निर्देशक: गौरव के चावला
लेखक: निखिल आडवाणी, परवीज शेख, असीम अरोरा
कलाकार: सैफ अली खान, रोहन मेहरा, राधिका आप्टे, चित्रांगदा सिंह, डेंजिल स्मिथ
रेटिंग: 3/5

‘मिच्छामि दुक्कड़म’ यानी मुझे क्षमा कीजिए. जैन समुदाय द्वारा मनाए जाने वाले पर्यूषण पर्व के आखिरी दिन सभी एक-दूसरे से यह कहकर जाने-अनजाने हुई अपनी गलतियों की क्षमा मांगते हैं. ‘बाज़ार’ में यह वाक्यांश आपको कई बार सुनने को मिलता है और अगर आपने पहले ही दृश्य से इस फिल्म को जज़ करने की गलती कर दी तो यह आपको भी दोहराना पड़ सकता है. इस बात की संभावना तब और बढ़ जाएगी यदि आपने ट्रेलर देखकर फिल्म देखना तय किया हो. यह भी हो सकता है कि पहला सीन देखते ही आप धत्त कहते हुए सिर पर हाथ मार लें कि ‘अरे इसने तो सारा सस्पेंस ही खत्म कर दिया, अब क्या खाक फिल्म देखेंगे!’ लेकिन ऐसा करने से बचिएगा क्योंकि ‘बाज़ार’ आपको उससे ज्यादा बहुत कुछ दिखाती है, जिसकी आपने इससे उम्मीद की होती है.

शेयर मार्केट को अपनी जमीन बनाने वाली ‘बाज़ार’ इसकी उलझाने वाली बारीकियों में नहीं पड़ती लेकिन, पटकथा को रोचक बनाए रखने लायक बातें खुद में शामिल कर लेती है. मूलरूप से धन, धुन (जिद) और धोखे की यह कहानी शेयर बाजार के भीतर चलने वाले अच्छाई और बुराई के संघर्ष को दिखाती है. पटकथा की अच्छी बात यह है कि इसके किरदारों को ठोक-पीटकर गढ़ने के अलावा फिल्म के दूसरे हिस्से, खासकर क्लाइमैक्स को खूब ध्यान से रचा गया है. आखिरी 15 मिनट में तो आप कई बार इसलिए घड़ी देखते हैं कि वक्त थोड़ा ही बचा है और कहानी खत्म होती सी लग नहीं रही है, इतने से वक्त में क्या कमाल हो पाएगा? यहीं पर यह एक के बाद एक ट्विस्ट लाकर आपकी उत्सुकता को चरम पर पहुंचाती है और रोचक अंत वाली बढ़िया मनोरंजक फिल्म बन जाती है.

हालांकि अगर आप थोड़े चौकन्ने होकर फिल्म देखें तो कई ट्विस्ट्स के आने का अंदाजा लगा सकते हैं, लेकिन यह पता होने बावजूद फिल्म इनकी बढ़िया टाइमिंग से आपके लिए पैसा वसूल साबित होती है. खामी पर आएं तो कहा जा सकता है कि अगर इनमें से कुछ सीक्वेंस जरा कम लंबाई के होते तो ‘बाजार’ नाम का थ्रिलर सिनेमा जरा और करारा होता.

सैफ अली खान, शकुन कोठारी बनकर अपने बालों की एक लट को सफेद रंगते हैं और अभिनय में थोड़ा कालापन लाते हैं यानी एक लालची और क्रूर व्यापारी के निगेटिव किरदार में नजर आते हैं. उनका यह लार्जर दैन लाइफ किरदार फिल्म में नायक-खलनायक दोनों की जरूरत पूरी देता है. प्रमोशन के दौरान दिए एक इंटरव्यू में सैफ ने कहा था कि यह फिल्म करते हुए उन्होंने लंबे-लंबे डायलॉग बोलना सीखा है. हालांकि ऐसा करते हुए वे कुछेक मौकों पर गुजराती टोन चूक जाते हैं, लेकिन उनके सटीक एक्सप्रेशंस उनको काबिल अभिनेता बताने और आपको उनका कायल बनाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ते. शकुन कोठारी बनकर वे भली-भांति समझा देते हैं कि जल्दी ही वह वक्त भी आएगा जब लोग भूल जाएंगे कि कभी सिर्फ एक खास तरीके से ‘वॉओ’ बोलकर उनकी मिमिक्री की जा सकती थी.

बॉलीवुड में डेब्यू कर रहे रोहन मेहरा इस फिल्म से मिला ‘प्लेजेंट सरप्राइज’ हैं. अब तक भले ही उनका परिचय गुजरे जमाने के अभिनेता विनोद मेहरा के बेटे रूप में दिया जाता रहा हो, लेकिन अब उन्हें इसकी जरूरत नहीं होगी, अपनी पहली फिल्म से उन्होंने इतना तो पक्का कर लिया है. अपने पिता की ही तरह सुदर्शन चेहरे वाले रोहन अपने ‘चार्म’ से तो मोहते ही हैं, अच्छे के आस-पास का काम करके खुश भी करते हैं. असल जिंदगी में ब्रिटिश एक्सेंट में अंग्रेजी बोलने वाले रोहन इलाहाबादी लहजा भी ठीक-ठाक पकड़ते हैं. ज्यादातर वक्त राधिका आप्टे के साथ फ्रेम शेयर करते हुए उनका नजर में बना रहना भी उनके अच्छे भविष्य की उम्मीद देता है. राधिका आप्टे का जिक्र आया है तो यह बताते चलते हैं कि वे हमेशा की तरह ताजा और वजनदार अभिनय करती हैं और फिल्म के लिए अपरिहार्य लगती हैं. ऐसा ही कुछ चित्रांगदा सिंह भी अपनी छोटी सी भूमिका में करती नजर आती हैं.

अपने नाम में एक अतिरिक्त ‘व्ही’ लगाने वाले गौरव चावला ने इस फिल्म का निर्देशन किया है और उन्हीं की तरह नाम में एक अतिरिक्त ‘के’ रखने वाले निखिल आडवाणी इसके निर्माता और सहलेखक हैं. फिल्म के लिए इन्होंने कोई ज्योतिषीय सलाह थी या नहीं, इसका तो पता नहीं, लेकिन फिलहाल इनका बढ़िया लेखन और निर्देशन ही बॉक्स ऑफिस पर फिल्म का भविष्य उजला बनाने के लिए काफी लगता है. बगैर किसी फलसफे के, पॉपकार्न के साथ, उतने ही हल्के-फुल्के मूड में फिल्में देखना पसंद करने वालों के लिए ‘बाज़ार’ इस हफ्ते वक्त निकालकर देखी जाने वाली फिल्म है. उनके लिए भी जो सैफ अली खान को पसंद करते हैं, और उनके लिए तो जरूर ही जो सैफ को नापसंद करते हैं.