उनका पहला कॉन्सर्ट 1949 में नहीं होना था. पर तकदीर को कुछ और ही मंज़ूर था. बिहार में आये भूकंप पीड़ितों की सहायता के लिए एक शो किया गया था. मशहूर शहनाई वादक अमान अली खान साहब और उनके नौजवान शागिर्द (उस्ताद) बिस्मिल्लाह खान ने भी इसमें शिरकत की. शो के दूसरे हिस्से में अफ़रा तफ़री मच गई क्योंकि एक मशहूर शास्त्रीय गायक आने का वादा करके ऐन वक्त पर दगा दे गए थे. आयोजकों की भद्द न पिटे, इसके लिए पटियाला घराने के उस्ताद मोहम्मद अत्ता खान साहब ने कहा कि उनकी एक शागिर्द को आगे कर दिया जाए, फिर जो होगा अल्लाह मालिक है.

लोगों का हुजूम शोर मचा रहा था. कांपती टांगों से 20 साला अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी मंच पर आईं. दर्शकों का रेला देखने के बाद उन्होंने आंखें बंद कर ख़ुदा को याद किया और जानी-मानी ग़ज़ल गायिका मुमताज़ बेग़म का कलाम उनके मुंह से निकल पड़ा.

‘तूने बुत-ए-हरजाई कुछ ऐसी अदा पाई

तकता है तेरी ओर हर एक तमाशाई’

ग़ज़ल पूरी हुई. लोग आवाज़ की कशिश से हैरत में पड़ गए. तालियों की गड़गड़ाहट ख़त्म होने तक वे चार ग़ज़ल गा गईं. शो तो ख़त्म हो चुका था, दास्तां अभी बाकी थी. एक महिला कार्यक्रम पूरा होने के बाद उन तक आई और कहा, ‘मैं ये तय करके आई थी कि मुझे कुछ देर ही इस कार्यक्रम में रुकना है, तुम्हें सुना तो ठहर गई.’ उस महिला ने आगे कहा, ‘अब कल तुम मुझे सुनने आना.’ ये कहकर उसने अख़्तरी बाई को खादी की साड़ी भेंट की. वह महिला कोई और नहीं, बल्कि भारत की स्वर कोकिला सरोजिनी नायडू थीं!

बचपन की मुश्किलें और एंजेलिना योवर्ड का ऐलान

अख़्तरी और उनकी जुड़वां बहन अनवरी का जन्म फैज़ाबाद में हुआ था. उनकी वालिदा मुश्तरीबाई लखनऊ के नवाबों की दरबारी गायिका थीं. उनके शौहर को गाना-बजाना पसंद नहीं था. मियां-बीवी की अनबन के चलते मुश्तरीबाई बेटियों को लेकर फ़ैज़ाबाद चली आईं और संघर्ष शुरू हो गया. शौहर लखनऊ में सिविल जज थे पर फ़ैज़ाबाद में मां-बेटियों पर तंज कसे जाते. जैसे-तैसे दिन गुज़र रहे थे कि अनवरी का इंतेकाल हो गया. मां-बेटी अकेले रह गए और सामने बेदर्द ज़माना. मां अक्सर कहतीं, ‘हाय अल्लाह अब क्या होगा?’

फिर एक दिन, एंजेलिना योवर्ड, जिनकी पूरे हिंदुस्तान में धूम थी, फ़ैज़ाबाद आईं. इत्तेफ़ाक से वे उस कक्षा में गई जहां ‘बिब्बी’ उर्फ़ अख़्तरी पढ़ती थीं. किस्सा है कि बिब्बी ने योवर्ड का दामन थाम लिया और कहा, ‘आप गौहर जान हैं न?’ आप ठुमरी गातीं हैं. गौहर जान बोलीं, ‘क्या तुम भी गाती हो?’ बिब्बी ने उन्हें ख़ुसरो का कलाम ‘अम्मा मोरे भैया को भेजो सवान आया’ सुनाया. कहते हैं कि गौहर जान इसे सुनकर अवाक रह गईं. बोलीं, ‘अगर इस बच्ची को तालीम मिल गई तो ये मल्लिका-ए-ग़ज़ल बनेगी!

लंबी दास्तान कम लफ़्ज़ों में यूं है कि अख़्तरीबाई को संगीत विरसे में मिला था. उधर, मां की ख्वाहिश बेटी को पढ़ा-लिखाकर किसी अच्छे घराने में ब्याहने की थी. न चाहते हुए भी उन्होंने उसे उस्तादों की शागिर्दी में रख छोड़ा. बेटी जिद्दी और तिस पर गुरु उससे भी बड़े जिद्दी. अख़्तरी को सुगम संगीत का चाव, उस्ताद मोहम्मद अत्ता खान को उन्हें शास्त्रीय गायक बनाने की ज़िद. दोनों में ठन गई. बिब्बी ने उस्ताद की शागिर्दी छोड़ दी. पर गुरु ने तब तक वह सिखा दिया था जो उनके ज़िंदगी भर काम आने वाला था. उन्होंने ख़्याल, ठुमरी, दादरा और ग़ज़ल का फन सीख लिया था. अब उड़ने का वक़्त आ गया था.

तंगहाली में पहला ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड

बिब्बी को अब तक गुरु का मतलब समझ आ गया था. फिर गुरु को उन्होंने ऐसा पकड़ा कि नहीं छोड़ा. फ़ैज़ाबाद से परिवार कोलकाता चला आया. साथ में उस्ताद भी आए. एक तरफ़ गायकी की शिक्षा का ख़र्च, दूसरी तरफ शहरी ज़िंदगी का बोझ. मुश्तरीबाई जैसे-तैसे काम चला रही थीं. बिब्बी की गायकी अब तक मशहूर हो गई थी. ग्रामोफ़ोन कंपनी वाले उनसे गवाने के लिए इसरार करने लगे. उन दिनों म्यूजिक कंपनी या फ़िल्मों के लिए गाना कमतर समझा जाता, सो उस्ताद ने मना कर दिया. बिब्बी से घर की तंगहाली देखी न गयी और एक दिन वे एचएमवी के दफ़्तर चली गयीं. लपककर, कंपनी ने दादरा और ग़ज़लें रिकॉर्ड कर लीं. इसके बाद तो उन्हें पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी. यह उनका ही जादू था कि ग़ज़ल कोठों से निकलकर आम लोगों की ज़िंदगी आने को बेक़रार हो गयी. बिब्बी अब बेगम अख्तर हो गई थीं.

ग़ालिब, मोमिन, फैज़ अहमद फैज़, कैफ़ी आज़मी, शकील बदायूंनी जैसे कमाल के शायरों के कलामों को उनकी आवाज़ ने नए मुक़ाम दिलवाए. लखनऊ घरानों की शान कही जाने वाली ठुमरी को गौहर जान के बाद नयी ऊंचाइयों पर अगर कोई ले गया तो वे बेगम अख़्तर ही थीं. वाजिद अली शाह की बनाई हुई ‘हमरी अटरिया पे आजा रे सांवरिया’ तो उनके जैसे शायद कोई गा ही नहीं पाया.

Play

बेगम अख्तर की एक ग़ज़ल है, ‘दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे, वरना कहीं तकदीर तमाशा न बना दे’. इसका जादू कुछ यूं हुआ कि एचएमवी के रिकार्ड्स कम पड़ गए. जब मांग के हिसाब से सप्लाई करना मुश्किल हो गया तो कंपनी ने इंग्लैंड से नया रिकॉर्ड प्रेसिंग प्लांट ही मंगा डाला.

Play

फिल्मों का सफ़र

बेगम अख्तर की आवाज़ का जादू लोगों के सिर पर चढ़कर बोल रहा था. उनकी शक्लो-सूरत भी भली थी. फ़िल्म निर्माता उनसे अभिनय की भी मांग करने लगे. इसके बाद उन्होंने ‘नल और दमयंती’, ‘एक दिन की बादशाहत’, ‘मुमताज़ बेगम’, ‘अमीना’, ‘जवानी का नशा’ और कई फ़िल्मों में काम किया. कहा जाता है कि ईस्ट इंडिया फ़िल्म कंपनी ने उनकी तनख्वाह 700 रुपये मासिक से बढ़ाकर 2000 कर दी थी. लेकिन उनका मन नहीं लग रहा था. सो इस सब को छोड़कर वे 1942 में लखनऊ चली आईं. लेकिन महान फ़िल्म निर्माता महबूब उनके उनके पीछे वहां तक आ गए और फ़िल्म ‘रोटी’ में रोल और गाने की हां करवाकर ही माने.

कुछ इसी तरह सत्यजीत रे की फ़िल्म ‘जलसाघर’(1958) का क़िस्सा है. उस फ़िल्म में उन्होंने विलायत खान साहब की राग पीलू की बंदिश में ‘भर आई मोरी अखियां पिया बिना, घिर घिर आईं कारी बदरिया, जरत मोरी छतियां’ गाई. इसने तहलका मचा दिया था.

जब पानवाले को होटल में रुककर रात भर गाने के लिया कहा

रीता गांगुली ने बेगम अख़्तर की जीवनी ‘ए मोहब्बत’ में एक बड़े दिलफ़रेब क़िस्से का ज़िक्र किया है. एक बार बेगम अख्तर कोलकाता के किसी होटल की बालकनी में खड़ी थीं और नीचे एक ख़ूबसूरत सा पानवाला पूरबी दादरा गाते हुए पान बेच रहा था. उन्होंने उसे ऊपर बुला लिया और आगे क़िस्सा यूं है.

बेगम: ‘तुम कौन सा पान लगाते हो?’

पानवाला: ‘कलकत्ता, देसी, बनारसी. तम्बाकू खड़ी या हल्की’.

बेगम: ये पान की पूरी तश्तरी कितने की है?’

पानवाला: ‘आपको कितने चाहिए?’

बेगम: ‘मैं पूरे ख़रीद लूंगी बस तुम गाते रहना. क्या तुम बनारस के हो?’

पानवाल: ‘हां, पर धंधा यहीं है. शाम तक काफ़ी कमा लेता हूं. साल में एक बार घर जाता हूं.’

बेगम: ‘क्या तुम शादी-शुदा हो?’

पानवाल: ‘बच्चे भी हैं. आप तो अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी हैं न? कौन सी नई फिल्म में काम कर रही हैं?’ उसने आगे बोला, ‘मुझे यकीन नहीं हो रहा है कि मैं आपके सामने बैठा हूं.’

अख़्तरी बाई को वह शख्स बेहद ख़ूबसूरत लगा. उन्होंने उसे नहाकर रात को साथ वाले कमरे में रुकने के लिए कहा, तो उसने मना कर दिया. वह बोला, यहां रात भर रूककर यहां क्या करुना. मैं जहां रहता हूं, कोठेवालियां रात भर ठुमरी गाती हैं और मुझे मुफ़्त में अच्छा संगीत सुनने को मिल जाता है. बेगम अख्तर ने ने लाख चिरौरी की, पर वह चला गया. उन्होंने कहा, ‘मुझे तब महसूस हुआ कि मेरे संगीत में क्या कमी है.’

जब गाना सुनने के लिए मदन मोहन को फोन किया

यह भी ज़बरदस्त क़िस्सा है. इसके पहले भूमिका यह है कि मदन मोहन जैसा ग़ज़ल संगीतकार फ़िल्म इंडस्ट्री में दूसरा नहीं हुआ है. पर इतना नाम होने से पहले उन्होंने फ़िल्म दाना पानी (1953) जूनियर मोहन के नाम से संगीत रचा था और इसमें कैफ़ भोपाली की ग़ज़ल ‘ऐ इश्क़ मुझे और तो कुछ याद नहीं है’ के लिए बेगम अख़्तर को मना लिया था. यह बहुत बड़ी बात थी क्योंकि तब तक वे फ़िल्मों से किनारा कर चुकी थीं. फिर 1956 में फ़िल्म ‘भाई-भाई’ का संगीत मदन मोहन की ज़िंदगी में बड़ी कामयाबी लेकर आया. अब आगे का क़िस्सा खुद बेगम अख़्तर साहिबा से ही सुन लीजिये.

Play

अब ये तोहमत न दीजिये कि लेख मदन मोहन पर नहीं है. बात एक फ़नकार की दूसरे फ़नकार की कद्र की है.

बेगम और कैफ़ी आज़मी

कैफ़ी का ज़िक्र न हो तो बेगम साहिबा पर हर लेख अधूरा रहेगा. दोनों इतने अच्छे दोस्त थे कि कैफ़ी साहब ने एक बार उनके कुछ यूं कहा था, ‘ग़ज़ल सिर्फ सुनने को ही नहीं देखने को भी मिलती है.’ जिस प्रकार फैज़ अहमद फैज़ की कुछ नज़्मों को नूरजहां ने गाकर अमर किया था, कुछ वैसे ही इधर भी देखने को मिला. 11 बरस के कैफ़ी की पहली ग़ज़ल, ‘इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े, हंसने से हो सुकूं न रोने से कल पड़े’ से लेकर तमाम दूसरे गजलें उन्होंने अपनी आवाज़ से नवाज़ीं.

रीता गांगुली एक मज़ेदार वाकये का ज़िक्र करती हैं. ‘एक किसी रिकॉर्डिंग के लिए मैंने (रीता) कैफ़ी साहब की कुछ ग़ज़लें चुनीं. एक ग़ज़ल में मक्ता (आख़री शेर) नहीं था. मैंने अम्मी (बेगम अख़्तर) को बताया तो उन्होंने झट से मुझे कैफ़ी साहब को फ़ोन लगाने को कहा और बोला कि कहो अम्मी की तबियत बेहद ख़राब है, जल्द आयें. कैफ़ी साहब जानते थे कि अम्मी को एक बार दिल का दौरा पड़ चुका है. डरते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें फ़ोन करने से बेहतर होता मैं डॉक्टर को फ़ोन करतीं. मैंने कहा कि अम्मी ने सिर्फ़ आपको बुलाया है...

...कैफ़ी साहब आधे घंटे में होटल पहुंचे. मैं उन्हें सीधे कमरे में ले गयी जहां अम्मी बैठी थीं. कैफ़ी साहब ने देखा, वो तो सोफ़े पर आराम फ़रमा रही हैं. वो कुछ कहते, इसके पहले ही अम्मी ने उनका हाथ पकड़ा और बोला, बच्ची ने रिकॉर्डिंग के लिए तुम्हारी ग़ज़ल चुनी है, उसका मक्ता नहीं है. कमरे में शराब है, सोडा है और ग्लास है. मक्ता हो जाए, तो बता देना, दरवाज़ा खुल जाएगा. ये कहकर, उन्होंने कैफ़ी साहब को कमरे में बंद कर दिया और बाहर से कुंडी लगा दी. कैफ़ी साहब झल्लाकर बोले कि अजीब पागलपन है, शागिर्दा को भी झूठ बोलना सिखा दिया. तभी उनके कमरे से सोडे की बोतल खुलने की आवाज़ आई. तीन घंटे बाद वो बाहर निकले, ग़ज़ल मुकम्मल थी.’

सुना करो मेरी जान इनसे उनसे अफ़साने

सब अजनबी हैं यहां कौन किसको पहचाने

ग़ज़ल का मक्ता था;

हुआ है हुक्म के कैफ़ी को संगसार (पत्थर मारना) करो,

मसीहा बैठे छुपके कहां ख़ुदा जाने

समोसों और चंद सिगरेटों की तमन्ना

तन्हाई और बेगम अख़्तर का गहरा साथ था. वे अक्सर कहा करतीं, ‘सब कुछ साथ छोड़ जाएगा तन्हाई के अलावा.’ खाना बनाने की शौकीन. दो प्याज़ा सब्ज़ी बड़े चाव से बनातीं. और समोसे पर तो उनका सब कुछ कुर्बान. शराब, सिगरेट और कैफ़ी साहब ही उनके आख़िरी दिनों के दोस्त थे.

कभी लखनऊ जाना हो तो मिलके आइएगा. गौहर जान की नहीं, हिंदुस्तान की मल्लिका-ए-ग़ज़ल 30 अक्टूबर, 1974 से लखनऊ के पसंदा बाग में आराम फ़रमा रहीं हैं. मानो इस इंतज़ार में कि कोई आए और उनसे कहे, ‘अम्मी, चलो उठो. ठुमरी ही गा दो या कोई ग़ज़ल हो जाए.’ पर ऐसा कब होता है?