जून 1946 में जवाहर लाल नेहरू जेल में बंद शेख अब्दुल्ला से मिलकर उनके वकील के रूप में पेश होना चाहते थे. लेकिन कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री रामचंद्र काक के निर्देश पर उनको श्रीनगर पहुंचने से पहले ही गिरफ़्तार कर लिया गया. इस घटना के बारे में एक कहानी चल पड़ी थी कि जब सरदार पटेल से पूछा गया कि ‘सरदार साहब, काक का क्या करेंगे?’ तो इसपर सरदार पटेल ने जवाब दिया- ’काक? काक तो जल्दी ही खाक में मिल जाएंगे.’

सरदार पटेल का अंदाज ऐसा ही कड़क था. लेकिन उनकी इस कठोरता के पीछे सच्चाई, अनुशासन और साधना से भरे जीवन से उपजी करुणा थी. सरदार पटेल के व्यक्तित्व का सुंदर चित्रण नेहरू ने अपनी आत्मकथा में कई स्थानों पर किया है. बारडोली सत्याग्रह में सरदार की भूमिका के बारे में नेहरू लिखते हैं, ‘गुजरात में किसानों ने बड़े पैमाने पर संघर्ष शुरू कर दिया, क्योंकि गवर्नमेंट ने यह चाहा कि मालगुजारी बढ़ा दी जाए. गुजरात में किसान खुद अपनी जमीन के मालिक थे और वहां हुकूमत सीधे किसानों से ताल्लुक रखती है. यह संघर्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में हुआ बारडोली का सत्याग्रह था. इस संघर्ष में किसानों की बहादुरी की विजय हुई, जिसे देखकर तमाम हिन्दुस्तान वाह-वाह करने लगा. ...हिन्दुस्तान के किसानों के लिए बारडोली आशा, शक्ति और विजय का प्रतीक बन गई.’

इसी तरह भगतसिंह को फांसी दिए जाने के तत्काल बाद आयोजित कांग्रेस के कराची अधिवेशन की अध्यक्षता सरदार पटेल कर रहे थे. इस बारे में अपनी आत्मकथा में नेहरू लिखते हैं, ‘इस अधिवेशन के सभापति सरदार वल्लभ भाई पटेल हिन्दुस्तान के बहुत ही लोकप्रिय और जोरदार आदमी थे और उन्हें गुजरात के सफल नेतृत्व की सुकीर्ति प्राप्त थी.’

1930 में गोलमेज सम्मेलन के आसपास ग्लोर्ने वोल्टन नाम के एक अंग्रेज पत्रकार ने ‘दी ट्रेजडी ऑफ गांधी’ नाम की अपनी किताब में लिखा, ‘मुलतान नाम के जहाज में जो लीडर बैठे हुए थे, वे यह जानते थे कि गांधीजी के खिलाफ कार्यसमिति के भीतर एक साजिश की गई है और वे यह भी जानते थे कि वक्त आते ही कांग्रेस उन्हें निकाल फेंकेगी. लेकिन कांग्रेस गांधीजी को निकालकर गालिबन अपने आधे के करीब मेंबरों को भी निकाल देगी.’

नेहरू ने इस मनगढ़ंत कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए अपनी आत्मकथा में लिखा है, ‘तो ये साजिश करनेवाले शख्स कौन हैं और इनका मकसद क्या है? कभी-कभी यह कहा जाता था कि मैं और कांग्रेस के सभापति सरदार वल्लभभाई पटेल कार्यसमिति के मेंबरों में सबसे ज्यादा गरम स्वभाववाले हैं, और मेरा खयाल है, इसलिए साजिश करनेवाले नेताओं में हमलोगों की भी गिनती हुई होगी. लेकिन शायद गांधीजी का वल्लभभाई पटेल से ज्यादा सच्चा भक्त हिन्दुस्तान भर में दूसरा कोई न होगा. अपने काम में वह कितने भी कड़े और मजबूत क्यों न हों, लेकिन गांधीजी के आदर्शों, उनकी नीति और उनके व्यक्तित्व के प्रति उनकी बड़ी भक्ति है. मैं भले ही अपने बारे में यह दावा नहीं कर सकता कि मैंने भी उसी तरह से उन आदर्शों को माना है, लेकिन मुझे बहुत नजदीक रहकर गांधीजी के साथ काम करने का सौभाग्य मिला है. मेरे लिए उनके खिलाफ साजिश करने का खयाल राक्षसी है.’

सरदार पटेल नेहरू से उम्र में 14 साल बड़े थे. वे महात्मा गांधी के सबसे घनिष्ठतम और निकटतम व्यक्ति थे. कड़ा बोलते थे, खरा बोलते थे और एकदम सीधा बोलते थे. कोई लाग लपेट नहीं थी. कई बार महात्मा गांधी तक के लिए उन्होंने धर्मसंकट की स्थिति पैदा की थी. लेकिन कांग्रेस संगठन के भीतर यह धारणा एक अकाट्य सच्चाई के रूप में प्रचलित थी कि जो सरदार ने कह दिया, गांधी वही करेंगे. और यह भी कि यदि गांधीजी ने कुछ कह दिया, तो सरदार उसपर अपनी प्रकट आपत्ति दर्ज करते हुए भी उसे मान ही लेंगे. गांधीजी के प्रति पटेल का भाव इतनी आत्मीयता का था कि वे गांधीजी से मजाक भी कर सकते थे. वे गांधीजी से नाराज भी हो सकते थे. लेकिन गांधीजी की सेवा और देखभाल करने में भी वे सबसे आगे थे. इतना कि यरवदा जेल में एक साथ रहने के दौरान एक बार गांधी अस्वस्थ हुए. और इस बारे में महात्मा गांधी ने लिखा है कि उस दौरान पटेल ने उनकी ऐसी देखभाल की जैसी एक मां अपने बच्चे के लिए करती है.

नेहरू हमेशा ही सरदार पटेल को अपना वरिष्ठ सहयोगी और बड़ा भाई जैसा मानते रहे. हर मुश्किल की घड़ी में नेहरू ने सरदार से मार्गदर्शन लिया और उनसे संगठन चलाने का तौर-तरीका सीखा. भारतीय राष्ट्र के निर्माण में महात्मा गांधी के बाद दोनों की भूमिका दो हाथों-पैरों या दो आंखों जैसी थी. दोनों एक-दूसरे के पूरक थे. नेहरू आदर्शों, विचारों और वैश्विक विज़न वाले व्यक्ति थे, जबकि सरदार पटेल कांग्रेस संगठन और देश की आंतरिक व्यवस्था को चलाने वाले कर्मयोगी थे. महात्मा गांधी ने बहुत सोच-समझकर नेहरू को घोषित रूप से अपना उत्तराधिकारी बताया था. कारण कि एक तो पटेल उम्रदराज हो चुके थे, अस्वस्थ रहते थे और लंबी यात्राओं से बचते थे. और दूसरा कि एक नवीन राष्ट्र को एक कठिन वैश्विक परिदृश्य में अपना स्थान बनाने के लिए नेहरू जैसा ही एक ऐसा नेतृत्व चाहिए था. अंतरिम सरकार में दोनों की भूमिका भी एकदम वैसी ही रही. नेहरू और पटेल दोनों एक-दूसरे के पूरक के तौर पर देशहित को ध्यान में रखकर काम करते रहे. एक ने विदेश मंत्रालय तो दूसरे ने गृह मंत्रालय की बागडोर अपने हाथों में ली. भारत की तत्कालीन आंतरिक परिस्थितियों में सरदार पटेल ने जिस प्रकार की भूमिका निभाई, वैसा शायद ही कोई और निभा सकता था.

गांधीजी के आश्रम में लंबे समय तक रहनेवाले हरिभाऊ उपाध्याय पंडित नेहरू और सरदार पटेल दोनों ही के बहुत करीबी रहे. अपने संस्मरण ‘सरदार पटेल : इन कॉन्ट्रास्ट विद नेहरू’ में उन्होंने लिखा है, ‘पंडित नेहरू और सरदार पटेल का मिज़ाज अलग तरह था. दोनों के कार्य करने की शैली भी अलग थी. लेकिन अंतरिम सरकार में पटेल ने नेहरू को तत्काल अपना नेता मानना शुरू कर दिया और दूसरी तरफ पंडितजी भी उन्हें अपने परिवार के बड़े भाई जैसा सम्मान देते थे. मतभेदों और अनबन की अफवाहों के बीच लोग दोनों के अलगाव की उम्मीद करके खुश तो होने लगे, लेकिन सरदार ने कभी ऐसी बातों को तूल नहीं दिया. यदि दोनों में से किसी की भी नीतियों की कोई तीसरा व्यक्ति आलोचना करता, तो ये दोनों ही एक-दूसरे के बचाव में उस आलोचक को आड़े हाथों लेते थे. दोनों ही एक-दूसरे के लिए ढाल का कार्य करते थे. एक बार सरदार के एक बहुत ही नजदीक माने-जाने वाले व्यक्ति ने मुझे बताया कि मृत्यु-शैय्या पर अपने अंतिम क्षणों में सरदार ने चुपचाप मुझे बताया कि हम नेहरू की ठीक से देखभाल करें, क्योंकि सरदार के गुजर जाने पर नेहरू बहुत ही अधिक दुखी हो जाएंगे.

...ठीक इसी तरह एक बार नेहरू को किसी ने बताया कि सरदार ने उनपर कोई तल्ख टिप्पणी की है. वास्तव में सरदार अपनी व्यंग्योक्तियों के लिए मशहूर थे और एक बार नेहरू उसका शिकार हो गए. उस कटाक्ष की बात जब किसी ने नेहरू को सुनाई तो नेहरू ने अपने उस मित्र को लगभग डांटते हुए कहा, ‘इसमें कौन सी बड़ी बात हो गई! आखिरकार वे हमारे बड़े भाई जैसे हैं, उन्हें हमपर व्यंग्य करने का पूरा अधिकार है. वे हमारे अभिभावक हैं.’

एक बार किसी ऐसे ही अवसर पर नेहरू ने कहा था, ‘मजबूत इरादों और इच्छा-शक्ति के धनी, भारत की आज़ादी के लिए समर्पित एक महान संगठनकर्ता के रूप में यह होना ही था कि कुछ लोग सरदार पटेल के बारे में तीव्र प्रतिक्रिया दें. कुछ लोग उन्हें पसंद नहीं करते क्योंकि वे उनके विचारों से सहमत नहीं हो पाते. लेकिन इससे कहीं अधिक संख्या ऐसे लोगों की है जिनको सरदार पटेल के रूप में अपनी पसंद का नेता मिला है. उनके साथ करते हुए, उनके नेतृत्व में काम करते हुए भारत की आज़ादी की एक मजबूत बुनियाद पड़ी है.’

सरदार पटेल के निधन पर पंडित नेहरू ने कहा था, ‘सरदार का जीवन एक महान गाथा है जिससे हम सभी परिचित हैं और पूरा देश यह जानता है. इतिहास इसे कई पन्नों में दर्ज करेगा और उन्हें राष्ट्र-निर्माता कहेगा. इतिहास उन्हें नए भारत का एकीकरण करने वाला कहेगा. और भी बहुत कुछ उनके बारे में कहेगा. लेकिन हममें से कई लोगों के लिए वे आज़ादी की लड़ाई में हमारी सेना के एक महान सेनानायक के रूप में याद किए जाएंगे. एक ऐसे व्यक्ति जिन्होंने कठिन समय में और जीत के क्षणों में, दोनों ही मौकों पर हमें नेक सलाह दी. एक ऐसे दोस्त, सहकर्मी और कॉमरेड जिनके ऊपर हम हर हाल में भरोसा कर सकते थे. वे एक ऐसे मजबूत दुर्ग की तरह थे जिन्होंने संकट के समय में हम सबके कमजोर और ढुलमुल हृदय में वीरता की भावना भरी.’

हममें से जिन लोगों के मन में नेहरू और पटेल के आपसी संबंधों को लेकर तमाम तरह की भ्रांतियां मौज़ूद हैं, उन्हें 1949 में नेहरू के 60वें जन्मदिन के उपलक्ष्य में लिखा गया सरदार पटेल का संदेश पढ़ना चाहिए. पटेल ने इसमें लिखा था, ‘कई तरह के कार्यों में एक साथ संलग्न रहने और एक-दूसरे को इतने अंतरंग रूप से जानने की वजह से स्वाभाविक रूप से हमारे बीच का आपसी स्नेह साल-दर-साल बढ़ता गया है. लोगों के लिए यह कल्पना करना भी मुश्किल होगा कि जब हमें एक-दूसरे से दूर होना पड़ता है और समस्याओं को सुलझाने के लिए हम एक-दूसरे से सलाह-मशविरा नहीं कर पाने की स्थिति में होते हैं, तो हम दोनों को एक-दूसरे कमी कितनी खलती है. इस पारिवारिकता, नजदीकी, अंतरंगता और भ्रातृवत स्नेह की वजह से उनकी उपलब्धियों का लेखा-जोखा करना और सार्वजनिक प्रशंसा करना मेरे लिए बहुत मुश्किल है. लेकिन फिर भी, राष्ट्र के प्यारे आदर्श, जनता के नेता, देश के प्रधानमंत्री और आमजनों के नायक के रूप में उनकी महान उपलब्धियां एक खुली किताब जैसी हैं.’

सरदार पटेल ने आगे लिखा, ‘...जवाहरलाल उच्च स्तर के आदर्शों के धनी हैं, जीवन में सौंदर्य और कला के पुजारी हैं. उनमें दूसरों को मंत्रमुग्ध और प्रभावित करने की अपार क्षमता है. वे एक ऐसे व्यक्ति हैं जो दुनिया के अग्रणी लोगों के किसी भी समूह में अलग से पहचान लिए जाएंगे. ...उनकी सच्ची दृढ़प्रतिज्ञता, उनके दृष्टिकोण की व्यापकता, उनके विज़न की सुस्पष्टता और उनकी भावनाओं की शुद्धता— ये सब कुछ ऐसी चीजें हैं जिसकी वजह से उन्हें देश और दुनिया के करोड़ों लोगों का सम्मान मिला है. ...इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि स्वतंत्रता की अल्लसुबह के धुंधलके उजास में वे हमारे प्रकाशमान नेतृत्व बनें. और जब भारत में एक के बाद एक संकट उत्पन्न हो रहा हो, तो हमारी आस्था को कायम रखनेवाले और हमारे सेनानायक के रूप में हमें नेतृत्व प्रदान करें. मुझसे बेहतर इस बात को कोई नहीं समझ सकता कि हमारे अस्तित्व के इन दो कठिन वर्षों में उन्होंने देश के लिए कितनी मेहनत की है. देश के प्रति अपनी व्यापक जिम्मेदारियों के निर्वहन और अपनी चिंताओं के चलते इन दो सालों में मैंने उन्हें तेजी से बूढ़ा होते हुए देखा है.’

ऐसी भावना थी सरदार पटेल और नेहरू की एक-दूसरे के प्रति. आज लोग सरदार पटेल और जवाहर लाल नेहरू को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश करते हैं. लेकिन सच्चाई तो यह है कि गांधीजी की पाठशाला में अहिंसा, सत्याग्रह, त्याग, सादगी और सर्वधर्मसद्भाव का आजीवन पाठ सीखकर निकले ये लोग देश और समाज के हित को अपने मतभेदों से ऊपर रखते थे. मतभेद कहां नहीं होता? दो सबसे अच्छे मित्रों के बीच भी मतभेद होता है. पति-पत्नी के बीच मतभेद होता है. प्रेमियों और प्रेमिकाओं के बीच होता है. लंबे सार्वजनिक जीवन में अपना योगदान दे रहे किन्हीं भी दो विचारवान लोगों के बीच तो स्वस्थ वैचारिक मतभेद आखिरकार लोकतांत्रिक समाज और शासन के लिए अच्छा ही होता है. इससे न केवल संबंधित व्यक्तियों का वैचारिक विकास होता रहता है, बल्कि जनता का भी प्रबोधन होता है, उसमें सोचने-समझने की शक्ति जागृत होती है.

बड़ी-बड़ी मूर्तियां लगाकर हम इन महान नेताओं के इंसानी कद की थाह नहीं पा पाएंगे. आज हमारा पैमाना ही छोटा होता जा रहा है. सोचने-समझने का स्तर संकीर्ण होता जा रहा है. भाषा और संप्रेषण के स्तर पर हम उच्छृंखल होते जा रहे हैं. जाति, संप्रदाय, विचारधारा और दल के स्तर पर इस कदर बंटते जा रहे हैं मानो हम मानवीय एकता की जगह अधिक से अधिक विखंडन की ओर बढ़ना चाहते हों. और फिर हम इन्हीं संकीर्ण पैमानों से अतीत की महान शख्सियतों को नापने लगते हैं. मूर्तियां किसकी कब तक कायम रही हैं! कायम तो विचार रहते हैं. उदात्त मानवीय विचार. मूर्ति चाहे किसी की हो, मूर्ति-स्थापना की होड़ प्रायः वैचारिक शून्यता और नैतिक खोखलेपन को छिपाने के लिए ही होती है.