तेलंगाना में सात दिसंबर को वोटिंग होगी. राज्य में 119 विधानसभा सीटें हैं. मुद्दों के लिहाज से देखें तो यह चुनाव मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ या मिजोरम विधानसभा चुनावों के मुकाबले अलग नजर आ रहा है. असल में यहां विपक्ष के पास कोई ऐसा बड़ा मुद्दा नहीं दिखता जिस पर वह मौजूदा मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव और उनकी पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) को प्रभावी ढंग से घेर सके और इसका चुनावी लाभ ले सके.

मोटे तौर पर देखें तो सत्ता पक्ष और विपक्ष को मिलाकर तीन मुद्दे दिखते हैं जिनके इर्द-गिर्द इस बार का तेलंगाना विधानसभा चुनाव होता दिख रहा है.

तेलंगाना के गठन का श्रेय

चंद्रशेखर राव, उनकी पार्टी टीआरएस और टीआरएस के नेता अब भी अपनी सभाओं में यह बताने से नहीं चूकते कि तेलंगाना को अलग राज्य का दर्जा उनकी कोशिशों से ही मिला. 2014 में भी टीआरएस ने इसे मुख्य मुद्दा बनाया था. इस बार भी ऐसा ही है. आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) इस बार तेलंगाना चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ रही है. टीआरएस की ओर से टीडीपी और चंद्रबाबू नायडू पर बार-बार यही कहकर निशाना साधा जा रहा है कि उन्होंने अलग तेलंगाना राज्य का विरोध किया था.

तेलंगाना गठन का श्रेय इस बार कांग्रेस भी लेने की कोशिश कर रही है. उसकी ओर से यह कहा जा रहा है कि मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली उसी की केंद्र सरकार ने तेलंगाना को अलग राज्य का दर्जा दिया. कांग्रेस की ओर से यह भी कहा जा रहा है कि तेलंगाना को अलग राज्य बनाने का सबसे अधिक श्रेय कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी को दिया जाना चाहिए. उसके मुताबिक सोनिया गांधी ने व्यक्तिगत स्तर पर इस मामले में दिलचस्पी लेकर तेलंगाना को अलग राज्य का दर्जा दिलाया था. कांग्रेस का यह भी कहना है कि जिन सपनों के साथ कांग्रेस की केंद्र सरकार ने तेलंगाना का गठन किया था, वे पूरे नहीं हुए और इस बार तेलंगाना के लोग उसे वोट दें ताकि राज्य का विकास किया जा सके.

सरकार की उपलब्धियां

चंद्रशेखर राव और उनकी पार्टी के नेताओं की ओर से अपनी सरकार के कार्यकाल की उपलब्धियों का बखान हर चुनावी सभा में किया जा रहा है. टीआरएस की ओर से सरकार के कामकाज को एक अहम चुनावी मुद्दा बनाया जा रहा है. पार्टी के शीर्ष नेता चंद्रशेखर राव समेत दूसरे नेता भी यह कहते नजर आ रहे हैं कि इस कार्यकाल में टीआरएस सरकार ने एक मजबूत तेलंगाना की नींव रखने का काम किया है और अगले कार्यकाल में राज्य को आगे बढ़ाने के काम में और गति लाई जाएगी.

मुख्य तौर पर टीआरएस के नेता यह कहते हुए दिख रहे हैं कि इस सरकार ने आर्थिक विकास के साथ सामाजिक विकास का संतुलन साधने का काम किया है. उनके मुताबिक एक तरफ तेलंगाना ईज आॅफ डूइंग बिजनेस और निवेश आकर्षित करने में आगे है तो दूसरी तरफ सरकार ने कृषि को मजबूती देने के लिए आर्थिक सहायता वाली रायतू बंधु योजना, सिंचाई योजना मिशन काकतिया और जमीन से संबंधित रिकाॅर्ड को दुरुस्त करने वाली योजना सफलतापूर्वक लागू करने का काम किया है. टीआरएस जमीनी स्तर तक चंद्रशेखर राव सरकार के कामकाज और इसके फायदों की जानकारी पहुंचाकर अपने पक्ष में वोट जुटाने की कोशिश में है.

परिवारवाद

तेलंगाना चुनाव में सक्रिय सारे विपक्षी दल परिवारवाद का मुद्दा भी उठा रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे को सबसे अधिक आक्रामक ढंग से उठा रही है. भाजपा नेता टीआरएस पर अक्सर यह आरोप लगाते दिखते हैं कि टीआरएस चंद्रशेखर राव की पारिवारिक पार्टी है. भाजपा यह कहती है कि चंद्रशेखर राव ने अपने बेटे केटी रामाराव और भतीजे हरीश राव को अपनी ही सरकार में कैबिनेट मंत्री बना रखा है जबकि उनकी बेटी के कविता निजामाबाद लोकसभा सीट से सांसद हैं. भाजपा इस आधार पर राष्ट्रवाद बनाम परिवारवाद का मुद्दा उठा रही है. पार्टी कह रही है कि वह राष्ट्रहित को प्राथमिकता देती है जबकि चंद्रशेखर राव की पार्टी परिवारवाद को वरीयता दे रही है और उसे प्रदेश के लोगों के हित के बजाए अपने राव परिवार के हितों की चिंता अधिक है.

यह मुद्दा कांग्रेस और टीडीपी भी उठा रहे हैं लेकिन उतने आक्रामक ढंग से नहीं. कम्युनिस्ट पार्टी और तेलंगाना जन समिति जैसी पार्टियां कांग्रेस और टीडीपी के मुकाबले परिवारवाद के मुद्दे पर कहीं ज्यादा आक्रामक हैं. हालांकि, परिवारवाद का मुद्दा आम मतदाताओं को कितना अपील करेगा, यह कहना मुश्किल है. क्योंकि उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूरब से लेकर पश्चिम तक पूरे देश में अधिकांश क्षेत्रीय दल परिवारवाद की बीमारी से पीड़ित हैं. इसके बावजूद वे लगातार चुनाव जीतते हैं और सत्ता में बने रहते हैं.

इस सबके बीच तेलंगाना चुनावों की स्थिति यह है कि कोई प्रभावी मुद्दा नहीं होने की वजह से चंद्रशेखर राव के सत्ता से बेदखल होने की संभावना सत्ता विरोधी माहौल और चुनावी अंकगणित पर निर्भर लगती है. क्योंकि विपक्ष को यह लगता है कि 2014 में जितने वोट मिले थे, उससे अधिक वोट कांग्रेस और तेलुगू देशम पार्टी को मिले थे और इस बार तो उनके साथ दूसरे दल भी हैं.