गुजरात में नर्मदानगर का केवड़िया गांव आज 31 अक्टूबर से पूरी दुनिया में पहचान बनाने वाला है. यहां नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध के नज़दीक ही देश के पहले उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरकार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा का अनावरण किया जा रहा है. दुनिया में सबसे ज़्यादा- 182 मीटर ऊंची इस प्रतिमा काे ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ नाम दिया गया है. सो इसके साथ यह सवाल भी हो सकता है कि इस कारनामे को अंज़ाम किन हाथाें ने दिया है? डेक्कन हेराल्ड की एक ख़बर में इस सवाल का ज़वाब ‘मूर्तिकार राम वणजी सुतार’ के रूप में मिलता है. सुतार, जिनकी उम्र अब 93 साल हो चुकी है, हमेशा से सरदार पटेल की दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा बनाने का सपना देखते थे.

ख़बर बताती है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी इस ‘स्वप्न परियोजना’ (ड्रीम प्रोजेक्ट) पर काम शुरू हुआ तो कला इतिहास के अमेरिकी विशेषज्ञ माइकल मैस्टर सरदार पटेल की एक आदर्श प्रतिमा ढूंढ रहे थे. ठीक वैसी जिसके नाक-नक्श, कद-काठी, सब सरदार पटेल से हू-ब-हू मिलती-जुलती हो. उनकी यह तलाश अहमदाबाद हवाई अड्डे के बाहर लगी प्रतिमा पर जाकर पूरी हुई. देखते ही उन्होंने इसे बनाने वाले का पता लगाने का फैसला किया और वे राम वणजी सुतार तक जा पहुंचे.
सुतार छह दशक से मूर्तिकारी कर रहे हैं. उनके बेटे अनिल सुतार वास्तुकार (आर्किटेक्ट) हैं. लेकिन वे भी अब पिता के साथ मूर्तिकारी के ही काम में लगे हैं. दोनों पिता-पुत्र अब तक 8,000 से ज़्यादा मूर्तियां बना चुके हैं. उत्तर प्रदेश के नोएडा में इन्होंने लगभग 2,000 वर्गमीटर क्षेत्र में अपना विशाल स्टूडियो बना रखा है. माइकल मैस्टर जब ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ परियोजना का ज़िक्र लेकर सुतार के पास पहुंचे तो मानो उनके मन की मुराद पूरी हो गई हो. तुरंत ‘हां’ कह दी और इस तरह काम शुरू हो गया.
डेक्कन हेराल्ड से बातचीत में सुतार बताते हैं, ‘सरदार पटेल भारत के लौह पुरुष थे. उन्होंने जिस संकल्प के साथ काम किया, जिस निर्णायक व्यक्तित्व के वे मालिक थे, जो दृढ़ता उनकी ख़ासियत थी, वह सब हमें उनकी प्रतिमा में दिखाना था. वे धोती कैसी पहनते थे, जैकेट का कपड़ा कैसा इस्तेमाल करते थे, हाथ-पैर, अंगुलियां, आदि सभी चीजें बिल्कुल वैसी ही दिखानी थीं जैसी सरदार पटेल की थीं. यह चुनौतीपूर्ण काम था. लेकिन तसल्ली की बात है कि यह आख़िरकार अपेक्षानुरूप हो पाया.’
सुतार के मुताबिक, ‘प्रतिमा निर्माण के दौरान हमें कई बार चीन जाना पड़ा. क्योंकि इस परियोजना का काम देख रही कंपनी- लार्सन एंड टूब्रो ने प्रतिमा की ढलाई का काम चीन के एक ढलाईघर (फाउंड्री) को सौंपा था. पहले हम सरदार पटेल को आगे कदम बढ़ाने वाली मुद्रा में दिखाना चाहते थे. लेकिन बाद में इंजीनियरों की सलाह पर हमने उन्हें सीधे खड़ी अवस्था में दिखाया है.’ महाराष्ट्र में धुले जिले के गोंडुर गांव में 1925 में जन्मे सुतार के चेहरे पर यह सब बताते हुए तसल्ली और फ़ख़्र के भाव साफ दिखते हैं.
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