अभी हफ्ते-दस दिन पहले की ही बात है जब गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के दफ़्तर से दो तस्वीरें जारी की गईं. इनमें मुख्यमंत्री दो अलग-अलग समय पर हुई बैठकों की अध्यक्षता करते दिख रहे हैं. उनके आसपास गोवा सरकार के मंत्री और अफसर खड़े-बैठे दिखाई दे रहे हैं. मनोहर पर्रिकर के घर पर ही इनमें से एक बैठक 30 और दूसरी 31 अक्टूबर को हुई बताई जाती है. इन तस्वीरों के जरिए गोवा के सरकारी तंत्र और साथ ही सत्ताधारी भाजपा ने भी लोगों को यह संदेश देने की कोशिश की है कि मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर स्वस्थ हो चले हैं और वे रोज़मर्रा के काम करने लगे हैं.

इससे आगे कुछ बात करने से पहले यह बताते चलें कि पर्रिकर काफी समय से पेन्क्रियाज़ (अग्नाशय) कैंसर से पीड़ित हैं. उनका मुंबई, अमेरिका और दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भी इलाज हो चुका है. कुछ समय पहले ही उन्हें एम्स दिल्ली से वापस गोवा भेज दिया गया था. हालांकि उनके स्वास्थ्य में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ है. वे बीते चार-छह महीनों से सरकारी काम नहीं कर पा रहे हैं. उनका ज़्यादातर समय अपने घर पर बीत रहा है, जहां वे अब भी स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं.

अब इस पृष्ठभूमि के साथ आगे की बात यह कि गोवा सरकार और भाजपा ने बैठकों की अध्यक्षता करते मनोहर पर्रिकर की तस्वीरें उनके बारे में अच्छा संदेश देने के लिए जारी की थीं. लेकिन मामला इन्हीं तस्वीरों की वज़ह से उल्टा पड़ गया क्योंकि इन तस्वीरों में पर्रिकर कृशकाय (बेहद कमजोर) हालत में दिख रहे हैं. इतने अधिक कि उन्हें बैठने, बैठे रहने और हाथ टिकाने के लिए भी तकियों और गाव तकियों की मदद लेनी पड़ रही है. इसे लेकर अब एक नई बहस शुरू हो गई है.

राज्य के पूर्व चुनाव आयुक्त प्रभाकर टिंबले ने इन तस्वीरों को ‘डरावना’ और ‘संवेदनहीन’ बताया है. उन्होंने मीडियाकर्मियों और सोशल मीडिया यूजर्स से अपील की है कि इन तस्वीरों को प्रसारित (वायरल) न करें. उन्हें भूल जाएं क्योंकि उन लोगों (जिन्होंने तस्वीरें जारी कीं) को पता नहीं है कि उन्होंने क्या किया है.

ख़ास मक़सद से ली गई इन तस्वीरों से यह तो साफ दिखता ही है कि पर्रिकर की पार्टी और उसके सहयोगियों को अपने मुख्यमंत्री की चिंता नहीं है. वे मुख्यमंत्री को आराम करने का अवकाश भी नहीं दे पा रहे हैं. या फिर इसका कि वे स्वास्थ्य के मद्देनज़र अपनी ज़िम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त ही हो सकें.

यही वजह है कि पार्टी की आलोचना हो रही है. निक्सन फर्नांडिस नाम के एक शख़्स ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘हमारे मुख्यमंत्री बेहद नाजुक स्थिति में दिख रहे हैं. उन पर दया आती है. उन्हें सम्मानपूर्वक इस्तीफ़ा देने की इजाज़त दी जानी चाहिए. लेकिन नहीं... वे जो दिल्ली में बैठे हैं उन्हें गोवा की भाजपा सरकार बचाने की फ़िक्र ज़्यादा है. भले फिर वह मुख्यमंत्री की ज़िंदगी की कीमत पर ही क्यों न हो.’

स्थानीय मीडिया ने भी इन तस्वीरों पर तीखी टिप्पणियां की हैं. स्थानीय दैनिक ‘द गोवा’ ने अपने संपादकीय में लिखा है, ‘इन तस्वीरों से पर्रिकर की उपस्थिति (कांग्रेस ने उनके निधन की आशंका तक जता दी थी) तो नि:संदेह साबित होती है. लेकिन यह सवाल अब भी क़ायम है कि क्या वे वाक़ई निवेश संवर्धन बोर्ड (दो में से एक यह भी थी) बैठक ले पा रहे थे. इस एकांतता में शासन नहीं हो सकता. इन तस्वीरों से यह भी पता नहीं चलता कि पर्रिकर का स्वास्थ्य इस वक़्त कैसा है.’

संपादकीय में आगे लिखा है, ‘राज्य के मंत्री लगातार कह रहे हैं कि पर्रिकर ‘ठीक’ हैं. उनका स्वास्थ्य लगातार सुधर रहा है. वे जल्द ही वापस काम पर लौटेंगे. लेकिन उनका कोई ऑडियो-वीडियाे संदेश मई के बाद से अब तक सार्वजनिक नहीं हुआ है. उन्होंने आख़िरी ऑडियो-वीडियो संदेश उस वक़्त राज्य की जनता के नाम तब दिया था जब वे अमेरिका में इलाज करा रहे थे. जिन दो बैठकों की तस्वीरें जारी की गईं हैं, उनका कोई वीडियो-ऑडियो भी जारी नहीं किया गया. इन बैठकों के बाबत जारी प्रेस विज्ञप्ति में भी ऐसा कुछ नहीं लिखा कि इनमें पर्रिकर ने क्या कहा. किस तरह के निर्देश वग़ैरह दिए.’

हालांकि मनोहर पर्रिकर और उनकी पार्टी के समर्थकों की राय इससे बिल्कुल ज़ुदा है. निहार अमोनकर नाम के एक समर्थक ने सोशल मीडिया पर लिखा है, ‘अपनी मातृभूमि के प्रति इस शख़्स की निष्ठा को मैं सलाम करता हूं. हम लोग जब अपनी ज़िंदगी को आसान बनाने के लिए तमाम बहाने खोजते रहते हैं, तभी हमारे सामने वे (पर्रिकर) एक मिसाल की तरह आते हैं, जिन्होंने अपने लिए लगातार मुश्किल राह चुनी है. ख़ुद से पहले अपने लोगों को रखा है.’

सरकारी कामकाज तो फिर भी बाधित हो ही रहा है

गोवा सरकार और भाजपा ने भले इन तस्वीरों से यह साबित करने की कोशिश की हो कि मनोहर पर्रिकर ठीक हैं और सरकारी कामकाज ठीक तरह से चल रहा है. लेकिन यह बात पूरी तरह सही नहीं है. सच यह है कि पणजी में मुख्यमंत्री निवास पर एक सघन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) स्थापित की गई है. चिकित्सकों-नर्साें आदि की पूरी एक टीम है, जो पर्रिकर के स्वास्थ्य पर लगातार नज़दीकी निगरानी रख रही है. उनकी इस हालत की वज़ह से सरकार की निर्णय प्रक्रिया भी लगातार प्रभावित हाे रही है. वह भी अभी कुछ समय से नहीं बल्कि बीती फरवरी से जब पर्रिकर पहली बार बीमार पड़े और अस्पताल में भर्ती हुए थे.

राज्य से जुड़े कई अहम मसलों पर फैसले नहीं हो पा रहे हैं. फिर चाहे वह खनन गतिविधियां फिर शुरू करने का मसला हो या फिर पड़ोसी राज्यों के साथ पानी के बंटवारे संबंधी विवाद का. पर्यटन, कैसीनो संचालन और रोजगार सृजन जैसे मसलाें पर भी नीतिगत निर्णय अटके हुए हैं. हालांकि 30 अक्टूबर की बैठक में निवेश संवर्धन बाेर्ड ने सात परियोजनाओं को हरी झंडी दी. इसके बाद अगले दिन राज्य मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई गई, जो बीते अगस्त के बाद पहली बार हुई थी. लेकिन सवाल वही कि क्या इन बैठकों में वाक़ई मनोहर पर्रिकर ने कुछ किया है? या वे शासन संचालन में कुछ कर पाने की स्थिति में भी हैं?

इसका कुछ ज़वाब राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर देते हैं. वे बताते हैं, ‘मुख्यमंत्री कार्यालय में पदस्थ पर्रिकर के मुख्य सचिव और सचिव उनसे मौखिक निर्देश ले रहे हैं. उन्हीं को सरकारी आदेशाें का अनुमोदन माना जा रहा है. यह असामान्य इंतज़ामात हैं. लेकिन हम मज़बूर हैं. हम अपनी नौकरी से बंधे हुए हैं.’

इधर विपक्ष की ओर से लगातार आरोप लगाए जा रहे हैं. उसका कहना है कि मुख्यमंत्री कार्यालय पर उनकी पार्टी के कुछ पदाधिकारियों का नियंत्रण स्थापित हो चुका है. ख़ास तौर पर उस दौरान जब पर्रिकर को लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा था. आज भी उन्हें संक्रमण से दूर रखने की गरज से उन तक कम से कम फाइलें और सरकारी दस्तावेज़ पहुंचाए जा रहे हैं. इससे सरकारी कामकाज़ की गुणवत्ता लगातार सवालों के घेरे में बनी हुई है.

भाजपा की अपनी मज़बूरियां

दूसरी तरफ भाजपा है जिसकी अपनी मज़बूरियां हैं और जिनकी वज़ह से वह महीनों से मनोहर पर्रिकर की बीमारी को रहस्य के पर्दों में रख रही है. उसके पास मनोहर पर्रिकर का कोई विकल्प नहीं है. ख़ास तौर पर ऐसी कोई शख़्सियत जो राज्य के बेहद नाज़ुक सियासी गठबंधन की अगुवाई कर सके और जिसकी अगुवाई सभी सहयोगी दलों को मंज़ूर हो. इसी वज़ह से भाजपा के सामने जोख़िम यह है कि पर्रिकर की जगह मुख्यमंत्री की कुर्सी किसी और को दी गई तो गठबंधन की गांठें ढीली पड़ सकती हैं. यह टूट सकता है. सहयोगी छिटक सकते हैं. इसका अंज़ाम स्वाभाविक तौर पर एक राज्य की सत्ता खोने के रूप में सामने आएगा.

भाजपा के भीतर ही इस बात पर अभी एक राय नहीं बन पाई है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पर्रिकर के विकल्प के रूप में किसे बिठाया जाए. सहयोगी दलों का भी इसी तरह अपना अलग-अलग राग है. स्थिति यह है कि अब तक पार्टी पर्रिकर के नायब (उपमुख्यमंत्री) की नियुक्ति भी नहीं कर पाई है, जो कम से कम सरकार तो ठीक चलाते रहते. इधर, मनोहर पर्रिकर बीती 14 अक्टूबर से जब से दिल्ली से लौटे हैं, घर पर ही हैं. उनकी सेहत के बाबत कोई आधिकारिक मेडिकल बुलेटिन भी जारी नहीं हुआ है.

निश्चित रूप से राजनीतिक कारणों से ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विनय तेंदुलकर लगातार कह रहे हैं कि मनोहर पर्रिकर स्थिति में सुधार हो रहा है. लेकिन मुख्यमंत्री पद के दावेदारों का दबाव भी बढ़ता जा रहा है. संभवत: इसी वज़ह से बीती 28 अक्टूबर को पहली बार राज्य के स्वास्थ्य मंत्री विश्वजीत राणे ने यह स्वीकार किया कि पर्रिकर को अग्नाशय का कैंसर है. यह उनकी बीमारी के बाबत पहला आधिकारिक ख़ुलासा था. जबकि इससे कुछ दिन पहले राज्य विधानसभा के उपाध्यक्ष माइकल लोबो ने कहा था, ‘पर्रिकर की सेहत में कोई सुधार नहीं हो रहा है. उनकी सेहत ने उनकी सुनने की क्षमता पर भी विपरीत असर डाला है.’

हालांकि इस हद तक ख़राब सेहत बावज़ूद आज भी पर्रिकर ही वह कड़ी हैं जिन्होंने भाजपा को राज्य की सत्ता से जोड़ रखा है. उनके विकल्प में भाजपा के पास कोई सर्वमान्य नेतृत्व नहीं है. उसके दो अन्य पूर्व मंत्री भी बीमार और राजनीतिक परिदृश्य से अनुपस्थित हैं. सहयोगी दल मुखर होते जा रहे हैं. साथ ही पार्टी की स्थानीय इकाई में बग़ावत का ख़तरा भी मंडरा रहा है. निश्चित रूप से यही वे सब पहलू भी हैं जो मनोहर पर्रिकर को चेहरा-मोहरा बनाए रखने के लिए भाजपा को मज़बूर कर रहे हैं.