सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा राजनीतिक दलों के लिए चुनावी हथियार बनता जा रहा है. केरल सरकार जहां महिलाओं के प्रवेश के समर्थन में है, वहीं भाजपा और आरएसएस मंदिर की परंपरा के समर्थन में खड़े लोगों के साथ दिख रहे हैं. ये लोग मंदिर के श्रद्धालु हैं जो महिलाओं के प्रवेश के ख़िलाफ़ हैं और सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले को मानने को तैयार नहीं हैं जिसमें उसने मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था.

इस पूरे विवाद में एक अहम मोड़ उस समय आया जब परंपरा के समर्थकों ने फ़ैसले का विरोध करते हुए मंदिर में प्रवेश के लिए आईं महिलाओं को वापस लौटाना शुरू कर दिया. इसी सिलसिले में बीती 17 अक्टूबर को नीलक्कल इलाक़े में मंदिर के श्रद्धालुओं और पुलिस के बीच झड़प हो गई. इसी झड़प की एक तस्वीर को इन दिनों एक दूसरी तस्वीर के साथ शेयर किया जा रहा है.

ऊपर दिखाई दोनों तस्वीरों में से नीचे वाली तस्वीर को लेकर जो जानकारी दी गई है वह बिलकुल सही है. यह उसी समय की है जब नीलक्कल में पुलिस और मंदिर के श्रद्धालुओं के बीच झड़प हुई थी. लेकिन ऊपर की तस्वीर की कहानी क्या है.

इंटरनेट पर सर्च करें तो पता चलता है कि कट्टर हिंदूवादी विचारधारा को दिखाने के लिए इस तस्वीर का इस्तेमाल काफ़ी समय से हो रहा है. कई वेबसाइटों ने इसे अपने यहां प्रकाशित हुए लेखों में इस्तेमाल किया है. अब यह इतना आम हो गया है कि हिंसा से जुड़ी किसी घटना में अगर आरएसएस, भाजपा या किसी कट्टर हिंदू संगठन का नाम आता है तो इस तस्वीर के शेयर और इस्तेमाल होने की संभावना बढ़ जाती है. मिसाल के लिए जब बिहार के महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर संजय कुमार की पिटाई के मामले में ‘भाजपा-आरएसएस के एजेंडे’ और मोदी सरकार की नीति की आलोचना शुरू हुई तो उसके साथ इस तस्वीर का इस्तेमाल होने लगा.

वहीं, सबरीमला मंदिर मामले में श्रद्धालुओं की पिटाई को लेकर इस तस्वीर का इस्तेमाल इस तरह किया गया जिससे लगे कि केरल में आरएसएस का कोई प्रभाव नहीं है, जबकि उत्तर भारत में उसके लोगों का ऐसा भय है कि वे किसी को भी (ख़ास तौर पर मुसलमानों) को जहां मर्ज़ी तलवार दिखा कर डराते हैं. इस तरह बार-बार इस्तेमाल होने के चलते यह तस्वीर हिंदुत्व, भाजपा और आरएसएस के नाम के साथ जुड़ गई और इसमें दिख रही घटना वास्तविक होती चली गई.

ऐसा क्यों हुआ, यह बताने से पहले इसका सच जान लेते हैं. दरअसल यह तस्वीर किसी वास्तविक घटना की नहीं, बल्कि वास्तविक घटना पर आधारित एक फ़िल्म के दृश्य का स्क्रीनशॉट है. 2002 के गुजरात दंगों को लेकर बनी यह फ़िल्म 2005 में रिलीज़ हुई थी जिसका नाम है ‘परज़ानिया’. फ़िल्म के एक सीन में दंगाइयों की एक भीड़ हाथों में तलवार लिए दिखाई गई है. उसी की तस्वीर सोशल मीडिया और इंटरनेट पर काफ़ी समय से वायरल है.

अब बात करते हैं कि आख़िर लोग इस तस्वीर को सच्ची क्यों मानने लगे. दरअसल इतने समय से इस्तेमाल हो रही इस तस्वीर की सही जानकारी लोगों को नहीं दी गई. मीडिया में ख़बरों को लिखे जाते समय यह ध्यान रखा जाता है कि अगर किसी घटना की असल तस्वीर उस समय उपलब्ध नहीं है, तो उसके जैसी किसी और घटना की तस्वीर का इस्तेमाल करते हुए उसके नीचे ‘प्रतीकात्मक तस्वीर’ या ‘फ़ाइल फोटो’ लिख दिया जाता है, या फिर पुरानी घटना का छोटा-सा विवरण फ़ोटो कैप्शन में डाल दिया जाता है. इससे पाठक यह जान लेता है कि वह तस्वीर नई ख़बर से नहीं जुड़ी है. अगर इस तस्वीर को लेकर ऐसा किया जाता तो इसके इस्तेमाल से किसी तरह का भ्रम लोगों में नहीं फैलता.