ऑडिटोरियम के बाहर इतनी लंबी लाइन लगी है कि एक सौ अठहत्तर के बाद मैंने गिनना बंद कर दिया है. एक अकेले अंधेरी में ही दो (बल्कि जुहू को आस-पास का मान लिया जाए तो तीन) सिनेमाघरों की ग्यारह स्क्रीनों पर जियो मामी मुंबई फ़िल्म फ़ेस्टिवल के लाइन-अप की फ़िल्में दिखाई जा रही हैं. इसके अलावा शहर के अलग-अलग कोनों - बांद्रा, कुर्ला, मुलुंड और लोअर परेल के सिनेमाघरों में भी 25 अक्टूबर से लेकर एक नवंबर तक मामी के बीसवें संस्करण की फ़िल्में स्क्रीन हो रही हैं. कुल नौ सिनेमाघरों की सोलह स्क्रीनों पर दो सौ से ज़्यादा फ़िल्में देखने को हैं. कोई ऑस्कर के लिए नॉमिनेटेड है तो किसी को वेनिस में गोल्डन लायन मिल चुका है. देखने को इतना कुछ है, और दिन हैं बस सात!

इन सात दिनों के फ़िल्म फ़ेस्टिवल की गहरी और संजीदा तैयारी सिर्फ़ मामी की टीम ही नहीं करती, दर्शकों का एक बड़ा तबका भी करता है. ऐसे ही एक दर्शक हैं संजीव तिवारी. गुड़गांव से आए हैं फ़िल्में देखने. मामी की तारीख़ों की घोषणा होते ही मुंबई आने-जाने की टिकटें बुक करा लेते हैं. गुड़गांव की एक बड़ी मल्टीनेशनल सॉफ्टवेयर कंपनी में बतौर डाटा एनालिस्ट काम करते हैं, इसलिए छुट्टियां उतनी ही मुश्किल से मिलती हैं जितनी मुश्किल से दफ़्तर और रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की आपाधापी में फ़िल्में देखने के लिए वक़्त. लेकिन इस एक फ़िल्म फ़ेस्टिवल के लिए महीनों पहले टीम को इत्तिला करके छुट्टी मांग लेते हैं.

सिनेमा के प्रति इस दीवानगी को संगत भी ख़ूब हवा देती है. संजीव जैसे कुछ और सिनेमची लोगों ने मामी 2018 के नाम का एक वॉट्सएप ग्रुप तक बना लिया है. ग्रुप पर रजिस्ट्रेशन, सुबह की बुकिंग, बुकिंग के अपडेट, फ़िल्मों पर तफ़्सील से तैयार किए गए नोट्स, सुझाव और अपने-अपने हिसाब से माइक्रोसॉफ़्ट एक्सेल की पर्सनलाइज़्ड फ़ाइल्स के स्क्रीनशॉट्स साझा किए जा रहे हैं. क्योंकि इन दो सौ फ़िल्मों में से बमुश्किल पच्चीस से तीस फ़िल्में ही देखी जा सकेंगी, इसलिए हफ़्तों पूरी रणनीति के तहत ट्रेलर, रिव्यू, आईएमडीबी, मेटाक्रिटिक स्कोर को ध्यान में रखकर ऐसी एक लिस्ट तैयार की जाती है जिसमें हर मिजाज़ की, और हर भाषा की फ़िल्म हो. लक्ष्य सिर्फ़ इतना है कि पांच सौ रुपए की रजिस्ट्रेशन फ़ीस और एक हफ़्ते की छुट्टी का बेहतर से बेहतर इस्तेमाल हो.

अंधेरी के डीएन नगर के जिस छोटे से फ्लैट में संजीव ने अपने जिन दोस्तों के साथ मामी के लिए फिलहाल डेरा डाल रखा है, वहां उन्हीं के बैच के कई और लड़के भी रहते हैं. आईआईटी खड़गपुर से ग्रैजुएट हुए इन आठ-दस इंजीनियरों का ग्रुप सिर्फ़ और सिर्फ़ सिनेमा की खुराक पर चलता है. एक स्थिर और सुनिश्चित भविष्य को लात मारकर इतने बड़े शहर के इतने छोटे से घर में छोटे-छोटे शहरों में पले-बढ़े पच्चीस-छब्बीस साल के ये सिनेमाप्रेमी आख़िर किसी अमूर्त तलाश में हैं, यह मुझे भी तभी समझ में आया जब उनकी ही तरह के जुनून के साथ शनिवार-इतवार-सोमवार का मोह त्यागकर इस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में हर रोज़ फ़िल्में देखने के लिए मैंने भी सिनेमाघरों के बाहर डेरा डाल दिया.

मामी फिल्म फेस्टिवल में शरीक होने आए संजीव तिवारी, शिवाजी बिश्वनाथ और सत्यम साई (बाएं से दाएं)
मामी फिल्म फेस्टिवल में शरीक होने आए संजीव तिवारी, शिवाजी बिश्वनाथ और सत्यम साई (बाएं से दाएं)

मेरे नज़दीक अंधेरी के जिन दो सिनेमाघरों - पीवीआर ईसीएक्स और पीवीआर आइकॉन - में मामी की फ़िल्में स्क्रीन की जा रही हैं उनके बीच दो सौ मीटर का भी फ़ासला नहीं है. ये वही अंधेरी है जिसके बारे में अक्सर मज़ाक में कहा जाता है कि इस इलाके में कॉफ़ी शॉप्स में काम करने वाले नौजवान और मॉल के बाहर खड़े वॉचमैन भी या तो ऑडिशन दे रहे होते हैं या अपनी ‘स्क्रिप्ट पर काम’ कर रहे होते हैं. सुबह साढ़े नौ बजे से ही इन दोनों सिनेमाघरों के बीच मामी का रजिस्टर्ड बैच लटकाए दर्शकों के झुंड चायवाले के खोमचे के पास, भेलपुरी वाले के इर्द-गिर्द, मॉल की सीढ़ियों पर या किसी कॉफ़ी-शॉप में हिंदी, अंग्रेज़ी, मराठी, असमिया, तमिल, बंगाली, इतालवी, स्पैनिश, चीनी, जापानी और न जाने कितनी ही भाषाओं की फ़िल्मों पर कुछ गहरे और कुछ टाइमपास बहस-मुबाहिसों में उलझे हुए दिखाई देने लगते हैं.

‘हम नॉन-बिलीवर टाइप लोग हैं. दीवाली-क्रिसमस मनाने में यकीन नहीं करते. तो हमारे लिए फ़िल्म फ़ेस्टिवल ही हमारा उत्सव है, त्यौहार है’ बातों बातों में संजीव के एक साथी सत्यम साई कहते हैं. सत्यम मुजफ्फरपुर में पले-बढ़े हैं और उन्होंने रामकृष्ण मिशन के स्कूल में पढ़ाई की है. घर-परिवार में फ़िल्में देखने की संस्कृति तो ख़ैर थी ही नहीं, मिशन स्कूल में भी फ़िल्मों से पाला पड़ने का सवाल ही नहीं था. कभी स्कूल में फ़िल्में देखने को मिलीं भी तो सत्यजीत रे की ‘गोपी गायेन बाघा बायेन’ और ‘आगन्तुक’ मिली. सत्यम को देख-सुन लगता है कि अच्छे सिनेमा के लिए पागलपन का एक पूरा मायावी हवामहल खड़ा करने के लिए इतनी नींव भी बहुत रही होगी. हालांकि फिर आईआईटी पहुंचते ही उन्हें इन्ट्रानेट पर मौजूद वर्ल्ड सिनेमा का ख़ज़ाना मिल गया. इसी ख़ज़ाने ने सत्यम को बायोटेक्नॉलोजी की डिग्री किसी अलमारी में बंदकर औपचारिक तौर पर ताउम्र सिनेमा का विद्यार्थी और अभ्यासी बन जाने की हिम्मत दे दी. और नई-नई किस्म की फ़िल्में देखने की यही ललक उन्हीं के शब्दों में उन्हें ‘सभ्य बालक’ बना देती है.

सत्यम बताते हैं, ‘हम वैसे तो सुबह के चार बजे से पहले नहीं सोते, लेकिन सभ्य बालकों की तरह इस एक हफ्ते रोज़ वक़्त पर सो जाते हैं. बस इसलिए ताकि आठ बजे से पहले उठकर अपनी टिकटें बुक करा सकें. हमारा यही काम रहता है इस हफ्ते - टिकटें बुक कराना, फिर लाइन में जाकर लगना, फिर फ़िल्म देखना और फिर घर आकर उन फ़िल्मों पर थोड़ी सी बातचीत करने के बाद ग्यारह बजे तक सो जाना ताकि फिर अगली सुबह टाइम पर नींद खुल जाए.’ संजीव के दोस्त उनके बारे में मज़ाक-मज़ाक में तो ये भी कहते हैं पिछले चार सालों में चार बार मुंबई आ चुके संजीव ने सिनेमा थिएटरों के भीतर और बाहर की मुंबई के अलावा इस शहर का कुछ भी नहीं देखा.

सच कहूं तो बॉलीवुड और कुछ हद तक बंगाली सिनेमा के परे सिनेमा का मेरा अपना एक्सपोज़र हाल के सालों तक बहुत थोड़ा रहा. डिजिटल प्लेटफॉर्मों और इंटरनेट ने मेरे लिए भी वर्ल्ड सिनेमा की वो एक नई दुनिया खोली जिसे मैं ‘एलीट’ और अतिबौद्धिक समझ कर हमेशा नकारती रही थी. मामी फ़िल्म फ़ेस्टिवल के दौरान दर्शकों की इस नई खेप से सामना हुआ तब समझ में आया कि फ़िल्में देखने का ये चस्का अलग ही तरह का होता है. यहां न मनोरंजन उद्देश्य होता है और न ज्ञानवर्द्धन. सिर्फ़ और सिर्फ़ अनुभव के स्तर पर कुछ नया महसूस कर लेने, जी लेने की एक अबूझ प्यास होती है, बौद्धिक तुष्टि की लालसा होती है. कितनी विशालकाय दुनिया है हमारे आगे जिसका अन्वेषण बाकी है अभी! सिनेमा उसी विशालकाय, अनदेखी दुनिया की कुछ परतें हमारे आगे खोलकर रखता है, उन परतों के प्रति जिज्ञासु बनाता है. और यही जिज्ञासा, इंसानों और इंसानी मनोविज्ञान में गहरी दिलचस्पी सिनेमा के प्रति इस प्रेम को पालती-पोसती है.

यहां दर्शकों से अपनी फ़िल्म ‘द एयरेसेस’ पर बात करते हुए लैटिन अमेरिका के फ़िल्मकार मार्सेलो मार्टिनेसी ने भी कहा, ‘हम दुनिया के जिस कोने से आते हैं वहां सालभर में तीन या चार फ़िल्में ही बन पाती हैं. आप ख़ुशकिस्मत हैं कि इतनी सारी फ़िल्में बनती हैं आपके यहां. हमारे पास भी अभिव्यक्त करने को बहुत कुछ है. हम तो बस ये चाहते हैं कि हमारे यहां के लोगों को भी सिनेमा एक चमत्कार नहीं लगे बल्कि एक एवरीडे एक्सपीरिएंस लगने लगे.’ मार्टिनेसी पराग्वे के हैं. इस देश का आधुनिक इतिहास गृह युद्ध, सरहदों को लेकर पड़ोसी देशों के साथ लड़ाई, सैन्य शासन और परिवर्तन विरोधी सरकारों का रहा है. पराग्वे के सिनेमा पर बने विकिपीडिया पन्ने पर कुल मिलाकर पचास के आस-पास फ़िल्में दर्ज हैं जो पिछले पचास सालों में बनीं और रिलीज़ हुईं. सिनेमा ऐसे किसी देश की ऊंची दीवारों पर खुलने वाला एक छोटा-सा झरोखा नहीं तो और क्या है!

पुणे की मधु कुलकर्णी से मेरी मुलाक़ात मामी फ़िल्म फ़ेस्टिवल में एक फ़िल्म देखने के दौरान ही हुई. मधु डायरेक्शन और स्क्रिप्टराइटिंग में बैचलर्स कर रही हैं और किसी फ़िल्म फ़ेस्टिवल में एक साथ इतनी सारी फ़िल्में देखने का यह उनका पहला अनुभव है. हम एक-दूसरे को जानते तक नहीं, लेकिन हमारी बातचीत की शुरुआत ही एक फ़िल्म के आस्पेक्ट रेशियो और एक्सपेरिमेंटल फ़िल्मों को देखने के हमारे अनुभवों से हुई. हमने पिछले चार दिनों में देखी गई फ़िल्मों पर कुछ नोट्स साझा किए और बाद में मधु ने अपने तजुर्बे के बारे में एक ईमेल में लिखा, ‘मैं किसी अनजान शहर इस तरह अकेली पहले कभी आई नहीं, लेकिन थिएटरों में बैठकर मुझे लगा जैसे मैं अपने घर में हूं. इस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में होना ही एक नए किस्म का अनुभव था. इस दौरान मैंने अपने बारे में भी बहुत कुछ जाना और समझा है, और यहां आने के बाद दुनिया के प्रति, इंसानी मूल्यों के प्रति और बहुत सारी चीज़ों के प्रति मेरा नज़रिया भी बदला है.’

मधु ने लिखा कि अभी तक का उनका सिनेमाई अनुभव, या मापदंड, अमेरिकी रहे हैं. लेकिन इस फ़िल्म फ़ेस्टिवल के दौरान इतनी सारी ग़ैरअमेरिकी फ़िल्में देखने के बाद उन्हें समझ में आया कि अलग-अलग सांस्कृतिक परिवेशों से आई फ़िल्में देखना भी उतना ही ज़रूरी है, और ऑस्कर किसी फ़िल्म का अंतिम लिटमस टेस्ट तो ख़ैर बिल्कुल नहीं होता.

छोटे शहरों में पले-बढ़े इन युवा दर्शकों की बचपन की दुनिया संघर्षों की दीवारों और भारी-भरकम अपेक्षाओं की नींव पर ज़रूर खड़ी हुई है, लेकिन इनकी समझ में, इनके जज़्बे में जिज्ञासाओं का खुला वितान है. सिनेमा इनके लिए रचनात्मकता के खुले आसमान में बने रहने का एक ज़रिया है. जो सिनेमा नई भाषा और नए व्याकरण गढ़ता है, वही सिनेमा इन दर्शकों को रुचिकर लगता है. इनकी रुचि का ब्लॉकबस्टर और बॉक्स ऑफ़िस से कोई वास्ता नहीं. सत्यम के शब्दों में, ‘देख तो हम कमर्शियल सिनेमा भी लेते हैं, लेकिन अक्सर उसका इस्तेमाल बिचिंग मैटिरियल के तौर पर करते हैं. हर तरह का सिनेमा देखकर उसपर बात करना हमारे लिए हमारी भड़ास निकालने का एक ज़रिया भी है.’

मधु, सत्यम और संजीव जिस इस पीढ़ी के दर्शक हैं, उस पीढ़ी की उंगलियों के कोरों पर दुनियाभर का कॉन्टेन्ट आकर रुका हुआ है. अब एक्सेसेबिलिटी मसला ही नहीं है. इंटरनेट ने न सिर्फ़ सिनेमा देखने और बनाने को इतना आसान कर दिया है कि इस मामी फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भी उस शॉन बेकर के साथ एक मास्टरक्लास में बैठने के लिए सिनेप्रेमियों में होड़ लगी है जिन्होंने अपनी पूरी की पूरी फ़िल्में आईफ़ोन पर शूट की और दुनियाभर में रिलीज़ भी की. ‘रोमा’ समेत ऐसी कई फ़िल्में हैं जो या तो ख़ासतौर पर नेटफ्लिक्स के लिए बनाई गई हैं या फिर अमेजॉन प्राइम के लिए, और जिनके प्राइमरी डिस्ट्रिब्यूशन का माध्यम डिजिटल ही होगा.

आज सिनेमा देखने का अनुभव भी एकदम पर्सनल हो गया है. अपने-अपने कानों में ईयरप्लग्स लगाए अपने-अपने फ़ोन स्क्रीनों पर अपनी-अपनी पसंद की फ़िल्में या सीरीज़ देख रहे एक ही परिवार के तीन सदस्यों का नज़ारा मेरे अपने ही घर में नहीं, बल्कि ट्रेन, मेट्रो, हवाई जहाज़ों और बसों समेत हर पब्लिक स्पेस में दिखना आम बात हो गई है. जब दुनियाभर का सिनेमा इतनी आसानी से देखने को मिल जाता है तो फिर काम-धंधा छोड़कर इतनी लंबी कतारों में लगकर फ़िल्म देखने की मारामारी क्यों? अपने सारे एडिट शेड्युल और काम को रोककर सात दिनों तक सिर्फ़ और सिर्फ़ फ़िल्में देखने का इरादा रखने वाले शिवाजी बिस्वनाथ इस सवाल का जवाब देते हैं, ‘कलेक्टिव एक्सपीरिएंस की वजह से, और इस अनुभव का मनोरंजन से कोई वास्ता नहीं होता.’ ‘रोमा’ नाम की एक स्पैनिश फ़िल्म देखते हुए मेरे बगल में बैठी एक दर्शक और मैं जब एक ही वक़्त पर एक सीन में हिचकियां ले-लेकर रो रहे थे तो मुझे ‘कलेक्टिव एक्सपीरिएंस’ का मतलब और बेहतर तरीके से समझ में आया.

शिवाजी को भी लैपटॉप पर, या अपने किसी पर्सनल स्क्रीन पर फ़िल्में देखना ज़्यादा पसंद है. इसमें भी पर्सनल स्टोरीज़ वाली फ़िल्में ज़्यादा रास आती हैं. ‘लेकिन हर स्टोरी तो पर्सनल ही होती है न?’ मेरे इस सवाल के जवाब में हम चार-पांच लोग भी सही-सही तरीके से अपनी बात नहीं रख पाते, क्योंकि वाकई हर स्टोरी - चाहे कितनी ही नियोमॉडर्न और प्रयोगवादी क्यों न हो, होती तो पर्सनल ही है. तानाशाही और सैनिक शासन, ग्लोबल वॉर्मिंग, आतंकवाद, आर्थिक संकट, जातीय संघर्ष और विस्थापन, गृहयुद्ध और रंगभेद की लड़ाईयों के इतिहास के बीच अगर कुछ पिसता-घुलता रहता है तो वो आम इंसानों का ‘निज’ ही तो है. और यदि इसी ‘निज’ को स्टोरी से निकाल दिया जाए तो बेशक सिनेमा मनोरंजन का एक बड़ा और रंगीन कैनवस बचा तो रह जाएगा, लेकिन उसकी रूह जाती रहेगी. बॉलीवुड (और ख़ासकर उसका वो हिस्सा जिसे ‘मुख्यधारा’ कहा जाता है) में नई और उम्दा कहानियों के अकाल का मातम तो हम इसलिए मनाते रहते हैं क्योंकि अक्सर सिर्फ़ और सिर्फ़ मनोरंजन के इरादे से लिखी और बनाई जा रही इन कहानियों में से किरदार, उन किरदारों के अल्फ़ाज़ और उन अल्फ़ाज़ों के बीच की ख़ामोशियां गायब हैं. जो सिनेमा अपने वक़्त के प्रति ईमानदार और निडर नहीं होगा, निज हो या उदात्त, असहज सवाल खड़े नहीं करेगा, वो सिनेमा प्रोड्युसरों और सुपरस्टारों की जेबें भरने से ज़्यादा न अपने वक़्त को कुछ दे पाएगा और न अपने समाज को.

अगर साहित्य समाज का दर्पण है तो सिनेमा उसी समाज को देखने का मैग्निफ़ाइंग ग्लास. एक फ़िल्म फ़ेस्टिवल सिनेमाप्रेमियों के लिए वो प्रयोगशाला है जहां हम अपनी-अपनी पसंद के मैग्निफाइंग लेंस लिए अपने-अपने रुझानों, अपनी-अपनी विचारधाराओं और अपने-अपने सच को ढूंढ़ने निकले हैं. ऐसे में कोई संजीव की तरह ‘डिसर्निंग ऑडिएन्स’ बनकर ख़ुश है तो कोई सत्यम और शिवाजी की तरह एक-न-एक दिन अपनी सिनेमाई कहानी का अपना नया व्याकरण गढ़ना चाहता है. इस फ़िल्म फ़ेस्टिवल की सफलता इसी में निहित है कि मुट्ठीभर फ़्यूचर फ़िल्मकारों और संवेदनशील दर्शकों की इस नई पौध को अपनी-अपनी कहानियां कह पाने की हिम्मत और प्रेरणा का खाद-पानी हासिल हो पाता है. किसी एक दर्शक के भीतर कोई एक फ़िल्म देखकर अगर बेहद निजी और अंतरंग क्रांति हो रही हो, उनकी सोच का आकाश विस्तृत और बहुआयामी हो रहा हो तो सिनेमा सार्थक है. मामी फ़िल्म फ़ेस्टिवल में ऐसे उम्मीदबर दर्शकों की नई पीढ़ी से मिल पाना ही मेरा सबसे बड़ा हासिल है.