शाहरुख खान के अज़ीज दोस्त करण जौहर अपनी आत्मकथा ‘एन अनसूटेबल बॉय’ में एक दिलचस्प किस्से का जिक्र करते हैं. इसमें वे बताते हैं कि एक बार 80-90 के दशक के मशहूर टीवी प्रोड्यूसर आनंद महेंद्रू ने उन्हें मिलने के लिए बुलाया था. इस मुलाकात के लिए करण को महेंद्रू के ऑफिस के बाहर कई घंटे इंतजार करना पड़ा. लेकिन ऐसा करने वाले वे अकेले नहीं थे. करण जौहर लिखते हैं कि इंतजार करने के दौरान उन्होंने देखा कि एक युवक कॉफी और सिगरेट के साथ करीब तीन घंटे तक वहां अपना वक्त काटता रहा.

बाद में जब उस युवक को महेंद्रू से रूबरू होने का मौका मिला तो उसने कहा कि ‘मैं तो बस ये कहने के लिए आया था कि मैं आपका अगला सीरियल नहीं कर पाऊंगा क्योंकि अब मैं सिर्फ फिल्मों पर फोकस करना चाहता हूं.’ इस पर महेंद्रू का सवाल था क्या इतने घंटों से वह यहां पर सिर्फ यही बताने के लिए बैठा था. इसका जवाब उन्हें हां में मिला और यह जवाब देने वाला युवक और कोई नहीं शाहरुख खान थे. यह किस्सा इस बात की तरफ इशारा करता है कि शायद यह उनका बेमिसाल प्रोफेशनलिज्म ही था जिसने अगले पांच-सात सालों में ही शाहरुख खान को हमेशा के लिए ‘किंग खान’ या ‘बॉलीवुड का बादशाह’ बना दिया.

कल्पना करिए कि यह कहने के बाद शाहरुख खान सीधे ‘दीवाना’ के सेट पर पहुंचे होंगे और इसके निर्देशक राज कंवर के साथ वह सीन डिस्कस कर रहे होंगे जो उन्हें बॉलीवुड में एंट्री दिलाने वाला था. हालांकि यह कल्पना सच इसलिए नहीं हो सकती क्योंकि शाहरुख पहले ‘दिल आशना है’ से डेब्यू करने वाले थे जिसका निर्देशन हेमा मालिनी कर रहीं थी. बाद में यह क्रेडिट साल 1992 में रिलीज हुई फिल्म ‘दीवाना’ को मिल गया. एंट्री सीन पर लौटें तो इस आलेख की कवर इमेज (ऊपर) वही फ्रेम है जिसमें शाहरुख खान दुनिया को पहली बार सिल्वर स्क्रीन पर दिखाई दिये थे. सही तरह से डिजिटाइज ना हो पाने के कारण यह जरा धुंधला जरूर दिखता है, लेकिन फिर भी 26 साल पुराना यह चित्र शाहरुख खान के इंडस्ट्री में बिताए लंबे वक्त की गवाही तो दे ही देता है.

इस सीन में वे बाइक पर करतब करते हुए ‘कोई न कोई चाहिए, प्यार करने वाला’ गाते दिखाई देते हैं और अपनी पहली ही झलक से मानो यह कहते हैं कि कोई न कोई नहीं, ये मैं ही हूं जो अब सालों-साल इस स्क्रीन पर राज करने वाला है. उस समय करीब 27 साल के रहे शाहरुख खान के आत्मविश्वास को देखकर यह बात पूरा जोर लगाकर कही जा सकती है. बेहद प्रतिभाशाली अभिनेता ना होने के बावजूद यह कॉन्फिडेंस ही है जिसकी वजह से उनकी पहली ही फिल्म से उनके सुपरस्टार होने का आभास पूरी शिद्दत से होता है. उस समय बनने वाली ड्रामाई फिल्मों और उनके संवाद के हिसाब से उनके हीरोपन को आंकें तो इसमें उन्हें पूरे-पूरे नंबर दिए जा सकते हैं. इस बात के लिए कुछ एक्स्ट्रा भी कि दिव्या भारती जैसी सुपरस्टार के सामने भी वे दर्शकों का ध्यान खींचने और अपने हिस्से का क्रेडिट पाने में पूरी तरह सफल रहते हैं.

खांटी अभिनय की बात करें तो इस फिल्म में उनके किये काम में कमाल जैसी कोई बात ढूंढ पाना मुश्किल है. वे जिस तरह हंसते, रोते हैं या गुस्सा करते हैं, वह बनावटी होने से थोड़ा पहले ही आकर रुकता है. फिर भी फिल्म में कुछ दृश्य ऐसे भी हैं जिन्हें देखकर उनके अभिनय की उस खासियत का अंदाजा लगता है जिसने आने वाले वक्त में उन्हें ‘डर’, ‘अंजाम’ और ‘बाजीगर’ जैसी फिल्मों के लिए एकदम सही कास्टिंग बना दिया. इसके बावजूद इस अभिनय को देखकर यह कह पाना मुश्किल है कि इसे करने वाले को भविष्य में 15 फिल्मफेयर, 17 स्क्रीन और छह आइफा ट्रॉफियों से सम्मानित किया जाएगा.

जो शाहरुख खान आज रोमांस के किंग कहे जाते हैं, अफसोस कि यह फिल्म उसकी जरा सी भी झलक नहीं दिखा पाती है. डुएट सॉन्ग में जब वे बाहें खोलते नजर आते हैं तो वह इतना फीका नजर आता है कि बहुत देर तक आपको इस बात पर यकीन करना मुश्किल होता है कि यही अंदाज आज शाहरुख की पहचान है. इससे यह भी पता चलता है कि एक बार अपनी यूएसपी पता चलने के बाद शाहरुख ने कितनी भली तरह से उसका इस्तेमाल किया है. ‘दीवाना’ में उन्हें एक्टिंग, डॉन्स और एक्शन करते हुए अगर आज देखा जाए तो रह-रहकर यह एक और बात दिमाग में आ सकती है - कितना भी स्टार मटीरियल क्यों न हो, शाहरुख खान एक दिन में नहीं बना करते हैं.