बीते दिनों खबर आई कि जनता दल (यूनाइटेड) के राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष प्रशांत किशोर एक नया प्रयोग कर रहे हैं. उनकी नई टीम युवाओं को पार्टी से जोड़ने के लिए लिखित परीक्षा और इंटरव्‍यू ले रही है. इस कवायद के जरिये एक लाख युवा कार्यकर्ताओं को जेडीयू से जोड़ने का लक्ष्‍य रखा गया है. यही नहीं, प्रशांत किशोर ने कार्यकर्ताओं से कहा है कि उनमें से जो भी 15 दिन में ढाई सौ लोगों को पार्टी से जोड़ेगा उसकी सीधे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात करवाई जाएगी.

सटीक चुनावी रणनीतिकार के रूप में ख्याति पा चुके प्रशांत किशोर कुछ समय पहले औपचारिक तौर पर बिहार में सत्ताधारी जेडीयू में शामिल हुए थे. उन्हें पार्टी में शामिल करते वक्त बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू अध्यक्ष नीतीश कुमार ने उन्हें ‘भविष्य’ बताते हुए पार्टी में अहम जिम्मेदारी देने की बात कही थी. इसके बाद नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर को जेडीयू का उपाध्यक्ष नियुक्त कर दिया.

सवाल उठता है कि बतौर जेडीयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर पार्टी को क्या फायदे दिला सकते हैं. जवाब में जाने से पहले बिहार की राजनीति से जुड़ी कुछ बुनियादी बातों की पृष्ठभूमि में प्रशांत किशोर की स्थिति को समझना जरूरी है.

बिहार की राजनीति में जाति और जमात का गहरा प्रभाव माना जाता है. राज्य में लंबे समय तक शासन करने वाले लालू प्रसाद यादव और उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के बारे में माना जाता रहा है कि उसके पास यादव और मुस्लिम वर्ग का समर्थन है. वहीं 2005 से बिहार की सत्ता पर काबिज नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड को भी कुछ खास जातियों के समर्थन की बात की जाती है. बिहार में भारतीय जनता पार्टी के पास अगड़ी जातियों और कारोबारी वर्ग का समर्थन माना जाता है.

ऐसे में पिछले 15 साल में यह देखा गया है कि नीतीश कुमार का वोट बैंक जिसके वोट बैंक से जुड़ जाता है, वह चुनावों में जीत जाता है. पहले नीतीश भाजपा के साथ चुनाव लड़कर जीतते थे. 2015 में वे राजद के साथ मिलकर चुनाव जीते. अब वे फिर भाजपा के साथ हैं.

ऐसे में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को जदयू में शामिल कराने के नीतीश कुमार के निर्णय को लेकर बिहार में तरह-तरह की बातें चल रही हैं. बिहार में अच्छे ढंग से यह प्रचारित हो रहा है कि प्रशांत किशोर ब्राह्मण जाति से हैं. सवाल उठ रहा है कि जिन प्रशांत किशोर को नीतीश कुमार ‘भविष्य’ कह रहे हैं, वे बिहार की जात-जमात की राजनीति में कहां फिट बैठते हैं.

कुछ लोगों को यह भी लगता है कि जिस तरह से मायावती ने उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के लिए दलितों और ब्राह्मणों का समीकरण तैयार किया था, कुछ उसी तरह का समीकरण नीतीश कुमार भी तैयार करने की कोशिश में हैं. अगर बिहार में अन्य पिछड़ा वर्ग के एक ठीक-ठाक वर्ग और ब्राह्मणों की गोलबंदी एक तरफ होती है तो इससे जेडीयू की राजनीतिक पूंजी मजबूत होगी. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रदेश के ब्राह्मण प्रशांत किशोर को अपना नेता मानेंगे? इस अनिश्चितता के बावजूद जेडीयू के लिए प्रशांत किशोर की कई उपयोगिताएं हो सकती हैं और बतौर उपाध्यक्ष वे पार्टी को कई फायदे दिला सकते हैं.

युवा और विश्वस्त चेहरा

लालू यादव के छोटे बेटे, बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने हाल में संविधान बचाओ यात्रा की. बिहार में जहां भी उनकी सभा हुई वहां भारी भीड़ उमड़ी. तेजस्वी को लेकर लोगों में यह उत्साह तब से कहीं अधिक दिख रहा है जब से जेडीयू और आरजेडी का गठबंधन टूटा है और तेजस्वी ने सीधे लोगों से संवाद कायम करना शुरू किया है. कहा जा रहा है कि आरजेडी के नए नेता तेजस्वी यादव के मुकाबले जदयू के पास कोई युवा और विश्वस्त चेहरा नहीं था. जो युवा नेता जेडीयू में थे भी उनमें से किसी की ऐसी राज्य स्तरीय पहचान नहीं थी कि वे तेजस्वी यादव के सामने एक विकल्प के तौर पर दिख सकें. ऐसे में प्रशांत किशोर के बारे में यह माना जा रहा है कि वे जदयू की इस कमी को पूरा कर सकते हैं.

राष्ट्रीय स्तर पर नीतीश की भूमिका

प्रशांत किशोर के एक पुराने सहयोगी की मानें तो जदयू के लिए प्रशांत किशोर की एक उपयोगिता यह भी हो सकती है कि वे राष्ट्रीय स्तर पर नीतीश कुमार के लिए बड़ी भूमिका की पटकथा तैयार करें. पहले भी प्रशांत किशोर ने इसके लिए कोशिशें की थीं, लेकिन वे धरी की धरी रह गईं. उस वक्त यह कोशिश नीतीश कुमार को विपक्षी खेमे का प्रमुख नेता बनाने के लिए चल रही थी. इस बार भी प्रशांत किशोर को इस कोशिश में कितनी कामयाबी मिलेगी, यह कहना अभी मुश्किल है.

संगठन विस्तार

जदयू के एक पूर्व सांसद प्रशांत किशोर की एक और उपयोगिता बताते हैं. वे कहते हैं कि पार्टी के पास कोई स्थायी ठोस वोट बैंक नहीं है, इसलिए उसे संगठन विस्तार में दिक्कत होती है. उनके मुताबिक प्रशांत किशोर के जरिए नीतीश कुमार युवाओं के बीच पार्टी को मजबूत करने की कोशिशें कर सकते हैं. इस तरह जदयू को धीरे-धीरे जाति के दायरे से बाहर हर जाति और वर्ग के युवाओं की पार्टी के तौर पर स्थापित करने की कोशिश हो सकती है. एक लाख युवकों को पार्टी से जोड़ने की योजना का इस रिपोर्ट की शुरुआत में ही जिक्र हो चुका है.

नेतृत्व विकास

प्रशांत किशोर ने उपाध्यक्ष बनने के बाद यह स्पष्ट कर दिया है कि वे दस साल तक चुनावी राजनीति में नहीं आएंगे. उन्होंने साफ कहा है कि वे न तो लोकसभा चुनाव लड़ेंगे और न ही राज्यसभा में जाएंगे बल्कि संगठन के लिए काम करेंगे. जदयू के एक नेता ने बताया कि प्रशांत किशोर ने ऐसा करके पार्टी के बड़े नेताओं को यह संकेत देने का काम किया है कि वे किसी के लिए खतरा नहीं हैं.

उपाध्यक्ष बनने के तुरंत बाद प्रशांत किशोर ने पार्टी की युवा और छात्र इकाई के साथ बैठक की थी. इसमें तकरीबन 300 पदाधिकारी शामिल हुए. प्रशांत किशोर ने दो महीने में छात्र इकाई को 2,500 और युवा इकाई को 5,000 सक्रिय सदस्य बनाने का लक्ष्य दिया है. इस बैठक में प्रशांत किशोर ने यह संकेत भी दिया कि 2020 के विधानसभा चुनावों में 25-30 युवाओं को टिकट दिया जा सकता है. माना जा रहा है कि प्रशांत किशोर ऐसा करके जेडीयू में एक युवा नेतृत्व विकसित करने की योजना पर काम कर रहे हैं.

शासन तंत्र का आधुनिकीकरण

प्रशांत किशोर की उपयोगिता यह भी बताई जा रही है कि उनकी विशेषज्ञता का फायदा बिहार के शासन तंत्र के आधुनिकीकरण के लिए किया जा सकता है. बिहार सरकार के एक अधिकारी बताते हैं कि विश्व बैंक और कई दूसरी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से बिहार सरकार को कई बार वित्तीय सहायता इसलिए नहीं मिल पाती कि बिहार के शासन तंत्र उन संस्थाओं के पैमानों के हिसाब से नहीं है. जिस तरह से ये संस्थाएं कई सेवाओं को आॅनलाइन करने की शर्त रखती हैं, वह बिहार में नहीं है. ऐसे में बिहार सरकार के अधिकारियों को लगता है कि प्रशांत किशोर का वैश्विक स्तर पर काम करने के अनुभव का इस्तेमाल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने शासन तंत्र को और दुरुस्त करने के लिए करें.