एमक्यूएम को भारत से धन मिलने की बीबीसी रिपोर्ट पर पाकिस्तान की प्रतिक्रिया उतनी कड़ी नहीं है जितनी किसी को उम्मीद हो सकती थी.
बीबीसी ने एक रिपोर्ट में कहा है कि भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ न सिर्फ अल्ताफ हुसैन की राजनैतिक पार्टी मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) को धन की सहायता करती है बल्कि उसके कार्यकर्ताओं को सैन्य प्रशिक्षण भी देती है. बीबीसी की यह रिपोर्ट एमक्यूएम के कार्यकर्ताओं द्वारा ब्रितानी अधिकारियों को दी गई जानकारी और 'पाकिस्तानी सूत्रों' पर आधारित है. जाहिर सी बात है भारतीय अधिकारियों और एमक्यूएम को इसका खंडन करना था उन्होंने वही किया भी. लेकिन इस रिपोर्ट से दोनों देशों के कूटनीतिक हलकों में कुछ हलचल जरूर मच गई है.
कभी पाकिस्तानी सैन्य तंत्र के खिलाफ टिप्पणी तो कभी पाकिस्तान के जन्म पर सवालिया निशान लगाने के चलते पाकिस्तानी मीडिया भी उन्हें 'हिंदभक्त' और भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ का मोहरा बताता रहा है.
'भारतीय उप महाद्वीप का विभाजन मानव जाति के इतिहास में सबसे बड़ी भूल थी. यह ज़मीन का नहीं बल्कि खून के रिश्तों का बटवारा था.' यह बयान किसी तटस्थ टिप्पणीकार या हिंद-पाक के बीच भाईचारे की सोच को बढ़ावा देने वाले किसी सामाजिक संगठन का तो हो सकता है लेकिन पाकिस्तान का कोई राजनेता ऐसा कहने की शायद ही सोच भी सकता हो. लेकिन अल्ताफ हुसैन ने यह टिप्पणी सन 2007 में दिल्ली में आयोजित एक सम्मेलन में की थी. उस वक्त एमक्यूएम जनरल मुशर्रफ की तत्कालीन पाकिस्तानी सैन्य सरकार में शामिल था. साथ ही अल्ताफ हुसैन ने बंटवारे के वक़्त हिंदुस्तान से पाकिस्तान गए उन मुहाजिरों की ओर से माफ़ी भी मांगी और भारतीय सरकार से यह आग्रह भी किया कि 'यदि मुहाजिर वापस हिंदुस्तान लौटना चाहें तो उन्हें यहां पनाह देवें.'
इस तरह के बयानों और अल्ताफ हुसैन की पृष्ठभूमि के चलते समय-समय पर पाकिस्तान का गैर उर्दू भाषी समाज और राजनैतिक दल भी अल्ताफ हुसैन पर हिंदुस्तानपरस्त होने के आरोप लगाते रहे हैं. कभी पाकिस्तानी सैन्य तंत्र के खिलाफ टिप्पणी तो कभी पाकिस्तान के जन्म पर सवालिया निशान लगाने के चलते पाकिस्तानी मीडिया भी उन्हें 'हिंदभक्त' और भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ का मोहरा बताता रहा है. लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि कोई बीबीसी सरीखी स्वतंत्र मीडिया संस्था इस तरह की बातें दुनिया के सामने रख रही हो.
अगर अल्ताफ हुसैन के चश्मे से देखें तो जिस तरह के बयान वे देते हैं उसकी वजहें समझ में आती हैं. विभाजन से पूर्व अल्ताफ हुसैन के पिता भारतीय रेल विभाग में उत्तर प्रदेश के आगरा प्रखंड में कार्यरत थे. 1947 में एक पाक और सुनहरे भविष्य की खातिर उन्होंने नवनिर्मित पाकिस्तान के कराची शहर को चुना. यहां 1953 में अल्ताफ हुसैन का जन्म हुआ. जवान होते-होते हुसैन को पाकिस्तान में पंजाबी वर्चस्व के चलते उर्दू भाषी मुहाजिर समाज के प्रति सौतेलेपन का ऐहसास हुआ. इसके विरोध स्वरुप 1978 में पहले एक छात्र संगठन और फिर इससे 1984 में एमक्यूएम ने जन्म लिया.
अल्ताफ हुसैन के पाकिस्तान में न होने के बावजूद न तो उनके नेतृत्व को कभी कोई चुनौती मिली और न ही उनके दल के पाकिस्तान में राजनैतिक प्रभुत्व में ही कोई कमी आई.
1988 से लेकर अब तक एमक्यूएम पाकिस्तान के सिंध और हैदराबाद की सबसे बड़ी राजनैतिक ताकतों में जानी जाती रही है. 1992 में अल्ताफ हुसैन पाकिस्तान में अपनी जान को खतरा होने की वजह से ब्रिटेन चले गए और 2002 में ब्रितानी नागरिकता भी हासिल कर ली. बावजूद इसके न तो एमक्यूएम में उनके नेतृत्व को कभी कोई चुनौती मिली और न ही उनके दल के पाकिस्तान में राजनैतिक प्रभुत्व में ही कोई कमी आई. इस समय एमक्यूएम सिंध की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है और पाकिस्तान की चौथी सबसे बड़ी पार्टी. एसक्यूएम पर राजनीतिक हिंसा में शामिल होने के भी आरोप लगाए जाते रहे हैं.
निश्चित तौर पर आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बीबीसी की यह रिपोर्ट किस तरह का स्वरूप लेती है और उससे दोनों देशों के बीच किस तरह की क्रिया-प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं. फिलहाल तो पाकिस्तान ने भारत की कथित भूमिका पर कोई कड़ी प्रतिक्रिया देने की बजाय इस मामले की जांच कराने का ही फैसला किया है.