तेलंगाना विधानसभा चुनावों में बड़ी अजीब सी स्थिति बनी हुई है. इन चुनावों में सबसे प्रमुख चेहरा मुख्यमंत्री और तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव का है. चुनावी मुकाबले में मौजूद दूसरे पक्षों की ओर देखें तो कोई भी ऐसा नहीं दिखता जो उनकी टक्कर का हो या पूरे तेलंगाना में उसकी एक अलग राजनीतिक पहचान हो.

कांग्रेस एक पार्टी और महागठबंधन की अगुवाई करने वाली पार्टी के तौर पर चंद्रशेखर राव को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में है. लेकिन उसके पास प्रदेश में कोई ऐसा बड़ा चेहरा नहीं है जिसके नाम पर वह वोट मांग सके. यही स्थिति आंध्र प्रदेश की सत्ताधारी तेलगूदेशम पार्टी की है. तेलंगाना में भी इस पार्टी के सबसे चर्चित चेहरा आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू का ही है. प्रदेश स्तर पर जो नेता हैं, उनकी पूरे राज्य में अलग पहचान नहीं है. केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी चाहे तेलंगाना में जितनी भी जोर-आजमाइश कर रही हो लेकिन उसकी चुनावी संभावनाएं यहां इसलिए भी बेहद सीमित हैं कि उसके पास प्रदेश स्तर पर लोकप्रिय चेहरों का अभाव है.

इस स्थि​ति में सभी पक्षों को मिलाकर मोटे तौर पर तीन चेहरे दिखते हैं, जिनके बारे में कहा जा सकता है कि वे तेलंगाना विधानसभा चुनावों के केंद्र में हैं.

के चंद्रशेखर राव

के चंद्रशेखर राव तेलंगाना के पहले मुख्यमंत्री हैं. उनकी तेलंगाना राष्ट्र समिति की पहचान एक ऐसी पार्टी की बनी है जिसने तेलंगाना को एक अलग राज्य बनाने के लिए लगातार संघर्ष किया. इसी पहचान का फायदा उन्हें 2014 के विधानसभा चुनावों में मिला था. वे और उनकी पार्टी अक्सर अपनी सभाओं में तेलंगाना राज्य बनाने में पार्टी की भूमिका की बात करके अब भी इस मसले पर समर्थन हासिल करने की कोशिश करते दिखते हैं. लेकिन इस बार लोगों के बीच अलग राज्य बनवाने से अधिक बड़ा मुद्दा यह है कि पिछले पांच साल में उनकी सरकार ने क्या किया? और दूसरी पार्टियां तेलंगाना के लिए क्या एजेंडा लेकर आ रही हैं. इसलिए केसीआर और उनकी पार्टी इस बार के चुनाव में कृषि, सिंचाई और औद्योगिक विकास के क्षेत्र में किए गए अपने कामों को भी गिनाते दिखते हैं.

के चंद्रशेखर राव की इन चुनावों में सबसे बड़ी ताकत यही दिख रही है कि उनके कद का कोई नेता चुनाव लड़ रही किसी पार्टी में कम से कम प्रदेश स्तर पर नहीं दिख रहा है. चंद्रशेखर राव के बाद अगर तेलंगाना में सबसे अधिक पहचाने जाने वाले चेहरे कोई हैं तो वे भी उन्हीं की पार्टी और परिवार के ही हैं. उनके बेटे केटी रामा राव उनकी सरकार में मं​त्री हैं और उनकी बेटी के कविता लोकसभा सांसद हैं. चंद्रशेखर राव के भतीजे और उनकी सरकार में मंत्री हरीश राव भी तेलंगाना में जाना-पहचाना चेहरा है. इन तीनों की पहचान विपक्ष के प्रदेश स्तर के अधिकांश नेताओं से कहीं अधिक मजबूत दिखती है.

उत्तम कुमार रेड्डी

चंद्रशेखर राव को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में तेलंगाना में सिर्फ कांग्रेस ही दिख रही है. कांग्रेस की अगुवाई में एक महागठबंधन भी बना है. इसमें आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की तेलगूदेशम पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी और टीजेएसी शामिल हैं. इस पूरे महागबंधन में, तेलंगाना में भी सबसे व्यापक पहचान रखने वाले नेता चंद्रबाबू नायडू ही हैं. यही वजह है कि उनकी भी सभाएं यहां महागठबंधन के लिए होने वाली हैं. लेकिन प्रदेश स्तर पर इस महागठबंधन को नेतृत्व देने की वजह से कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष उत्तम कुमार रेड्डी इस बार के विधानसभा चुनावों में एक प्रमुख चेहरा बन गए हैं.

उत्तम कुमार रेड्डी अभी विधायक हैं. वे पिछली बार लगातार चौथी बार विधानसभा चुनाव जीते थे. जब तेलंगाना, आंध्र प्रदेश का हिस्सा था तो उस वक्त की किरण कुमार रेड्डी सरकार में वे कैबिनेट मंत्री थे. जब तेलंगाना अलग राज्य बना तो उस वक्त से ही पार्टी के जो प्रमुख चेहरे इस नए राज्य में उभरे, उनमें उत्तम कुमार रेड्डी भी हैं. कभी भारतीय वायु सेना में लड़ाकू विमान उड़ाने वाले उत्तम कुमार रेड्डी की सबसे बड़ी चुनौती महागठबंधन को बनाए रखना है. यह माना जा रहा है कि भले ही कांग्रेस या इस पूरे महागठबंधन के पास चंद्रशेखर राव के कद का कोई नेता नहीं हो लेकिन 2014 के चुनावों में मिले वोटों और जातिगत समीकरणों के मामले में यह चंद्रशेखर राव पर भारी पड़ सकता है.

स्वामी परिपूर्णानंद

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भले ही तेलंगाना में भाजपा सरकार बनाने का दावा कर रहे हों लेकिन जमीनी स्थिति भाजपा के लिए बिलकुल भी अनुकूल नहीं है. तेलंगाना में भाजपा के जिन नेताओं को लोग पहचानते हैं, वे राष्ट्रीय नेता हैं. इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का नाम प्रमुख है. प्रदेश स्तर पर भाजपा के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं है जिसकी पूरे राज्य में कोई पहचान हो. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव मुरलीधर राव को संगठन और संघ में तो सब लोग जानते हैं लेकिन प्रदेश के आम लोगों की बीच उनकी पहचान उतनी मजबूत नहीं हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री बंडारु दत्तात्रेय की भी यही स्थिति है.

ऐसे में हाल ही में भाजपा में शामिल किए गए श्रीपीठ मठ के स्वामी परिपूर्णानंद प्रदेश स्तर पर भाजपा के सबसे प्रमुख चेहरे के तौर पर उभरते दिख रहे हैं. कुछ लोग तो उन्हें तेलंगाना का योगी आदित्यनाथ भी कह रहे हैं. भाजपा को लगता है कि परिपूर्णानंद के जरिए वह यहां हिंदुत्व के मुद्दे को मजबूती से उठा सकती है और इसके आधार पर अपने पक्ष में वोटों की गोलबंदी कर सकती है. परिपूर्णानंद पर राज्य में हिंसा भड़काने वाले भाषण देने का मामला चल रहा है. वे अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मजबूती से समर्थन करने वालों में हैं. विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल समेत विभिन्न हिंदुत्ववादी संगठनों में भी उनकी खासी पैंठ है. ऐसे में सिर्फ पांच विधायकों वाली भाजपा को लगता है कि स्वामी परिपूर्णानंद तेलंगाना में उसकी राजनीतिक पैठ थोड़ी और गहरी कर सकते हैं.