सर्वकालिक महान फिल्मों की तमाम सूचियों में कुछ नाम सदैव पहले पांच में जगह बनाते हैं. ‘गॉन विद द विंड’ (1939), ‘सिटीजन केन’ (1941) और ‘कासाब्लांका’ (1942). ये तीनों ही अमेरिकी फिल्में क्लासिक का दर्जा रखती हैं और विश्व सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर कहलाती हैं. जहां एक तरफ ‘गॉन विद द विंड’ अपने वक्त में खूब सराही गई थी और हमेशा ही पॉपुलर फिल्म का दर्जा उसे मिलता रहा, वहीं ‘सिटीजन केन’ रिलीज के वक्त समीक्षकों को पसंद आने के बावजूद बॉक्स-ऑफिस पर अपनी लागत तक नहीं निकाल पाई और जल्द ही भुला दी गई. बाद के वर्षों में कुछ आलोचकों ने इसे दोबारा खोजा और यह वापस दर्शकों की नजर में ऐसी चढ़ी कि इसके बाद इसे चहुंओर से तारीफें ही तारीफें मिलती रहीं.

लेकिन, तीन ऑस्कर जीतने वाली ‘कासाब्लांका’ की कहानी सबसे विचित्र है! इसके निर्माण के दौरान किसी ने नहीं सोचा था कि आगे चलकर यह प्रेम-कहानी इतनी ज्यादा सराही जाएगी कि क्लासिक का दर्जा पाएगी और हर दिल अजीज हो जाएगी. आज की तरह तब भी हॉलीवुड सालभर में सैकड़ों साधारण फिल्में फटाफट बनाने के लिए जाना जाता था और ‘कासाब्लांका’ भी उन फिल्मों में से एक थी जो कि स्टूडियो सिस्टम के अंतर्गत जल्दबाजी में बनी थी. कहा जाता है कि उस वक्त के हॉलीवुड में हर स्टूडियो तकरीबन हर हफ्ते एक फिल्म बनाया करता था और इस तरह सालभर में 50 के ऊपर फिल्मों का निर्माण कर लेता था. भले ही ‘कासाब्लांका’ के साथ उस वक्त के बड़े नाम जुड़े हुए थे लेकिन सभी का मकसद बस उन 50 में से एक फिल्म बनाकर उसे रिलीज करना भर था!

द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के बीच पनपी एक त्रासद प्रेम-कहानी कहने वाली श्वेत-श्याम ‘कासाब्लांका’ मोरक्को स्थित एक शहर कासाब्लांका में घटती है. हिटलर और उसकी नाजी सेना से बचने के लिए भारी संख्या में लोग यूरोप छोड़कर अमेरिका जाना चाहते हैं लेकिन वहां पहुंचने का मुख्य रास्ता कासाब्लांका होकर गुजरता है. इसलिए इस शहर में शरणार्थियों का तांता लगा रहता है और ऐसे ही मुश्किल वक्त में इस फिल्म के बिछड़े हुए नायक व नायिका, नायक रिक के मशहूर नाइटक्लब ‘रिक्स कैफे अमेरिकैन’ में मिलते हैं. कहानी यहां से आगे बढ़ती है और त्रासद होते-होते ‘क्लासिक लव स्टोरी’ का मुकाम हासिल करती है.

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‘कासाब्लांका’ एक कभी न खेले जा सके नाटक ‘एवरीबडी कम्स टू रिक्स’ पर आधारित थी लेकिन इसकी कहानी में काफी फेरबदल हुआ. फिल्म की पटकथा कई लेखकों से होकर गुजरी और एक यह भी कारण था कि फिल्म से जुड़े किसी भी शख्स को इसके सफल होने की उम्मीद नहीं थी. कहा जाता है कि फिल्म के केऑस से भरे सेट पर ही इसकी पटकथा रोजाना लिखी जाती थी और प्रेम-त्रिकोण होने के बावजूद नायिका इंग्रिड बर्गमैन तक को नहीं पता था कि वे अंत में किस आदमी से सच्चा प्यार करेंगीं! जब वे फिल्म के निर्माता/निर्देशक से यह सवाल करती थीं तो कहा जाता था कि दोनों मर्दों (नायक हम्प्री बोगार्ट और सह-नायक व फिल्म में नायिका के पति की भूमिका निभाने वाले पॉल हैनरीड) से इस तरह प्यार अभिव्यक्त करिए कि संतुलन बना रहे! जाहिर सी बात है, कि जल्दबाजी में बनी एक फिल्म जिसके बारे में उसे बनाने वालों तक को नहीं पता हो कि वो किस दिशा में जा रही है, आखिर कैसे क्लासिक बन सकती है!

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फिल्म को पूरा का पूरा शूट निर्माता कंपनी वार्नर ब्रदर्स के कैलिफोर्निया स्थित स्टूडियो में कासाब्लांका, मोरक्को का सेट बनाकर किया गया था. यह नकलीपन आप आसानी से फिल्म देखते वक्त महसूस भी कर सकते हैं और सेट आधारित गलियों, घरों, सर्चलाइट और नाइटक्लब से फिल्म की बनावटी ‘सेटिंग’ का अंदाजा लगा सकते हैं. यहां तक कि हवाई जहाज के कुछ दृश्यों में कार्डबोर्ड के प्लेन तक का इस्तेमाल किया गया था! फिल्म देखते वक्त अगर आप क्लाइमेक्स पर गौर करेंगे तो दिखेगा कि यह सच छिपाने के लिए धुंध का किस चतुराई से इस्तेमाल हुआ है!

निर्माता से लेकर लेखकों तक की दखल और सितारों के आपसी टकराव के अलावा ‘कासाब्लांका’ के निर्देशक माइकल कर्टिस को हमारे पहलाज निहलानी की याद दिलाने वाली सेंसरशिप से भी गुजरना पड़ा था. उस दौर में तीस से लेकर साठ के दशक तक हॉलीवुड खुद अपनी ही फिल्मों को सेंसर किया करता था और ‘प्रोडक्शन कोड एडमिनिस्ट्रेशन’ नामक एक संस्था का काम होता था कि वो यह देखे कि समाज के लिए क्या चीजें देखना सही है और क्या गलत. इसलिए पहलाज निहलानी की तरह ही लाज की रक्षा करने के लिए यह संस्था फिल्मों से सेक्स आधारित चीजों को सेंसर किया करती और यही काम उसने ‘कासाब्लांका’ में भी किया.

फिल्म में एक ऊंचे ओहदे पर बैठा पुलिस अफसर ऐसा था जो कि शरणार्थियों को सेक्स के बदले अमेरिका पहुंचने का वीजा मुहैया करवाता था, ऐसे नायक-नायिका थे जो कि सालों तक बिछड़े रहने के बाद दोबारा मिलने पर दो जिस्म एक जान होने की प्रकिया पूरी करते थे, और कई सारे संवाद थे जो सीधे तौर पर सेक्स से जुड़ी बात करते थे. इस संस्था ने यह सभी फिल्म से हटवा दिए और परदे पर प्रेम करने की अनुमति नहीं दी. केवल प्रेम दिखाने की दी. इस सेंसरशिप की वजह से ‘कासाब्लांका’ को अपनी राइटिंग में एक बार फिर काफी बदलाव करने पड़े और इस एक और वजह ने फिल्म से जुड़े लोगों को इसकी सफलता के प्रति उदासीन बना दिया.

लेकिन फिर क्या वजह रही, कि इन तमाम बड़ी कमियों के बावजूद ‘कासाब्लांका’ अजर-अमर फिल्म कहलाई जाती है? जैसा कि कई दिग्गज फिल्मकार मानते रहे हैं कि फिल्में या तो राइटिंग टेबल पर बनती हैं या फिर एडीटिंग टेबल पर. ‘कासाब्लांका’ देखकर समझ आता है कि वह एडीटिंग टेबल पर बनी फिल्म है! इसकी तमाम खूबियों के अलावा जो खूबी उपरोक्त कमियों को स्क्रीन पर नजर नहीं आने देती और फिल्म को बेमिसाल नेरेटिव देती है, वह इसका जहीन संपादन है. खुद स्टीवन स्पीलबर्ग मानते रहे हैं कि ‘कासाब्लांका’ का कहानी कहने का अंदाज ‘वन ऑफ द बेस्ट टोल्ड नेरेटिव’ है.

क्योंकि युद्ध की विभीषिका, रेफ्यूजी संकट और त्रासद प्रेम-कहानी जैसी बड़े कैनवास की जरूरत वाली थीम्स को कहानी में पिरोने के बावजूद ‘कासाब्लांका’ केवल एक घंटे 42 मिनट की फिल्म है. इसमें एक भी दृश्य बेफालतू का नजर नहीं आता, और भले ही कैरेक्टर-ड्रिवन न होकर यह प्लॉट-ड्रिवन फिल्म है, लेकिन कहीं भी इसकी तेज रफ्तार अहम चीजों को पीछे छोड़ती हुई नहीं दिखती. फिल्म अपनी किसी भी प्रमुख थीम पर मेलोड्रामा नहीं रचती और जैसा कि एक किरदार नायक हम्प्री बोगार्ट के किरदार के लिए बार-बार कहता है कि वो ‘सेंटिमेंटलिस्ट’ व्यक्ति नहीं है, फिल्म भी अपने नायक की तरह किसी चीज को लेकर अति भावुक नहीं होती.

न नाजी अत्याचार को दिखाने के लिए ओवर द टॉप यातना का सहारा लिया जाता है, न रेफ्यूजी संकट को समझाने के लिए शोर होते संगीत और कई मोंटाज को मिलाया जाता है, और न ही प्रेम की तीव्रता को दिखाने के लिए लंबे-लंबे रूमानी दृश्य रचे जाते हैं. बहुत कुछ दर्शकों को खुद समझना होता है, और अगर आज भी ‘कासाब्लांका’ पहली बार देख रहा दर्शक इसकी कहानी की पृष्ठभूमि को बेहतर तरीके से समझता होगा, तो उस पर बिना अतिनाटकीय हुए रची गई यह त्रासद प्रेम-कहानी जरूर गहरा असर छोड़ेगी.

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निर्देशक माइकल कर्टिस ने न सिर्फ शूटिंग के समय पेश आई दिक्कतों को उच्च कोटि के संपादन से छिपा देने में अहम भूमिका निभाई थी बल्कि शूटिंग के वक्त भी अपनी निर्देशकीय क्षमता का वह कौशल दिखाया कि हम आज भी इस फिल्म के ब्लैक एंड व्हाइट फ्रेमों को निहार सकते हैं. कर्टिस एक खास तरह की विजुअल स्टाइल के लिए जाने जाते थे जिसमें वे मूविंग कैमरा, रचनात्मक लाइटिंग और फिल्म नोए की विशेषताओं का उपयोग करते थे. ‘कासाब्लांका’ भी इन खूबियों से लैस रही, और जहां इसके कई दृश्यों में कैमरा खूबसूरती से तैरता हुआ मालूम होता है,वहीं कई जगह रोशनी का खेल मन मोहता है.

नायक बोगार्ट चूंकि अक्खड़ है, सिनिकल है लेकिन दिल का कोमल और आदर्शवादी है, तो उसको दिखाते वक्त अक्सर आधा शरीर अंधेरे में तो आधा रोशनी में रखा गया है. वहीं नायिका इंग्रिड बर्गमैन को बेजोड़ खूबसूरत दिखाने के लिए हमेशा उनके चेहरे को रोशनी से नहाया हुआ दिखाया जाता है और उनके चेहरे की खूबसूरती को उभारकर नायक के चेहरे की उदासी से कॉन्ट्रास्ट पैदा करने की कोशिश बेहद प्रभावी सिद्ध होती है.

कासाब्लांका के एक दृश्य में इंग्रिड बर्गमैन

कई लेखकों के हाथों से गुजरने के बावजूद फिल्म के संवाद भी कालजयी बन पड़े थे. ‘राउंड अप द यूज्वल सस्पेक्ट’, ‘प्ले इट सैम, प्ले ऐज टाइम गोज बाय’ जैसे यादगार संवादों के अलावा ‘हियर इज लुकिंग एट यू किड’ तो इतना मशहूर संवाद है कि हमारे विशाल भारद्वाज साहब ने भी उसी टाइम पीरियड वाली ‘रंगून’ में कंगना के लिए सैफ को ‘किडो’ इस्तेमाल करते हुए दिखाया है! ‘कासाब्लांका’ की एक यह भी खासियत रही है कि फिल्म की तेज रफ्तार के हिसाब से ही संवाद भी बेहद किफायती लिखे गए. जिस जगह जो बोला गया उस जगह उसके अलावा और कुछ बोला ही नहीं जा सकता था, यह अहसास 76 साल पुरानी फिल्म को देखते वक्त आज भी यथावत रहता है.

‘कासाब्लांका’ की त्रासद प्रेम-कहानी को घोर तीव्रता देने का अहम काम नायक हम्प्री बोगार्ट और बेहद खूबसूरत स्वीडिश नायिका इंग्रिड बर्गमैन के लाजवाब अभिनय ने किया. कहा जाता है कि स्टाइलिश व लार्जर देन लाइफ हीरो होने के बावजूद हम्प्री बोगार्ट स्वीडिश नायिका से दो इंच छोटे थे और इसलिए दोनों के साथ खड़े होने पर उन्हें स्टूल पर खड़ा किया जाता था और साथ बैठते वक्त तकिए पर बैठाया जाता था! लेकिन हीरो के अहंकार का यह तुष्टिकरण दोनों के बीच की कैमिस्ट्री के आड़े आता हुआ स्क्रीन पर कहीं नहीं दिखता और प्रेम तथा वेदना के बीच की लुकाछिपी को दोनों ही एक्टर बेहद खूबसूरती से अभिव्यक्त करते हैं.

लेकिन,आखिर में वह सवाल अधूरे जवाब के साथ फिर भी खड़ा मिलता है, कि आखिर क्यों ‘कासाब्लांका’ एक अजर-अमर फिल्म है? वह क्या ‘एक’ चीज है जो सारे अमेरिका को इस सीधी-सपाट बिना भावनाओं का ज्वर खड़ा किए कहानी कहने वाली फिल्म के प्यार में पागल कर चुकी है? शायद यह कि ‘कासाब्लांका’ त्रासद प्रेम-कहानी तो है, लेकिन वह प्रेम से ऊपर मानवता को रखकर उसके न मिल पाने का असीम खालीपन पीछे छोड़ जाती है. नायक अंत में अपने प्यार का त्याग करता है और हिटलर व नाजियों से लड़ने वाले पति-पत्नी की जिम्मेदारियों के सामने अपने जुनूनी प्यार को तुच्छ मानने का दुर्लभ साहस दिखाता है. शायद!

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