अंगेला मेर्कल 22 नवंबर 2005 से जर्मनी की पहली महिला चांसलर (प्रधानमंत्री) हैं. तब से वे हर संसदीय चुनाव आराम से जीतती रही हैं. लेकिन, सितंबर 2017 के पिछले चुनाव में उनकी पार्टी ‘सीडीयू’ (क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन) को मुंह की खानी पड़ी. उसे मात्र 32.9 प्रतिशत ही वोट मिले, जो 1949 के बाद से उसे मिले सबसे कम वोट थे. देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी ‘एसपीडी’ (सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी) के सहयोग से, 14 मार्च 2018 को, जैसे-तैसे नयी सरकार बनाने में छह महीने लग गये. तभी से लगने लगा था कि जर्मनी में ‘मेर्कल-युग’ का अंत अब बहुत दूर नहीं है.

इस साल अक्टूबर में बवेरिया और हेसे राज्य के विधानसभा चुनावों में भी ‘सीडीयू’ और ‘एसपीडी’ को एक बार फिर करारी चपतें लगीं. यह लगभग निश्चित लगने लगा कि अब मेर्कल को जाना ही पड़ेगा. हेसे राज्य के चुनाव परिणाम के दूसरे ही दिन, सोमवार 29 अक्टूबर की शाम, बर्लिन स्थित पार्टी के मुख्यालय में एक बैठक के बाद चांसलर मेर्कल ने अपने जाने के पहले क़दम की घोषणा कर दी.

दिसंबर से पार्टी अध्यक्ष नहीं

चांसलर मेर्कल ने कहा, ‘दिसंबर में हैम्बर्ग में होने जा रहे सीडीयू के अगले पार्टी-अधिवेशन में मैं पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए फिर उम्मीदवार नहीं बनूंगी.’ उल्लेखनीय है कि वे पिछले 18 वर्षों से लगातार अपनी पार्टी की अध्यक्ष और 2005 से देश की चांसलर भी हैं. अपने इस निर्णय को उन्होंने पिछले दोनों विधानसभा चुनाव-परिणामों का निजी निष्कर्ष बताया. मेर्कल ने आगे कहा, ‘मेरा वर्तमान कार्यकाल जर्मनी के चांसलर के तौर पर अंतिम कार्यकाल है. 2021 के संसदीय चुनाव के समय मैं न तो सीडीयू की ओर से चांसलर-पद की उम्मीदवार रहूंगी और न ही संसद की सदस्यता के लिए चुनाव लड़ूंगी... संसद के वर्तमान कार्यकाल के शेष बचे समय के लिए मैं चांसलर बने रहने को तैयार हूं.’

चांसलर मेर्कल अब तक इस सिद्धांत की क़ायल थीं कि पार्टी की अध्यक्षता और चांसलर का पद एक ही व्यक्ति के पास होना चाहिये. इसीलिए वे दोनों पदों को स्वयं ही सुशोभित कर रही थीं. अब वे छह दिसंबर से हैम्बर्ग में होने जा रहे अधिवेशन में पार्टी की अध्यक्षता तो त्यागने जा रही हैं, पर चाहती हैं कि अगले तीन वर्षों तक चांसलर के पद पर बनी रहें. उनके मुताबिक उन्हें मालूम है कि यह निर्णय ‘जोखिम भरा’ है, लेकिन लाभ-हानि के सभी पहलुओं को अच्छी तरह तौलने के बाद वे इसी निष्कर्ष पर पहुंची हैं कि ‘यह जोखिम उठाया जा सकता है.’ चांसलर मेर्कल ने कहा कि वे जो करने जा रही हैं, वह जर्मनी के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ, पर वे मानती हैं कि उन्होंने जो विकल्प चुना है उसमें देश और पार्टी के लिए अवसर अधिक जोखिम कम हैं.

अपना दोष भी माना

अपने वक्तव्य में चांसलर मेर्कल ने यह भी स्वीकार किया कि पिछले चुनावों के प्रतिकूल परिणामों के लिए वे भी किसी हद तक दोषी हैं. उनका इशारा इस बात की ओर था कि उनकी गठबंधन सरकार के भीतर काफ़ी आपसी खींच-तान चल रही थी. उनके और बवेरिया की ‘सीएसयू’ के अध्यक्ष और केंद्र सरकार में गृहमंत्री होर्स्ट ज़ेहोफ़र के बीच खटपट भी थमने का नाम नहीं ले रही थी. इस सबका चुनावों पर असर पड़ना स्वाभाविक था.

चांसलर मेर्कल की सोमवार की घोषणा अपेक्षित होते हुए भी इस दृष्टि से आकस्मिक भी थी कि वह हेसे राज्य में चुनाव के दूसरे ही दिन आ गयी. उनका कहना था कि पार्टी की अध्यक्षता छोड़ने के बारे में अपना मन उन्होंने गर्मी की छुट्टियों वाले दिनों में ही (संभवतः जुलाई-अगस्त में ही) बना लिया था, लेकिन बवेरिया और हेसे राज्य के विधानसभा चुनावों के परिणामों को देखते हुए उसे अब एक सप्ताह पहले ही घोषित कर देना उचित समझा.

सरकार की ख़राब छवि

अंगेला मेर्कल ने अपनी निकट सहयोगी और पार्टी की महासचिव तक को इस बारे में नहीं बताया. केवल उन दोनों पार्टियों के अध्यक्षों को सूचित किया, जो गठबंधन सरकार में शामिल हैं. अपनी गठबंधन सरकार के बारे में उन्होंने कहा कि सरकार अपनी जिस तरह की तस्वीर पेश कर रही है, वह स्वीकार करने योग्य नहीं है. ऐसा शायद उन्होंने इसलिए कहा कि पिछली गर्मियों में उनके और गृहमंत्री ज़ेहोफ़र के बीच तनाव बहुत बढ़ गया था. आम जनता को लगने लगा था कि गठबंधन सरकार के मंत्री आपस में ही लड़ने-झगड़ने में व्यस्त हैं, न कि देश को चलाने में.

आलोचक कहते हैं कि चांसलर मेर्कल जा रही हैं तो जाएं, पर टुकड़े-टुकड़े में क्यों जा रही हैं? पार्टी का अध्यक्ष पद अभी छोड़ेंगी, पर चांसलर की कुर्सी पर तीन साल और बैठी क्यों रहेंगी? उन्हें चाहिये कि वे दोनों कुर्सियां ख़ाली कर दें. प्रेक्षकों की मानें तो यह एक ख़ामख़याली है कि जो व्यक्ति दिसंबर में उनकी जगह पार्टी-अध्यक्ष बनेगा, वह तीन साल तक चांसलर की कुर्सी को केवल टुकुर-टुकुर ताकता ही रहेगा, उसे स्वयं पाने का उपक्रम नहीं करेगा!

सत्तारूढ़ गठबंधन टूट सकता है

इससे भी अधिक संभावना इस बात की है कि वर्तमान सत्तारूढ़ गठबंधन देर-सवेर टूट जाये और नये चुनाव करवाने पड़ जायें. वर्तमान गठबंधन की दूसरी बड़ी पार्टी ‘एसपीडी’ शुरू से ही उसमें शामिल नहीं होना चाहती थी. उसके सदस्य और समर्थक अब भी यही चाहते हैं कि वह विपक्ष में बैठे और अपने भीतर कुछ आमूल सुधार करे.

जर्मनी की विपक्षी पार्टियां, विशेषकर पर्यावरणवादी ग्रीन पार्टी और उग्र दक्षिणपंथी ‘एएफ़डी’, नये चुनावों की संभावना से पुलकित हो रही हैं. 2017 के संसदीय चुनावों में और 2018 के विधानसभा चुनावों में इन्हीं दोनों पार्टियों ने चांसलर मेर्कल के महागठबंधन में शामिल ‘सीडीयू’, ‘सीएसयू’ तथा ‘एसपीडी’ के वोटों में सबसे अधिक सेंध लगाई है. उनके वोटों के अनुपात लगभग दोगुने हो गये हैं.

अस्थिरता की आशंका

आने वाले दिनों में जो भी हो, लक्षण यही हैं कि जर्मनी को राजनैतिक अस्थिरता के लिए अभी से तैयार हो जाना चाहिये. जर्मनी की राजनैतिक अस्थिरता से यूरोपीय संघ की स्थिरता को भी आंच पहुंचे बिना नहीं रहेगी. जनसंख्या और अर्थव्यवस्था की दृष्टि से जर्मनी ही यूरोपीय संघ का सबसे बड़ा और सबसे बलशाली देश है.

जहां तक भारत का प्रश्न है, चांसलर मेर्कल जितने अधिक समय तक चांसलर पद पर बनी रहेंगी, भारत के हित में ही होगा. वे प्रधानमंत्री मोदी की अच्छी मित्र और भारत से काफ़ी सुपरिचित हैं. उनके संभावित उत्तराधिकारियों के तौर पर जिन लोगों के नाम लिये जा रहे हैं, वे सभी न तो भारत से परिचित हैं और न भारत उनसे.