उत्तराखंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बड़े ड्रीम प्रोजेक्ट यानी चार धाम चार धाम ‘ऑल वेदर रोड’ का विवादों से पीछा छूट ही नहीं रहा. उत्तराखंड के चार धामों (बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री) के बीच लगभग 900 किलोमीटर लंबाई में 10 से 12 मीटर चौड़ाई वाली सड़क निर्माण की इस परियोजना का प्रधानमंत्री ने 27 दिसंबर 2016 को देहरादून में शिलान्यास किया था. इसे 2013 की केदारनाथ आपदा में मारे गये सैकड़ों तीर्थयात्रियों और स्थानीय नागरिकों के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि भी बताया गया. लेकिन यह चार धाम ‘ऑल वेदर रोड’ परियोजना जिस तरह जमीन पर उतारी जा रही है उससे तो लगता यही है कि यह परियोजना भविष्य में भी कई विनम्र श्रद्धांजलियों की नींव बनने वाली है.

लगभग 12 हजार करोड़ रुपए की लागत से बन रही इस परियोजना के कारण गंगा यमुना के उद्गम क्षेत्र में 50 हजार से ज्यादा पेड़ कटने हैं और हजारों टन मिट्टी, पत्थर और मलबा उत्तराखंड की नदियों की दुर्दशा करने वाला है. उधर, उत्तराखंड के मंत्री इसे विकास का पर्याय बताते हुए कहते हैं कि विकास की कुछ कीमत तो चुकानी ही पड़ती है.

लेकिन सरकार की जिद पर अब अदालत की रोक है. सुप्रीम कोर्ट का 22 अक्टूबर का निर्देश इस अति महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है. कोर्ट ने परियोजना को जारी रखने के राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के फैसले पर रोक लगा दी है. केंद्र और राज्य सरकार को इस बारे में 15 नवंबर तक अपना पक्ष रखना है और इसी दिन इस मामले की अगली सुनवाई होनी है. एनजीटी ने इस विवादित परियोजना को एक स्वतंत्र निगरानी समिति का गठन कर यह कहते हुए 26 सितंबर को सहमति दे दी थी कि योजना से जुड़ी सभी पर्यावरणीय चिंताओं को इस जिम्मेदार एवं स्वतंत्र निगरानी प्रणाली के जरिए खत्म किया जा सकता है.

लेकिन हकीकत में कुछ ऐसा हो नहीं पा रहा जिससे यह माना जा सके कि यह परियोजना पर्यावरण के प्रश्नों पर जरा भी संवेदनशील है. दरसल देश के अन्य पहाड़ी हिस्सों में बनने वाली परियोजनाओं की तुलना में उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों की स्थिति कितनी भिन्न है, इस बात का परियोजना की मूल संकल्पना में ध्यान ही नहीं रखा गया है. इस बात का ध्यान भी नहीं रखा गया है कि उत्तराखंड के जिन इलाकों में यह परियोजना बन रही है वे सभी भूकंप के लिहाज से बेहद खतरनाक माने जाते हैं. परियोजना के लिए उच्च हिमालयी क्षेत्र में जो बरसों पुराने हजारों पेड़ कट रहे हैं, उसकी भरपाई कैसे होगी इसका कोई विचार नहीं किया गया. विस्फोटों और सड़क चौड़ी करने के चलते निकले मलबे की मात्रा पर भी ध्यान नहीं रखा गया. इसलिए परियोजना की शुरुआत से अलग-अलग रूप में इसका विरोध होता रहा.

फाइल फोटो
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‘आॅल वेदर रोड’ पर विवाद नए नहीं हैं. शुरुआत में ही जिस तरह सड़क चौड़ा करने के काम में ग्रामीणों की जमीनों का अधिग्रहण किया गया उसने बहुत से लोगों के लिए अस्तित्व बचाने का संकट खड़ा कर दिया. परियोजना का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर खुशहाली लाने का था, लेकिन इसने लोगों के सामने सब कुछ खत्म हो जाने की स्थितियां पैदा कर दीं. इसके बाद पर्यावरण के प्रश्नों को लेकर मामला उठा और मार्च 2018 में ‘सिटिजन फाॅर ग्रीन दून’ की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानी एनजीटी ने परियोजना पर रोक लगा दी थी. याचिका में कहा गया था कि 2017 में शुरू इस परियोजना में अब तक 356 किलोमीटर सड़क चौड़ी करने के लिए 25,303 पेड़ बिना अनुमति के काट डाले गए हैं. यह भी आरोप लगाया गया था कि पर्यावरणीय मानकों और नियमों से बचने के लिए छोटे-छोटे टुकड़ों में सड़कों को चौड़ा किया जा रहा है क्योंकि 100 किलोमीटर या उससे बड़ी परियोजना के लिए वन विभाग की मंजूरी के साथ-साथ पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन और पर्यावरण मंजूरी की भी जरूरत होती है. इस तरह चोर दरवाजे से पेड़ काटे जाते रहे और सड़क चौड़ी करने से पैदा हुआ मलबा नदियों में फेंका जाता रहा.

इससे पहले उत्तराखंड हाई कोर्ट ने भी इस मलबे को सीधे गंगा और उसकी सहायक नदियों में गिराये जाने पर सख्त एतराज जताया था. इसने केंद्रीय पर्यावरण व वन मंत्रालय, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राजस्व विभाग को तीन सप्ताह में नदियों से 500 मीटर दूर नये मलबा डम्पिंग जोन बनाने का निर्देश देते हुए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी थी. लेकिन इस तरह की तमाम अदालती रोकों के बाद भी परियोजना के तौर-तरीके बदले नहीं गए और पहाड़ों को छलनी किया जाता रहा.

अनेक प्रकार की बाधाओं और अदालती रोक के प्रतिबंधों से जूझती इस पर्यावरण विरोधी महत्वाकांक्षी परियोजना को एनजीटी ने 26 सितंबर को एक तरह से हरी झंडी दे दी थी. ट्रिब्यूनल ने परियोजना पर सहमति देते हुए विवादित योजना के कार्यों की जमीनी निगरानी के लिए एक निगरानी समिति बनाने का आदेश दिया. नैनीताल हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश यूसी ध्यानी को अध्यक्षता में इस कमेटी में वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान, जीबी पंत इंस्टीट्यूट फॉर हिमालयन इनवायरमेंट और वन अनुसंधान संस्थान के प्रतिनिधियों के साथ केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के सचिव और स्थानीय जिलाधिकारी सदस्य बनाये गये थे. ट्रिब्यूनल ने मलबा डम्पिंग व्यवस्था को लेकर फिर से असंतोष जताते हुए इसके लिए भी नये निर्देश दिए थे.

हालांकि उत्तराखंड सरकार अब भी इस बात को मानने को तैयार नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने चार धाम ‘आॅल वेदर रोड’ पर कोई रोक लगाई है. उसका दावा है कि अदालत ने परियोजना के कार्यों पर नहीं बल्कि एनजीटी के आदेश पर रोक लगाई है. यानी उत्तराखंड शासन के मुताबिक परियोजना में सड़क की सोलिंग (बुनियाद सपाट करने का काम) और पेंटिंग के कार्याें को जारी रखा जा सकता है. उसके हिसाब से देखें तो बदलाव सिर्फ यही है कि सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने तक परियोजना क्षेत्र में कोई पेड़ नहीं काटा जा सकता. 15 नवंबर की सुनवाई के बाद इस परियोजना का भविष्य तय होगा, लेकिन जो प्रश्न इसने पैदा किए हैं वे अब तक अनुत्तरित ही हैं.

नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ डिजास्टर मैनेजमेंट ने इस परियोजना के बारे में कहा है कि इस तरह की सड़क परियोजनाओं ने उत्तराखंड के कमजोर पहाड़ों को और भी कमजोर कर दिया है. परियोजना के पर्यावरणीय पक्ष पर चिंता जाहिर करते हुए प्रसिद्ध पर्यावरण विज्ञानी डाॅ. रवि चोपड़ा कहते हैं, ‘विकास की अंधी दौड़ में अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए हम हिमालय की संवेदनशीलता, इसकी नाजुक बनावट और कच्ची उम्र को भी ध्यान में नहीं रख रहे. निर्माण कार्यों का तरीका और उनकी गुणवत्ता भी स्थानीय निवासियों का जीवन खतरनाक बनाती जा रही है.’

परियोजना के समर्थन में दो दलीलें मुख्य रूप से दी जा रही हैं. एक यह कि इसके कारण उत्तराखंड में चार धाम यात्रा और अन्य पर्यटक गतिविधियों में गुणात्मक बदलाव आएगा, स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी. दूसरा यह कि उत्तराखंड की सीमांत स्थिति के कारण इस सड़क परियोजना का सामरिक महत्व बहुत अधिक है.

लेकिन व्यवहार में इस सड़क के कारण सवा सौ से अधिक छोटे-बड़े गांवों का अस्तित्व संकट में आ गया है. सैकड़ों जल स्रोत बंद हो गए हैं. पहाड़ी इलाकों में जहां पहले एक या दो भूस्खलन जोन प्रति किलोमीटर होते थे वहां अब हर सौ मीटर पर एक नया भूस्खलन दिखाई देता है.

इसी तरह सामरिक महत्व वाले तर्क का भी हाल है, सीमा के निकटवर्ती तीर्थों तक ज्यादा चौड़ी सड़कों से जयादा जरूरी है सीमा के छोर तक छोटी सड़कों का निर्माण पूरा करना. उत्तराखंड की अनेक सीमा चौकियां ऐसी हैं जहां आज भी कई-कई दिन तक पैदल चल कर ही पहुंचा जा सकता है. उत्तराखंड में वर्षा का अनियमित चक्र पहले से ही मौजूद सड़कों के लिए बहुत बड़ी समस्या बनता जा रहा है. हर वर्ष बारिश के दिनों में सड़कें कई कई दिनों तक बंद रहती हैं. इसलिए उत्तराखंड की मौजूदा सड़कों को ही ‘आॅल वेदर’ बनाए रखना ज्यादा बेहतर विकल्प हो सकता था. लेकिन जब विकास का संबंध चुनावी राजनीति से जोड़ लिया जाए तो ऐसे ही सवालिया काम होते हैं.