बॉलीवुड में इन दिनों हर चीज एक ‘इवेंट’ है. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री अब केवल हिंदी फिल्में बनाने वाला उद्योग नहीं रहा बल्कि उन्हें बेचने वाला गोरखधंधा भी बन चुका है. ऐसा गोरखधंधा जहां बेचने की उत्कंठा इस कदर हावी है कि औसत गुणवत्ता वाली चीजें भी अजर-अमर करने की फिराक के साथ बेची जा रही हैं. केवल नयी फिल्में नहीं, बल्कि दिन के हर पहर होने वाले सितारों के स्तुतिगान से लेकर पुरानी साधारण फिल्मों की वाहवाही तक सबकुछ बेचा जा रहा है. जिस भी चीज पर बॉलीवुड की मुहर लगी है, वह एक भव्य इवेंट की मदद लेकर बाजार में बिकने के लिए खड़ी है.

इसलिए जिन चचा गालिब का बॉलीवुड से कभी नाता नहीं रहा, उनके एक शेर का मिसरा-ए-सानी, यानी कि शेर का दूसरा मिसरा, बॉलीवुड के इस ‘इवेंट युग’ की बेजोड़ व्याख्या करने के काम आ सकता है - होता है शब-ओ-रोज तमाशा मेरे आगे!’

ऐसा ही एक तमाशा ‘मेरे’ यानी कि दर्शकों के आगे कुछ रोज पहले रचा गया. एक महा-भव्य इवेंट की शक्ल में अपने वक्त का पॉपकॉर्न एंटरटेनमेंट देने वाली एक सुपरहिट फिल्म को अजर-अमर फिल्म की तरह पेश किया गया. करण जौहर द्वारा 25 वर्ष की अल्पायु में बनाई गई ‘कुछ कुछ होता है’ का 20 बरस का हो जाना आज की तवारीख में इतना ऐतिहासिक माना गया कि एक इवेंट की शक्ल देकर उसे देश के कोने-कोने में फिर से पहुंचाया गया. किसी तरक्कीपसंद फिल्म इंडस्ट्री में यह रुतबा ‘प्यासा’ जैसी 61 साल पुरानी फिल्मों को मिलता लेकिन हमारे यहां उन फिल्मों को मिलने लगा है जिन्हें 20 साल बाद देखने पर कुछ भी नहीं होता.

श्योर! ‘कुछ कुछ होता है’ (1998) अपने वक्त की ब्लॉकबस्टर फिल्म थी. उस दौर की युवा पीढ़ी उसके प्यार में पड़ी थी और हम युवाओं के लिए उससे जुड़ी चीजों को आज याद करना नॉस्टेल्जिया की दस्तक पर एक पुराना किवाड़ खोलने जैसा अहसास कहलाएगा. शरीर से चिपकी शाहरुख खान की रंग-बिरंगी टी-शर्टें, उनकी कूल चेन, काजोल का टॉमबॉय वाला हेयरकट, फ्रेड़शिप बैंड्स के बहाने दोस्ती के फलसफे, ‘अंजली तुम नहीं समझोगी’ व ‘तुस्सी जा रहे हो’ जैसे जानलेवा संवादों से दर्शाया गया भावनाओं का अतिरेक और जुबान पर चढ़ने वाले सुरीले गानों के सहारे जगे मोहब्बत के सभी एहसासात हमें आज भी ‘कुछ कुछ होता है’ याद करने पर बारी-बारी याद आते हैं. करण जौहर ने बिला शक अपने वक्त की एक महत्वपूर्ण फिल्म उस वक्त दर्शकों को दी थी.

लेकिन इन्हीं विशेषताओं के लिए आप ‘कुछ कुछ होता है’ के दो साल बाद रिलीज हुई ‘कहो न प्यार है’ (2000) को भी याद कर सकते हैं! रितिक रोशन की वह फिल्म भी अपने वक्त में ब्लॉकबस्टर थी और उस वक्त की युवा पीढ़ी न सिर्फ उसके प्यार में पड़ी थी बल्कि ‘कुछ कुछ होता है’ की तरह ही उस फिल्म ने भी कई ट्रेंड स्थापित किए थे. मगर इसका मतलब यह नहीं है कि हिंदी फिल्मों का दर्शक 20 साल बाद ‘कहो न प्यार है’ को याद करना चाहेगा! कुछ फिल्में केवल अपने वक्त की फिल्में होती हैं और उस वक्त के गुजर जाने के बाद उन्हें सेलिब्रेट करना सिनेमा की कमतरी को दिखाता है. ऐसी हरकतें, सिनेमा के प्रेमियों को अक्सर उकताहट से भर देती हैं.

फिर ‘कुछ कुछ होता है’, ‘हम आपके हैं कौन’ या ‘दिलवाले दुल्हनिया दे जाएंगे’ भी नहीं थी कि इसने इन कमर्शियल फिल्मों की तरह सांस्कृतिक रूप से हिंदुस्तानी समाज पर असर डाला हो. अरेंज मैरिज पर रूमानियत का वर्क चढ़ाकर हमेशा के लिए भव्य शादियों को फैशनेबल बना दिया हो, या फिर प्यार के लिए परिवार से बगावत करने के क्लीशे से दूर होकर रूठे परिवार को मनाने को ही प्रेम की वास्तविक परीक्षा की तरह पेश किया हो.

जिस साल ‘कुछ कुछ होता है’ रिलीज हुई, उस 1998 में कई और भी फिल्में आईं जो मुख्तलिफ विशेषताओं के लिए याद की जाती हैं. तनुजा चंद्रा निर्देशित ‘दुश्मन’ ने खलनायक गोकुल पांडे के किरदार में पहली बार आशुतोष राणा की अद्भुत अदायगी से दर्शकों को परिचित करवाया. आमिर खान की ‘गुलाम’ ने अतिरंजना में डूबे क्लाइमेक्स रचने वाली फिल्मों के उस दौर में इस कदर रियलिस्टिक क्लाइमेक्स रचा कि नायक आमिर खान व खलनायक शरत सक्सेना के बीच की वन ऑन वन मुक्केबाजी आधारित आखिरी फाइट देखकर दर्शक दंग रह गए. मणिरत्नम ने न सिर्फ शाहरुख खान को ट्रेन के ऊपर चढ़वाकर ऐसा नचवाया कि इतिहास रच दिया बल्कि ‘दिल से’ को इतना खूबसूरत त्रासद बनाया कि आज भी इस फिल्म के दीवाने दर्शकों से मुलाकात आसानी से हो जाती है. रामगोपाल वर्मा की ‘सत्या’ ने तो गैंगस्टर व क्राइम फिल्मों का चलन बॉलीवुड में शुरू किया और इस ‘मील का पत्थर’ फिल्म ने मनोज बाजपेयी से लेकर अनुराग कश्यप जैसी बेजोड़ प्रतिभाएं बॉलीवुड को दीं.

गोविंद निहलानी ने ‘हजार चौरासी की मां’ जैसी महान फिल्म बनाई और बेटे की मौत की पड़ताल करने निकली एक मां को बेटे की विचारधारा पर चलते हुए दिखाकर हिंदी सिनेमा को मां का एक अविश्वसनीय किरदार दिया. नागेश कुकनूर ने अपनी पहली ‘इंडिपेंडेंट’ फिल्म ‘हैदराबाद ब्लूज’ नाम से बनाई और जब ‘इंडी फिल्म’ जैसा शब्द चलन में भी नहीं था तब इंजीनियरिंग की नौकरी से कमाए पैसों से फीचर फिल्म बनाकर पूरे देश को दिखाई. खुशवंत सिंह के उपन्यास पर बनी ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ भी इसी साल रिलीज हुई और महेश भट्ट ने लंबा संन्यास लेने से पहले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त आलातरीन ‘जख्म’ भी 1998 में बनाई.

लेकिन क्या, उपरोक्त किसी भी फिल्म से जुड़े किसी भी सदस्य ने अपनी उम्दा व नया चलन स्थापित करने वाली फिल्म के 20 बरस पूरे होने पर कोई उत्सव मनाया? क्या इनमें से किसी भी महत्वपूर्ण फिल्म के वैसे चर्चे 2018 में हुए जैसे करण जौहर और शाहरुख खान ने ‘कुछ कुछ होता है’ जैसी निहायत इमोशनल लेकिन साधारण फिल्म को सेलिब्रेट करके हासिल किए? बॉलीवुड के इस ‘इवेंट युग’ का यही तो नुकसान है. जो हकदार हैं वो पीछे हैं, जो तमाशा रच सकते हैं वो सेलिब्रेटिड हैं.

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इस इवेंट युग को नयी फिल्मों की रिलीज के वक्त भी शबाब पर पहुंचते देखा जा सकता है. हर नयी बड़े बजट की फिल्म की रिलीज से पहले उसके सितारे, निर्देशक, निर्माता और पीआर मिलकर उस फिल्म के इर्द-गिर्द एक उत्सव रचते हैं और हर वीकेंड मल्टीप्लेक्स जाकर फिल्में देखने वाले दर्शकों के मन में यह बात बैठाकर ही उसे छोड़ते है कि इस हफ्ते वो यही फिल्म देखने थियेटर जाएगा. अच्छी फिल्मों के एग्रेसिव प्रचार पर कोई आपत्ति नहीं कर सकता, लेकिन जब ‘रेस 3’, ‘फन्ने खां’, ‘गोल्ड’, ‘लवयात्री’ और ‘नमस्ते इंग्लैंड’ जैसी खराब फिल्मों का प्रचार भव्य इवेंट बनाकर दर्शकों को मैन्यूपुलेट करने के लिए हफ्ते दर हफ्ते किया जाता है, तो कोफ्त होती है.

प्रचार करते वक्त सितारे बड़ी-बड़ी बातों पर सतही जवाब देते हैं (जैसे मीटू – नीचे दिया गया वीडियो जरूर देखें), अपनी फिल्म की तारीफों में सच-झूठ के बीच की महीन रेखा पार करने में कतई गुरेज नहीं करते, दर्जनों साक्षात्कारों में वही जवाब दोहराते हैं जिन्हें टीवी पर सुन-सुनकर दर्शकों का मस्तिष्क दोहरा हो जाता है लेकिन पता नहीं कलाकारों का क्यों नहीं होता, और कई-कई बार प्रमोशन तथा प्रोपेगेंडा में फर्क करना खुद ही भूल जाते हैं. फिर जब शुक्रवार को खराब समीक्षाओं और मल्टीप्लेक्स की खाली पड़ी सीटों के बीच से उनकी यह सो-कॉल्ड महान फिल्म गुजरती है तो सभी कलाकार और निर्देशक और निर्माता और पीआर वाले बंदे गायब मिलते हैं! जैसे शहर-शहर जाकर करतब दिखाने वाला सर्कस कुछ दिन बाद अपना तंबू उखाड़कर दूसरे शहर की तरह प्रस्थान करता है, वैसे ही आजकल फिल्मों से जुड़े लोगों का स्वभाव हो चला है. एक फिल्म का तंबू गाड़कर तमाशा दिखाने के बाद कुछ वक्त बाद वे दूसरा तंबू गाड़ते हुए नजर आते हैं.

‘लवयात्री’ का ही प्रमोशन देख लीजिए. आयुष शर्मा की इस अति साधारण फिल्म को प्रमोट करने में बहनोई व निर्माता सलमान खान ने एड़ी-चोटी का ऐसा जोर लगाया कि न सिर्फ उनकी एड़ी आज तक दुख रही है (बिजनेस) बल्कि यह नेपोटिज्म का नया नमूना तक बन गया है.

दस का दम नामक रियालिटी शो से लेकर बिग बॉस 12 तक में न सिर्फ इस फ्लॉप फिल्म की पूरी स्टार कास्ट को सलमान ने आमंत्रित किया और एक-एक घंटे तक फिल्म को प्रमोट करते रहे बल्कि बाकी कई एपीसोड्स में भी मौके-बेमौके - ज्यादातर बेमौके ही - केवल 10 करोड़ कमाने वाली इस फिल्म और इसके गानों को याद करते हुए नजर आए. उनकी मदद लेकर रचे गए महा-इवेंट ने ऐसा माहौल बना दिया कि जैसे दो नए चेहरों वाली ‘लवयात्री’ सलमान की पहली फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ का इतिहास दोहराने से बस दो इंच ही दूर खड़ी हो. शुक्रवार को रिलीज के दिन पता चला कि वो तो ‘सिनेमा’ कहलाने से भी दो प्रकाश वर्ष दूर खड़ी थी.

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(‘नमस्ते इंग्लैंड’ के लिए हुए इस इंटरव्यू में ‘मीटू’ पर खूब (सतही) बातें हुईं, लेकिन कुछ वक्त बाद ही यहां अर्जुन व परिणीति के साथ बैठे निर्देशक विपुल शाह पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगे)

माना कि हिंदुस्तान में फिल्मों को सेलिब्रेट करने का चलन है. फील गुड एहसास को हमेशा सिनेमा से जोड़कर देखा जाता है और ‘सेलिब्रेशन ऑफ लाइफ’ को अक्सर हिंदी फिल्मों की व्याख्या करते वक्त उपयोग किया जाता है. लेकिन इन पलायनवादी शब्दों के उपयोग के बावजूद हिंदी फिल्मों और उससे जुड़े कलाकारों की ‘सच्चाई’ से दर्शक हमेशा ‘कनेक्ट’ करता रहा है. यही वजह है कि सालभर में खराब फिल्में ज्यादा और अच्छी कम बनाने के बावजूद बॉलीवुड का दर्शक अपने सिनेमा का दीवाना बना रहता है. लेकिन यह सच्चाई आज बाजारवाद के दबाव से पनपे ‘इवेंट युग’ की वजह से ओझल होती जा रही है. हर तरफ तमाशा और सर्कस रचा जा रहा है और सितारे बढ़-चढ़कर इन इवेंट्स का हिस्सा बन रहे हैं.

कभी ये सितारे अपने ट्विटर हैंडल पर खुद की उन पुरानी फिल्मों को याद करके खुश होते नजर आते हैं जो कि अपने वक्त की औसत फिल्में मानी जाती थीं तो कभी साथी सितारों की रिलीज होने से कुछ दिन दूर खड़ी नयी फिल्मों की तारीफ में जमीन-आसमान एक किए दे रहे हैं. फिर शुक्रवार को फिल्म देखने के बाद ही दर्शक समझ पाता है कि कितना झूठ उसे सोशल मीडिया पर उसका पसंदीदा सितारा ही परोस रहा है, लेकिन सितारे को इससे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वो ‘एक ही थैली के चट्टे-बट्टे’ होने के फायदा जानता है.

‘इवेंट युग’ का एक बहुत बड़ा हथियार टेलीविजन भी बन चुका है. खबरों और टीवी सीरियल के बीच ठूंसे नयी फिल्मों के स्तुतिगान के अलावा रियालिटी शोज में भी बॉलीवुड से जुड़ी हर चीज को इवेंट की तरह प्रस्तुत किया जाता है. न सिर्फ फिल्मों के प्रमोशन के दौरान खूबसूरत सितारों को बुलाकर ‘ऑन योर फेस’ इवेंटगीरी दिखाई जाती है बल्कि बॉलीवुड गीतों को गाने वाले या उनपर नृत्य करने वाले प्रतिभागियों के हर एक्ट के इर्द-गिर्द इवेंट रचा जाता है. हर कोई बॉलीवुड को बेचना चाहता है, ताकि आप उनका उत्पाद खरीद सकें.

सिंगिंग रिएलिटी शोज में हर प्रतिभागी गायक व गायिका इन दिनों बेहतरीन ही गा रहे हैं! चाहे वो प्रतिष्ठित इंडियन आइडल का मंच हो या फिर सारेगामापा का. जजों के नाम पर बैठाए गए सेलिब्रिटीज ने हेडफोन लगाकर गायकी का मूल्यांकन करना कब का छोड़ दिया है और तकरीबन हर प्रतिभागी के गाने पर अपनी सीट से उठकर वाह-वाह करना ही उनका असल काम हो गया है. हर गाने को शुरू करने से पहले मनीष पॉल जैसा बेहतरीन एंकर अपना एक हंसोड़ आइटम पेश करता है और गाने के दौरान झूम-झूमकर कार्डियो कर लेने वाले जज गाना खत्म होने के बाद उस गाने व कच्ची आवाज के प्रतिभागी की गायकी को ऐसे सेलिब्रेट करते हैं जैसे उन्हें अगला सोनू निगम या मोहम्मद रफी या किशोर कुमार मिल गया है. हर गीत के आसपास इवेंट रचा जाता है और कभी किसी सुंदर जज के प्यार में मासूम से बच्चे को पड़ते दिखाया जाता है तो कभी किसी प्रतिभागी की कमजोर आंखों को मार्मिक प्रोडक्ट बनाकर बेचा जाता है.

इस शर्मनाक तमाशे के बीच एक जमाने में सोनू निगम द्वारा संचालित सारेगामा (1995-99) जैसे सारगर्भित और गंभीर संगीत रियालिटी शो की कमी बहुत शिद्दत से महसूस होती है, और इस साल के इंडियन आइडल में शामिल सलमान अली (नीचे) जैसे आलातरीन गायक को सुनते वक्त यह अहसास लगातार टीस चुभाता है कि वे सारेगामा के उसी गरिमामय व संजीदा सेटअप के लायक प्रतिभागी हैं. न कि इस नालायक ‘इवेंट युग’ के लायक गायक.

बहुत हो चुका तमाशा मेरे आगे, बंद कर दो दर्शकों को नादान समझना प्यारे

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