़ग़ानिस्तान पर राज रहा था.

राज़िक़ की मौत के बाद एश्ली जैक्सन ने अपने एक लेख में लिखा, ‘इससे दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान ही नहीं बल्कि पूरे देश के पहले से कमज़ोर भविष्य पर ख़तरा और बढ़ गया है. हिंसक संघर्ष 2001 के बाद सबसे चरम स्तर पर पहुंच गया है. सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक़ पूरे अफ़ग़ानिस्तान में कंधार ही ऐसा प्रांत है जो यहां के और इलाक़ों के मुक़ाबले आर्थिक रूप से थोड़ा फला-फूला और तालिबान की अतिक्रमणकारी पहुंच से दूर रहा. राज़िक़ को लोग राष्ट्रीय नायक मानते थे.’

जैक्सन आगे लिखती हैं, ‘राज़िक़ पर युद्ध अपराध के आरोप थे लेकिन, उन्होंने तालिबान को खदेड़ा था और अफ़ग़ान मामलों में पाकिस्तान के हस्तक्षेप का विरोध कर उन्होंने कंधार के लोगों की प्रशंसा बटोरी थी. राज़िक़ दुश्मनों से क्रूरता बरतते थे. लेकिन इससे अफ़ग़ान लोगों के बीच उनकी छवि को कोई नुक़सान नहीं हुआ, बल्कि उन्हें फ़ायदा ही मिला.’ जैक्सन के मुताबिक़ राज़िक़ की मौत के बाद तालिबान कंधार के उन्हीं महत्वपूर्ण हिस्सों पर दोबारा क़ब्ज़ा करने के प्रयास तेज़ करेगा जहां कुछ साल पहले उसके लड़ाकों ने अब्दुल राज़िक़ के आगे घुटने टेके थे.’

अमेरिका की भूमिका

केवल एक पुलिस अधिकारी के जाने से अफ़ग़ानिस्तान अगर और ज़्यादा असुरक्षित हो गया है तो एक वर्ग इसकी एक बड़ी वजह वहां की राजनीति और अमेरिका की ग़लत नीतियों को भी मानता है. अफ़ग़ानिस्तान की राजनीति सेनापतियों की ताक़त से प्रभावित रही है. 2001 के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अमेरिका ने वहां लोकतांत्रिक सरकार की हिमायत तो की लेकिन, साथ ही अब्दुल राज़िक़ जैसे ताक़तवर सेनापतियों को भरपूर समर्थन भी दिया.

एश्ली जैक्सन के मुताबिक़ राज़िक़ को अमेरिका से जो शह मिली उससे अफ़ग़ानिस्तान के हालात उतने ही सुधरे जिससे अमेरिका को फ़ायदा हो सके. उनकी मानें तो अमेरिका ने हमेशा समस्याओं के जल्द और तात्कालिक निपटारे पर ज़ोर दिया जिसके चलते अफ़ग़ानिस्तान में लंबे वक़्त तक के लिए आर्थिक और राजनीतिक स्थायित्व नहीं आ सका. इसने भविष्य में होने वाली हिंसा और लोकतांत्रिक सरकार की अनदेखी होने के बीज बोने का काम किया. अफ़ग़ानिस्तान के मौजूदा हालात इसी का नतीजा हैं.

दरअसल अमेरिका और अन्य अंतरराष्ट्रीय ताक़तों को लगा कि केवल अब्दुल राज़िक़ ही तालिबान का मुक़ाबला कर सकते हैं. इसलिए उसने अब्दुल राज़िक़ के नकारात्मक पक्ष को नज़रअंदाज़ किया. परिणामस्वरूप, वे इतने प्रभावशाली हो गए कि कंधार में एक तरह से समानांतर सरकार चलाने लगे. कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टो के मुताबिक़ राज़िक़ ने दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान में नशे का कारोबार स्थापित कर लिया था. उन पर मानवाधिकार हनन और हिंसक संघर्षों के दौरान क़ैद किए गए लोगों (जिनमें तालिबानी आतंकी शामिल थे) से क्रूरता बरतने के भी कई आरोप थे. विकिलीक्स ने 2010 की अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि अमेरिका को इन सबका पता था लेकिन, वह राज़िक़ को अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा की गारंटी मानने की नीति पर चलता रहा.

अब वह गारंटी खत्म हो चुकी है और तालिबान को कम से कम दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान में सैन्य और सियासी पकड़ मज़बूत करने के लिए खुला मैदान मिल गया है.