हाल ही में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग यानी एनसीपीसीआर ने खुलासा किया है कि पिछले तीन सालों में उसे बच्चों के साथ दुर्व्यवहार की लगभग छह हजार शिकायतें मिली हैं. इसमें से 19 प्रतिशत शिकायतें यौन अपराधों और बाकी अन्य प्रकार के दुर्व्यवहार से संबंधित हैं. आयोग को सबसे ज्यादा (26 फीसदी) शिकायतें उत्तर प्रदेश से मिली हैं. 12 फीसदी शिकायतों से साथ दिल्ली दूसरे स्थान पर है. पूरे देश में सिर्फ नगालैंड ही एक ऐसा राज्य है जहां से आयोग को इस दौरान कोई भी शिकायत नहीं मिली. एनसीपीसीआर बाल यौन अपराध अधिनियम - 2012 और किशोर न्याय अधिनियम - 2015 के कार्यान्वयन पर निगरानी रखता है.

भारत में बाल यौन शोषण बहुत भयानक स्तर पर मौजूद है. नेशनल क्राइम्स रिकॉर्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर घंटे औसतन चार बच्चे यौन शोषण का शिकार होते हैं. कुछ और आंकड़ों की बात करें तो 2014 में बच्चों के यौन शोषण के जहां लगभग 90 हजार केस दर्ज हुए थे वहीं 2016 में यह आंकडा एक लाख को पार कर गया. जानकारों के मुताबिक ये आंकड़े तब हैं जब बाल यौन शोषण के ज्यादातर मामलों में एफआईआर दर्ज नहीं होती. दोषी व्यक्ति द्वारा बच्चे को डरा देना, बच्चे की बदनामी, रिश्तेदारों से संबंध खराब होने की चिंता आदि कारणों के चलते अक्सर ही ऐसे मामलों की रिपोर्ट नहीं की जाती. मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘वर्ल्ड विजन इंडिया’ की एक रिपोर्ट में सामने आया है कि बाल यौन शोषण के 98 फीसदी मामलों में आरोपित परिचित या रिश्तेदार होते हैं.

जानकारों का कहना है कि परिवार के भीतर बच्चों का यौन शोषण ज्यादा भयानक इसलिए है कि इसमें परिचित और रिश्तेदार शामिल होते हैं. उनका मानना है कि इस दुर्व्यवहार को खत्म या कम करने के लिए, सबसे पहले इस गंभीर स्थिति की व्यापक स्तर पर स्वीकृति जरूरी है. ऐसे में बच्चों के लिहाज से भी एक मी टू अभियान शुरू होने की सख्त जरूरत महसूस होती है जिसमें बच्चे घरों के भीतर अपनों द्वारा, अपने साथ किए गए यौन शोषण के अनुभव सामने लाएं.

बच्चों के मी टू अभियान की जरूरत क्यों है?

1. भारतीय मी टू अभियान में लड़कियों या महिलाओं के साथ सिर्फ सार्वजनिक स्थल या कार्यस्थल पर हुए यौन शोषण की ही चर्चा जोर-शोर से चल रही है. इस बहस में बार-बार अलग-अलग सामाजिक संस्थाएं और वहां काम करने वाले लोग ही दोषी ठहराए जा रहे हैं. ऐसे में यह छवि बन रही है जैसे हमारे घर-परिवारों के भीतर लड़कियों के लिए बेहद सुरक्षित व सम्मानजनक माहौल है और सिर्फ सार्वजनिक जगहों पर वे जब-तब यौन हमलों की शिकार होती रहती हैं. बच्चों का मी टू अभियान हमें घर-परिवार के भीतर हो रहे बच्चों और लड़कियों के यौन शोषण की भयावह तस्वीर से रूबरू कराएगा.

2. लड़कियों/महिलाओं के यौन शोषण के खुलासों में अभी तक सिर्फ मीडिया, बॉलीवुड, सामाजिक संस्थाओं, ऑफिसों और राजनीतिक पार्टियों से जुड़े व्यक्तियों पर ही दोषारोपण हो रहा है. बच्चों का मी टू अभियान हमारे सामने घर-परिवार के लोगों, परिचितों और रिश्तेदारों के उस घिनौने सच को सामने लाएगा जिसके बारे में मी टू अभियान की पीड़िताएं बिल्कुल ही चुप्पी साधे हैं.

3. मी टू अभियान के बाद सार्वजनिक संस्थाओं में महिला सहयोगियों के लिए माहौल बेहतर बनाने का दबाव बनता दिख रहा है. संभव है कि बच्चों द्वारा यौन हिंसा के असंख्य खुलासों के बाद घरों के भीतर भी बच्चों और लड़कियों के लिए यौन हिंसा मुक्त वातावरण बनने का दबाव बढ़े. सार्वजनिक जीवन में यौन अपराध के दोषियों के खिलाफ पहली बार इतने संगठित तरीके से सार्वजनिक बहिष्कार होता दिख रहा है. यौन शोषण के दोषी रिश्तेदार अक्सर ही बच्चों की चुप्पी के कारण आजीवन घरों में आते रहते हैं. इस कारण बच्चों को हमेशा उनके सामने अपने ही घर में घोर असहजता की स्थिति में रहना पड़ता है. बच्चों के ऐसे खुलासों के बाद माता-पिता पर भी दबाव बनेगा और फिर वे भी ऐसे लोगों का बहिष्कार करें और उन्हें घर पर आने से मना करें. यह स्थिति बच्चों के लिए काफी सहयोगी सिद्ध होगी.

4. आम तौर पर यौन शोषण के शिकार बच्चे एक किस्म के अपराधबोध, अकेलेपन और भावनात्मक टूटन के शिकार हो जाते हैं. एक अभियान के तौर पर ऐसे अनुभवों के सामने आने पर पीड़ित बच्चे जानेंगे कि ऐसे हादसों से गुजरने वाले वे अकेले नहीं हैं. इस अहसास से उन्हें उस बुरे अनुभव से जल्दी बाहर निकलने में मदद मिलेगी.

बच्चों का मी टू अभियान किस किस्म की चुनौती खड़ी कर सकता है?

1. यह सच है कि बच्चों का मी टू अभियान घरों के भीतर हो रहे यौन शोषण की उस खौफनाक तस्वीर को हमारे सामने उभारेगा, जिसका सामना करने से हम अभी तक बचते आ रहे हैं. इस अभियान की सबसे बड़ी और गहरी चोट ही यही होगी कि यह सामाजिक संस्थाओं, अदालतों, पुलिस, प्रशासन, सरकारों आदि से परे विवाह और परिवार जैसी घोर सुरक्षित, सम्मानित मानी जाने वाली संस्था की विश्वसनीयता पर ही गंभीर सवाल खड़े कर देगा.

2. बच्चों के अभियान से एक बड़ी चुनौती भावनात्मक स्तर पर पैदा होगी. दूसरों पर विश्वास करने भी बड़ा संकट खड़ा होगा. क्योंकि इस अभियान में सबसे विश्वसनीय लोग ही कटघरे में आ जाएंगे. हालांकि भावनात्मक खालीपन और अविश्वास की समस्या यौन शोषण के खुलासे किए बिना भी बच्चों के सामने आती ही है.

3. बच्चों द्वारा यौन शोषण के खुलासों के बाद इस बात की प्रबल संभावना है कि कई रिश्तेदारों और परिचितों के साथ सारे संबंध भरभरा जाएंगे. कइयों के मौसेरे, फुफेरे, ममेरे, चचेरे रिश्तों में खटास आ जाएगी. परिवार और रिश्तेदारी के परंपरागत स्वरूप को बड़ा झटका लगेगा.

भारत में चल रहे मी टू अभियान पर ऐसे आरोप भी लग रहे हैं कि कुछ महिलाएं किसी पुरुष के साथ संबंध विच्छेद या अन्य किसी लोभ या द्वेषवश यौन शोषण के आरोप लगा रही हैं. लेकिन बच्चों के मामले में हम आश्वस्त हो सकते हैं, कि वे किसी को फंसाने के लिए या किसी भी किस्म के दुराग्रह के चलते परिवार वालों, परिचितों, रिश्तेदारों या अजनबियों पर यौन शोषण का आरोप नहीं लगाएंगे. ऐसे में हमें घर-परिवार के भीतर हो रहे बच्चों के यौन शोषण की भयावह तस्वीर का एक बहुत ही ईमानदार ब्लू प्रिंट मिलेगा.

बच्चों द्वारा परिचितों या रिश्तेदारों की सच्चाई सामने लाने से माता-पिता के ऊपर उनके संबंध खत्म करने या उनका बहिष्कार करने का भी दबाव बनेगा. पारिवारिक और सामाजिक बहिष्कार भी यौन अपराधों को नियंत्रित करने में एक प्रभावी कारक बन सकता है. कुल मिलाकर बच्चों का मी टू अभियान घरों के भीतर बच्चों और लड़कियों को सुरक्षित माहौल देने का दबाव बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है.