श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित और शशि कपूर द्वारा निर्मित 1981 की प्रसिद्ध फ़िल्म ‘कलयुग’ में एक दृश्य आता है. देश के बहुत बड़े और प्रतिष्ठित उद्योगपति के घर आयकर विभाग का छापा पड़ता है. विभाग का अधिकारी जब आलमारियों को खोलकर देख रहा होता है, तो उसे घर की महिलाओं के अंतर्वस्त्र दिखते हैं. पहले तो वह उसे सबके सामने एक हाथ से हवा में लहराता है. फिर दोनों हाथों से उसे फैलाकर उसका आकार देखता है. अभी तक रानी साहिबा की तरह रहती आई घर की मालकिन यह देखकर शर्म और आक्रोश से तड़प उठती है और छटपटाकर चिल्लाते हुए अपने देवर से कहती है कि क्या तुम उसे रोकने के लिए कुछ भी नहीं कर सकते?


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पिछले दिनों जब ईपीडब्ल्यू के पूर्व रेज़िडेंट एडीटर और मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा को घर में नज़रबंद किया गया और पुलिस कांस्टेबलों को उनके ड्राइंगरूम, किचन और बेडरूम तक में चौबीसों घंटे ताक-झांक करने के लिए उनके घर घुसा दिया गया, तो उनकी साथी सबा हुसैन को लगभग इसी मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ा था. राजनीतिक दुष्प्रयासों के संदर्भ में इसे ‘पनिशमेंट बाय ट्रायल’ या जांच और मुकदमों में उलझाकर प्रताड़ित करने की रणनीति के तौर पर देखा जाता है. उपरोक्त मामले में भी ऐसा ही होता हुआ दिखा. ऐसा मालूम पड़ा मानो लगभग एक सोची-समझी रणनीति के तरह पहले तो कथित ‘अर्बन नक्सल’ शब्द को स्थापित किया गया और उसके बाद जनपक्षधर मानवाधिकार आंदोलन में शामिल लोगों को एक साथ इसमें लपेटने की कोशिश की गई.

महात्मा गांधी ने लगभग आज से 90 साल पहले 4 अप्रैल, 1929 को ‘यंग इंडिया’ में ‘मुकदमा, जांच और छापेमारी इत्यादि के जरिए प्रताड़ना’ यानी ‘पनिशमेंट बाय ट्रायल’ की ऐसी कई घटनाओं के बारे में लिखा था, जिनसे हमें आज की इन घटनाओं समझने में मदद मिलती है. ‘अंधाधुंध गिरफ्तारियां’ शीर्षक से एक टिप्पणी में गांधी लिखते हैं -

‘मजदूर नेताओं या तथाकथित साम्यवादियों की गिरफ्तारी से सरकार की भयभीत अकुलाहट का पता चलता है और वह ऐसे काम कर रही है जिनके कि हम आदी हो चुके हैं और जो दमन-चक्र आरंभ होने की पूर्व-सूचना देते हैं. इससे यह भी स्पष्ट है कि देश की सरकार तमाम कानूनों की उपेक्षा करके अपनी ताकत का समय-समय पर प्रदर्शन करने की बात में विश्वास रखती है और भयभीत भारत को परदे की आड़ में छुपे रहने वाले अपने खूनी पंजे को कभी-कभी दिखाना जरूरी समझती है. बेशक, गिरफ्तार लोगों के ऊपर बाकायदा अदालत में मुकदमा चलाने का स्वांग भी रचा जाएगा. अगर गिरफ्तार किए गए नेता बुद्धिमान हैं तो वे इस जाल में नहीं फंसेंगे और वकीलों द्वारा अपना बचाव प्रस्तुत करके इस स्वांग में मदद नहीं करेंगे.’

गांधी आगे लिखते हैं - ‘...मेरे विचार में इन गिरफ्तारियों का हेतु साम्यवाद को मिटाना नहीं है, इसका हेतु तो जनता में आतंक पैदा करना है. अगर साम्यवाद के मानी हिंसापूर्ण साधनों द्वारा सत्ता और संपत्ति को अपने अधीन करना है, तो कहना होगा कि देश का जनमत साम्यवादरूपी इस राक्षस का सफलतापूर्वक मुकाबला कर ही रहा था. ...लेकिन सरकार ने अपनी करतूतों से हिंसा में विश्वास रखनेवालों को वह उत्तेजन दिया है जो उनमें पहले कभी नहीं था. सरकार बहुत चतुर है और उससे यह छुपा नहीं था कि यह सब अवश्य होगा. इसलिए इन गिरफ्तारियों का हेतु पता पाने के लिए दूसरी दिशा में कोशिश करनी चाहिए.’

दूसरी घटना ‘नवाकाल’ नाम के मराठी अखबार के संपादक कृष्णजी प्रभाकर खाडिलकर की है जिन पर जब-तक मुकदमा चलाकर तब की सरकार उन्हें परेशान कर रही थी. महात्मा गांधी ने उनके मामले पर लिखा था -‘नवाकाल वाले श्री खाडिलकर के विरुद्ध जो मामला चलाया गया. वस्तुतः वह मुकदमा नहीं उत्पीड़न है. लेकिन जो सरकार जनता के विरोध के बावजूद चलाई जा रही है, और विशेष रूप से उस हालत में जब, जैसा कि हमारे मामले में है, इन जन-विरोध का दमन किया जाता है, उस सरकार के राज्य में स्पष्टवक्ता संपादकों का उत्पीड़न एक निश्चित बात है. ...एक दिन उन्होंने मुझसे कहा था कि एक पत्रकार की हैसियत से उन्हें समय-समय पर जोखिम भरे कार्यों के लिए जो जुर्माना देना पड़ा था, उसे उन्होंने अक्सर नाटक लिख-लिखकर चुकाया. ...अच्छा होता कि उन्होंने अपने गाढ़े पसीने की कमाई को वकील की फीस में बर्बाद न किया होता.’

तत्कालीन न्याय-व्यवस्था पर एक कठोर टिप्पणी करते हुए महात्मा गांधी ने आगे लिखा था- ‘इस देश में अन्य सरकारी संस्थाओं की तरह कानूनी अदालतें भी जरूरत के मौकों पर सरकार की रक्षा के लिए कायम की गई हैं. इस तरह के अनुभव हमें बार-बार हो चुके हैं. अदालतें बुनियादी तौर पर ऐसी ही हैं. बात इतनी ही है कि जब जनता की स्वतंत्रता और सरकार का हित एक ही बात में होता है, तब हमें इसका पता नहीं चलता. जब सरकार के विरोध में रहते हुए भी जनता की स्वतंत्रता की रक्षा करनी होती है, तब अदालतें उनकी रक्षा में असमर्थ पाई जाती हैं. उनसे हमारा जितना कम संबंध रहे उतना अच्छा.’

जैसा कि हम जानते हैं विभिन्न मामलों में आज भी पुलिस द्वारा फर्जी मामला बनाकर निर्दोष लोगों को भी परेशान करने की घटनाएं सामने आती रहती हैं. अभियुक्त के वकील आज भी पुलिस पर सत्ताधारियों के हाथ का राजनीतिक खिलौना होने का आरोप लगाते हैं और पुलिस को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करते हैं. लेकिन 1920 के दशक में भारत जब यह सिलसिला शुरू हुआ, तो सितंबर 1929 में पटना उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने वकीलों के ऊपर धमकी भरे लहजे में एक टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि वकील यदि बिना किसी ठोस आधार के बार-बार पुलिस पर इस तरह के आरोप लगाएंगे, तो उन्हें जिरह से रोक दिया जाएगा.

19 सितंबर, 1929 को ‘यंग इंडिया’ में उस न्यायाधीश का पूरा वक्तव्य छापते हुए महात्मा गांधी ने टिप्पणी की - ‘अगर वकीलों और उनके अभियुक्त के सर पर सजा की धमकी की तलवार सदा लटकती रहे तो पुलिस के बेजा बरताव के खिलाफ शिकायत करना उनके लिए नामुमकिन हो जाए. पटना के चीफ जस्टिस का अनुभव भले ही जुदा हो, आम रैयत का अनुभव तो यह है कि पुलिस के बयान अक्सर काल्पनिक और फर्जी होते हैं, और इस चलन के दिनोंदिन बढ़ने का कारण अभियुक्त या उनके वकील नहीं हैं, बल्कि पुलिस ही है. इसलिए खास जरूरत तो पुलिस के अभियोग लगाने के अति उत्साह पर अंकुश लगाने की है. यहां यह समझ लेना जरूरी है कि पुलिस की नौकरी का आधार अपराध साबित करने की उनकी ताकत पर निर्भर करता है. इसलिए सच या झूठ किसी भी उपाय से गुनाह साबित करने में ही पुलिसकर्मियों के स्वार्थ की सिद्धि है. इस दृष्टि से पुलिस के मामलों में हमेशा शंका की गुंजाइश तो रहेगी ही.’

भारत को आज़ादी मिलने के 70 सालों बाद भी यहां की न्याय व्यवस्था और पुलिस-व्यवस्था में किसी प्रकार का बुनियादी सुधार नहीं किया जा सका है. अब इन दोनों ही व्यवस्थाओं के राजनीतिक दुरुपयोग का प्रकट सिलसिला चल पड़ा है जो भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के बिल्कुल चरमरा जाने का कारण भी बन सकती है. भारत के लगभग सभी राजनीतिक दल सभी प्रकार की मर्यादा को तोड़कर एक खतरनाक खेल में शामिल हो चुके लगते हैं. दूसरी तरफ जनांदलोनों पर हो रहे सुनियोजित अत्याचार की सुध लेनेवाला कोई नहीं है.

माना जा सकता है कि ऐसे कुछ आंदोलनकारियों के कुछ विचार अतिवादी जरूर हो सकते हैं. लेकिन यही तो एक परिपक्व लोकतंत्र की खूबसूरती है, जिसमें सभी प्रकार के विचारों के लोग एक साथ स्वतंत्रतापूर्वक अहिंसक तरीकों से अपनी लड़ाइयां लड़ सकते हैं. भारत के संविधान में किसी एक दल की पांचसाला सरकार को संप्रभुता नहीं दी गई है. वह संप्रभुता भारत के लोगों में निहित है. लेकिन आज की नवपीढ़ियां अपनी सरकारों के कामकाज के तरीकों को देखकर जो सीख रही हैं, वह व्यावहारिक रूप से तो यही घटित होते हुए देख रही हैं कि सत्ताधारी दल और सरकार मिलकर जो चाहे सो कर सकती है. और एक बार जब ऐसी अलोकतांत्रिक दुष्चेष्टाएं हमारी राजनीतिक संस्कृति में स्थापित हो गईं, तो हर शासक दल की सरकार अपने दलीय और विचारधारात्मक विरोधियों के साथ हर बार ऐसा करते नज़र आएगी. अंधदलवादी दमन की ऐसी कुचेष्टा एक दिन हमारे लोकतंत्र को ही ले डूबेगी. संसद को पहले से कमजोर और कमजोरतर करने की कुचेष्टा हम सबके सामने होती रही है. सभी दलों के नेता और प्रवक्ता अपने गाल बजाने में व्यस्त हैं.

अब भी होश में न आए, तो एक दिन हर विवेकपूर्ण आवाज़ को देशद्रोही, अर्बन नक्सल, रूरल नक्सल, पाकिस्तान समर्थक इत्यादि करार देकर इसी ‘पनिशमेंट बाय ट्रायल’ रूपी प्रताड़ना का शिकार बनाने का खुला खेल खेला जाएगा. स्वतंत्रता का अर्थ और मूल्य भूलकर बहुसंख्यक जनता खुद अपनी मानसिक गुलामी का जश्न मनाएगी. स्वतंत्रचेत्ताओं को मध्ययुगीन बर्बरता के साथ सरेआम सूली पर चढ़ाया जाएगा या भीड़हिंसा का शिकार बना दिया जाएगा. यह कल्पना थोड़ी भयानक और अतिशयोक्तिपूर्ण लग रही होगी. लेकिन दुनिया में हमारे आस-पास अन्य समाजों में क्या कुछ हुआ है और हो रहा है, उसे देखकर भी हमारी आंखें नहीं खुलतीं, तो हम ऐसी डरावनी कल्पनाओं को साकार करने की ओर ही बढ़ रहे हैं.

गांधी ने 90 साल पहले जो देख लिया था, उसे हम आज भी नहीं देख पा रहे हैं. और यदि देख भी पा रहे हैं तो भी हम जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और दल जैसे संकीर्ण आधारों पर इस कदर बंटी हुई जनता हैं जो निहायत ही डरपोक, कमजोर, असुरक्षाग्रस्त और स्वार्थी हो चुके हैं. जिन पीढ़ियों को आज़ादी और लोकतंत्र बिना किसी प्रयास, त्याग या बलिदान के पका पकाया मिल जाता है, वे इसका मोल नहीं समझ पातीं और एक दिन इसे अपने ही हाथों गंवा बैठती हैं. क्या हम उसी दिशा में बढ़ते नज़र नहीं आ रहे हैं?