सितंबर 1929 का वाकया है. महात्मा गांधी संयुक्त प्रांत (आज के उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड का इलाका) गए. इस दौरे में उनका काशी विद्यापीठ भी जाना तय था. यहां उनकी मुलाकात एक शिक्षक से हुई. गांधी उनसे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने श्रीप्रकाश नाम के एक कार्यकर्ता से कहा, ‘तुमने ये हीरा मेरी नज़र से अब तक कहां छुपा रखा था?’ गांधी के प्रश्न से श्रीप्रकाश अचकचा गए, पर तुरंत ही बात संभालते हुए उन्होंने कहा कि हीरे जौहरी द्वारा तलाश किये जाने के इंतज़ार में रहते हैं.

ये शख्स थे आचार्य नरेंद्र देव. एक बार वे गांधी की नजर में आए तो जल्द ही उनके सबसे करीबी लोगों में शामिल हो गए. जब 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो वे उन गिने-चुने लोगों में से थे जो गांधी के ‘करो या मरो’ के विचार से सहमत थे.

गांधी की नज़र में नाज़ी, जापानी और मित्र राष्ट की नीतियों में कोई भेद नहीं था. वे चाहते थे कि सरकार को झुकाने का यही सही मौका है. पर यहां तक आते-आते गांधी कांग्रेस में अपनी प्रासंगिकता खो चुके थे. जवाहर लाल नेहरू नेहरू और अन्य कांग्रेसी चाहते थे कि विश्व युद्ध के नाज़ुक मौके पर ब्रिटिश सरकार की किरकिरी न की जाए और युद्ध में शामिल होकर भारत की आजादी का मोलभाव कर लिया जाए. इतिहास के जानकारों का मानना है कि कांग्रेस के एक धड़े ने, जिसमें नेहरू भी शामिल थे, गांधी के बिना अंग्रेज़ सरकार से बातचीत का मन भी बना लिया था. पर फिर गांधी की सामाजिक व्यापकता को देखते हुए वे ऐसा नहीं कर पाए. इस दौर में नरेंद्र देव गांधी के नज़दीकी सलाहकारों में शामिल थे.

सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना

नरेंद्र देव कांग्रेस की सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े हुए थे. समाजवाद उनके खून में था. न धर्म मानते थे और न ही उसकी सत्ता. 1947 में जेबी कृपलानी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ा तो गांधी ने जयप्रकाश नारायण और उनके नाम पर गहनता से विचार किया. नेहरू भी उनके नाम पर पहले तो समर्थन में आये, पर फिर उनके विचार बदल गए. कांग्रेसियों को उनकी स्पष्ट समाजवाद की विचारधारा से समस्या थी और यहीं से वे कांग्रेस से दूर होते चले गए.

नरेंद्र देव ने नेहरू के साथ कंधे-से-कंधा मिलाया था. लेकिन गांधी की मृत्यु के तीन महीने बाद उन्होंने कुछ अन्य समाजवादियों के साथ कांग्रेस छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना कर ली. कांग्रेस छोड़ने के संदर्भ में दिया गया उनका बयान बेहद विचारशील और तार्किक था. उन्होंने कहा कि कांग्रेस एक आंदोलन था जिसमें कई राजनैतिक और आर्थिक विचार साथ चल रहे थे. उनके मुताबिक आजादी के बाद कांग्रेस आंदोलन की राह से हटकर संगठन बनने की ओर अग्रसर हो चली थी जिसमें अन्य विचारधारा स्वीकार्य नहीं थी. नेहरू पर कटाक्ष करते हुए नरेंद्र देव कहा कि प्रधान सचिव (नेहरू) की सोच में समाजवाद है, पर पार्टी के अंदर मौजूद तत्वों पर पूंजीवाद हावी है जिससे किसान और मज़दूर वर्ग खुद को पार्टी से जुड़ा हुआ महसूस नहीं कर सकता. उन्होंने कांग्रेस को मध्य वर्ग (मिडिल क्लास) की पार्टी कहा.

धर्म निरपेक्षता और स्कूल

मार्च 1948 में लखनऊ रेडियो पर नरेंद्र देव का एक भाषण प्रसारित हुआ था जिसमें उन्होंने शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा दिए जाने पर सवाल उठाया था. उनका मानना था कि सांप्रदायिक मेल उत्पन्न करने की सदिच्छा से स्कूलों के पाठ्यक्रमों में धार्मिक शिक्षा के समावेश की बात ग़लत है. नरेंद्र देव के मुताबिक इससे फ़ायदे कम, नुकसान ज़्यादा हैं. उनका यह भी मानना था कि समाजवाद की विचारधारा में ईश्वर की जगह नहीं है. इसके बावजूद उन्होंने यह भी कहा था कि मनुष्य केवल तर्क के आधार पर जीवन नहीं जी सकता, उसे विश्वास की भी ज़रूरत होती है पर यह विश्वास धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए और इसीलिए धर्म को शिक्षण संस्थाओं से दूर रखे जाने की जरूरत है. नरेंद्र देव की नजर में यही धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत था.

आशुतोष वार्ष्णेय अपनी किताब ‘अधूरी जीत’ में लिखते हैं कि धर्मनिरपेक्षता को लेकर नेहरू की अवधारणा थी कि हर धर्म से समान दूरी बनाकर रखी जाये. बाद की सरकारों ने सभी धर्मों से समान नज़दीकी बनाने की कोशिश में इसकी आत्मा को तोड़-मरोड़ दिया. नरेंद्र देव का कहना था, ‘शिक्षा में धर्म के समर्थन में कहा जाता है कि सभी धर्म मूलतः एक ही भाव लिए हुए हैं. मैं मानता हूं कि कुछ सर्वव्यापक तत्व ऐसे हैं जो सभी धर्मों में समान हैं. पर ऐसे भी कुछ तत्व हैं जो एक-एक संप्रदाय के अपने-अपने विशेष हैं. जनता जिस धर्म को समझती है और पालन करती है वह तो विशिष्ट विधियुक्तकर्म और पूजा पाठ ही है और ये सब संप्रदायों में अलग-अलग हैं. सीधी और सच्ची बात यही है कि धर्म समाज की एक घातक शक्ति है.’

नेहरू और नरेंद्र देव

नरेंद्र देव, जवाहर लाल नेहरू से सिर्फ दो हफ़्ते बड़े थे. दोनों की परवरिश खासे अलग-अलग माहौल में हुई थी. जहां नेहरू ने समाजवाद यूरोप से ग्रहण किया, नरेंद्र देव ने देश में रह कर उसकी ज़मीन तलाशी. नेहरू पूंजीवाद और समाजवाद के बीच गतिमान थे. नरेंद्र देव समाजवाद की धुरी पर टिके रहे.

लेकिन यही नरेंद्र देव, जवाहर लाल नेहरू की राजनैतिक और वैश्विक सोच के कायल थे और यह भी मानते थे कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की जो छवि है, वह नेहरू की ही देन है. उनके मुताबिक़ नेहरू का मुख्य योगदान राष्ट्रीय आंदोलन को नवीन धारा से जोड़ना था. साथ ही उनका यह भी मानना था कि नेहरू की समाजवादी सोच में लोकतंत्र और पूंजीवाद का समावेश था लिहाज़ा वे समाजवाद को अपनी नीतियों में नहीं उतार पाए.

नरेंद्र देव, नेहरू की आर्थिक नीतियों के धुर विरोध में उतरे और इस कदर उतरे कि नेहरू भी सहम गए. एक बार उन्होंने कहा, ‘जवाहरलाल भीड़तंत्र से शक्ति प्राप्त करते हैं. उनको सभाओं में जनसागर भाता है. नेहरू अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता के भ्रम में पड़कर सोचते हैं कि जनता उनके प्रशासन से खुश है. यह निष्कर्ष हालांकि हमेशा सही नहीं हो सकता.’

1948 में जब नरेंद्र देव और अन्य समाजवादियों ने सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की तो उत्तर प्रदेश विधानसभा से इस्तीफ़ा देकर चुनाव लड़ा. वे कांग्रेस के उम्मीदवार से हार गये. जानकार बताते हैं कि कांग्रेसियों ने उनके ख़िलाफ़ दुष्प्रचार किया था. बताया जाता है कि उनकी हार से नेहरू भी अचंभित हुए

राहें अलग हुई थीं पर दिल नहीं. यह तब भी दिखा जब नरेंद्र देव की मृत्यु हुई. उन्हें याद करते हुए जवाहर लाल नेहरू ने संसद में जो भाषण दिया वह अपने आप में ऐतिहासिक है. वे कई बार भावुक हो उठे थे. उन्होंने कहा, ‘आचार्य नरेंद्र देव की मृत्यु हममें से कुछ लोगों के लिए और देश के बहुत बड़ा आघात है. वे कई खूबियों वाले शख्स थे. ऐसी विलक्षण प्रतिभाएं कम ही हुई हैं.’ आगे उनका कहना था, ‘इस सदन में मौजूद सभी लोगों की अपेक्षा जितना मेरा उनसे रिश्ता रहा किसी और का नहीं होगा. लगभग 40 साल हम दोनों साथ रहे. आजादी के आंदोलन में धूल धक्कड़ साथ-साथ ही सहे. हम दोनों चार या पांच साल जेलों में साथ रहे और एक-दूसरे को भीतर से जान पाए. उनका यूं चले जाना ज़बरदस्त नुकसान है, ज़बरदस्त धक्का है और देश के लिए भी ज़बरदस्त घाटा है. समाज में से कुछ खो गया है, निजी तौर पर कुछ खो गया है और ये सोचकर दिल बैठा जा रहा है कि इतने विलक्षण व्यक्ति के चले जाने की भरपाई कैसे होगी.’

फ़ैज़ाबाद और नरेंद्र देव

फैज़ाबाद से आचार्य नरेंद्र देव का खासा जुड़ाव रहा. वे बतौर वकील यहां प्रैक्टिस किया करते थे. आज के राजनैतिक माहौल में यह शहर नरेंद्र देव के धर्मनिरपेक्ष विचारों की कसौटी पर है. कुछ यह भी सकते हैं कि शहर और उसके बाशिंदों को परखे जाने के बजाय आचार्य के विचार कसौटी पर रखे जाएं. तो बात यह है साहब कि विचार तटस्थ होते हैं और हम चलायमान. धर्मनिरपेक्षता बहुतों को कुछ साल पहले तक मान्य थी, आज नहीं है. बात काटते हुए आप कह सकते हैं कि समाजवाद की प्रासंगिकता सर्वहारा की दृष्टि से परखी गयी थी . जब तालमेल नहीं बैठा, तो उसे नकार दिया गया न कि सर्वहारा को . इस बात के जवाब में सिर्फ यही कहा जा सकता है कि समाजवाद आज भी नकारा नहीं गया है. प्रारूप वही है. जामा अलग पहना दिया गया है. आज हर अर्थशास्त्री पूंजीवाद का मानवीय चेहरा तलाश कर रहा है. क्या आरक्षण एक प्रकार का समाजवाद नहीं है? क्या सरकारों की विभिन्न नीतियां समाजवादी नहीं हैं? और रही बात सर्वहारा की तो वह हर काल में नकारा गया है.