‘मैं ये अवॉर्ड अपनी मां को समर्पित करना चाहूंगी’ फ़िल्मकार रीमा दास ने बस इतना ही कहा था और ऑडिटोरियम में बैठे सितारों और आम दर्शकों की भी आंखें नम होने लगी थीं. जियो मामी मुंबई फ़िल्म फ़ेस्टिवल के बीसवें संस्करण के समापन समारोह की यह एक सबसे भावुक स्मृति है. गुरुवार को हुए इस समारोह में रीमा दास को उनकी फ़िल्म ‘बुलबुल कैन सिन्ग’ के लिए इस साल इंडिया गोल्ड सेक्शन के गोल्डन गेटवे अवॉर्ड दिया गया है. ख़ास बात ये है कि पिछले साल भी, ठीक तीन सौ पैंसठ दिन पहले, यही अवॉर्ड रीमा को उनकी फ़िल्म ‘विलेज रॉकस्टार्स’ के लिए दिया गया था. इस साल दो राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी ‘विलेज रॉकस्टार्स’ 2019 के ऑस्कर के लिए भारत की फॉरेन लैंग्वेज कैटगरी में ऑफ़ीशियल एन्ट्री है. रीमा की इस फ़िल्म को न सिर्फ़ दर्शकों को प्यार, बल्कि क्राउडफंडिंग के ज़रिए उनका भरपूर समर्थन भी मिला. हाल ही में असम सरकार ने इस फ़िल्म को प्रोमोट करने के लिए एक करोड़ रुपए की राशि देने की घोषणा की है.

इस साल भी मामी में रीमा दास की अगली फ़िल्म ‘बुलबुल कैन सिन्ग’ की ख़ूब धूम रही. तीन किशोर बच्चों के ख़्वाब, डर, दोस्ती और अपनी सेक्सुअल पहचानों को लेकर अपने ही भीतर के सवालों को केन्द्र में रखकर बनी इस असमिया फ़िल्म की सरलता और सहज क़िस्सागोई का सिनेमाई अंदाज़ ही इसकी सबसे बड़ी जीत है. रीमा की फ़िल्मों में उनका गांव, गांव का परिवेश और वहां के किरदार हमेशा से अहम भूमिका निभाते रहे हैं. चूंकि रीमा अपनी फ़िल्में लिखती हैं, डायरेक्ट भी करती हैं, कैमरा वर्क भी करती हैं और आख़िर में एडिटिंग भी ख़ुद ही करती हैं, इसलिए उनके किरदारों के साथ कैमरे का अंतरंग हो जाना उनकी फ़िल्मों की स्वाभाविक नियति है.

हालांकि परिवेश और कथानक एकदम अलग है, लेकिन इसी अंतरंगता की वजह से आदिश केलुस्कर की फ़िल्म ‘जाऊं कहां बता ऐ दिल’ को इस साल का यंग क्रिटिक्स चॉयस अवॉर्ड दिया गया. पच्चीस साल से कम की उम्र के युवा आलोचकों को यह फ़िल्म शायद इसलिए इतनी पसंद आई है क्योंकि इसकी कहानी में भी एक किस्म का अंतरंग मगर बेहद डार्क महानगरीय रोमांस है.

इस साल ‘हाफ़ टिकट’ कैटगरी की फ़िल्में मामी फ़िल्म फ़ेस्टिवल का ख़ास आकर्षण रहीं. बच्चों के लिए ख़ास तौर पर स्क्रीन की गई इन फ़िल्मों का चुनाव भी बच्चों की एक टीम ने किया, और फिर अवॉर्ड के फ़ैसले भी बच्चों द्वारा ही किए गए. पांच से नौ साल के बच्चों के लिए हाफ़ टिकट का गोल्डन गेटवे फॉर बेस्ट शॉर्ट फ़िल्म डच फ़िल्ममेकर आस्ट्रिड बसिंक की फ़िल्म ‘लिसेन’ को दिया गया है.

नौ साल से ज़्यादा उम्र के बाल दर्शकों के लिए गोल्डन गेटवे फॉर द बेस्ट फीचर डेनिस डो की एनिमेशन फ़िल्म ‘फुनान’ को दिया गया. सत्तर के दशक के कंबोडिया के सामाजिक उथल-पुथल की पृष्ठभूमि की यह अत्यंत पर्सनल और पारिवारिक कहानी अपने वक़्त के समाज के साथ-साथ एक एक परिवार की छीजती उम्मीदें को दिखाती है. एशिया का इतिहास समझने के लिए यह फ़िल्म बच्चों के लिए जितनी ज़रूरी है, उतनी ही बड़ों के लिए भी.

हाफ़ टिकट की कैटेगरी में शॉर्ट फ़िल्म के लिए गोल्डन गेटवे अवॉर्ड मैरिबेथ रॉमसलो और क्रिस्टिना पिप्पा की फ़िल्म अमिलिया को दिया गया. इस श्रेणी में बेस्ट फ़ीचर का अवॉर्ड प्रिया रमासुब्बाना की लद्दाखी फ़िल्म ‘चुस्कित’ को मिला.

इस साल जेंडर इक्वेलिटी (और मीटू आंदोलन) मामी के गलियारों में बार-बार सुनने को मिला है. ऑक्सफैम के साथ मिलकर इस साल जेंडर पर बनी कुछ फ़िल्मों को पुरस्कृत किया गया. इन फ़िल्मों में वसंत एस साई की ‘शिवरंजनी एंड टू अदर मैन’ और आदित्य विक्रम सेनगुप्ता की ‘जोनाकी’ (स्पेशल ज्यूरी) और इवान आयर की फ़िल्म ‘सोनी’ (बेस्ट फ़िल्म ऑन जेंडर इक्वेलिटी) शामिल है. दिल्ली की दो महिला पुलिसकर्मियों की ज़िन्दगी को केन्द्र में रखकर बनी फ़िल्म ‘सोनी’ उनके जेंडर की वजह से, और जेंडर से परे, ड्यूटी के रास्ते में आने-वाले उतार-चढ़ाव को बख़ूबी पकड़ती है. इस फिल्म से जुड़ी एक खास बात यह भी है कि इवान आयर की यह पहली फ़िल्म है.

हर बार की तरह इस साल भी यहां कुछ बेहतरीन शॉर्ट फ़िल्में स्क्रीन हुईं. रॉयल स्टैग लार्ज शॉर्ट फ़िल्म्स का अवॉर्ड प्रणव भसीन के ‘न्यू ईयर्स ईव’ को गया. नए साल की पार्टी में जाने के लिए अपने लिए एक पार्टनर तलाशते एक लड़के की यह कहानी हंसाती भी है और परेशान भी करती है. मुंबई शहर किसी इंसान को किस हद तक तन्हा महसूस करा सकता है, इसके बारे में आख़िर कौन नहीं जानता!

यूं तो इस फ़िल्म फ़ेस्टवल में कई और देसी और विदेशी फ़िल्मों को अवॉर्ड मिला, लेकिन भारत की एक और फ़िल्म का ज़िक्र यहां ज़रूरी है. ग्रैंड ज्यूरी का गोल्ड अवॉर्ड कबीर सिंह चौधरी की फ़िल्म ‘मेहसमपुर’ को दिया गया. अमर सिंह चमकीला नाम के एक पंजाबी लोकगायक की ज़िंदगी पर आधारित यह फ़िल्म न डॉक्युमेन्ट्री है, न बायोपिक, और न फ़ीचर फ़िल्म ही है. लेकिन इन सारी विधाओं की संक्रांति से निकली यह विधा ये ज़रूर साबित करती है कि किसी के जीवन की कहानी कभी संपूर्ण सत्य या एब्सॉल्यूट ट्रूथ नहीं होती और जीवनियां भी दूसरों के माध्यमों से होते हुए फ़िक्शन हो जाया करती हैं. सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी सफल प्रयोगधर्मिता की वजह से यह फ़िल्म एक बार ज़रूर देखी जानी चाहिए.

इस बार सिनेमा पर लेखन के लिए मधु इरावंकरा को उनकी मलयालम किताब ‘100 वर्षम, 100 सिनेमाकल’ के लिए सम्मानित किया गया. सौ सालों के भारतीय सिनेमा पर लिखी गई इस अकादमिक किताब को एक बार देख लेना ही बहुत है. कम से कम हमें ये तो याद रहेगा कि सिनेमा सिर्फ़ बॉलीवुड नहीं है.

इस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में देखी गई तमाम सारी फ़िल्मों में मेरी पसंद की एक फ़िल्म थी ‘द एयरेसेस’. पराग्वे के निर्देशक मार्सेलो मार्टिनेसी की इस फ़िल्म को इंटरनेशनल कॉम्पटीशन कैटगरी में सिल्वर गेटवे अवॉर्ड दिया गया. जिस देश के सिनेमा का इतिहास एकदम नया-नया है, वहां की कोई एक फ़िल्म देश, समाज और भाषा के परे अगर दर्शकों को बांधती है तो यह न सिर्फ़ उस देश के फ़िल्मकारों के लिए उत्साह का सबब है, बल्कि दुनिया के उन तमाम फ़िल्मकारों के लिए उम्मीद की वजह है जो अपनी भाषा में, अपने तरीके के सिनेमा से अपनी ज़मीन की कहानियां कहना चाहते हैं.

अब इस फिल्म फेस्टिवल की उसी भावुक स्मृति पर लौटते हैं, जिसका जरा सा जिक्र हमने शुरू में किया था. रीमा दास ने अवॉर्ड स्वीकार करते समय अपनी मां के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा था, ‘मैं बेहद ख़ुशकिस्मत हूं कि मैं वही कर रही हूं जो मैं वाकई करना चाहती थी. मुझे इस बात की बेइंतहा ख़ुशी है कि सिनेमा मुझे मेरी दुनिया और मेरे किरदार रचने की आज़ादी देता है.’ इस साल भी मामी फ़िल्म फ़ेस्टिवल और कुछ नहीं बल्कि इसी आज़ादी का उत्सव था. आज़ादी के इसी स्वाद को चखने के लिए दुनियाभर में फ़िल्में बनाई जा रही हैं. दर्शक भी सिनेमा देखकर ख़ुद को डेढ़-दो घंटे के लिए ही सही, लेकिन मानसिक, भावात्मक और बौद्धिक रूप से आज़ादी ही तो देना चाहते हैं.