तेलंगाना विधानसभा चुनावों में मोटे तौर पर तीन मुद्दे सबसे प्रभावी दिखते हैं. इनमें पहला है तेलंगाना को अलग राज्य का दर्जा दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाने का श्रेय लेने की होड़. ये होड़ सत्ताधारी तेलंगाना राष्ट्र समिति और विपक्षी कांग्रेस के बीच दिख रही है. वहीं मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव और उनकी पार्टी टीआरएस अपनी सरकार की उपलब्धियों को भी मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश में दिखते हैं. दूसरी तरफ केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी टीआरएस के अंदर के परिवारवाद को भी एक चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश करती नजर आती है.

इन मुद्दों के बीच तेलंगाना के आम लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाले कुछ मुद्दे खो गए हैं. कहां तो इन मुद्दों को तेलंगाना विधानसभा चुनावों के केंद्र में होना चाहिए था लेकिन, तकरीबन हर दल के चुनाव प्रचार अभियान से ये मुद्दे गायब दिख रहे हैं.

भारी धनबल और शराब का इस्तेमाल

तेलंगाना में यह किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनावी मुद्दा नहीं है. यह मुद्दा है तो सिर्फ चुनाव आयोग के लिए. वैसे भी दक्षिण भारतीय राज्यों के चुनाव भारी धनबल के इस्तेमाल के लिए कुख्यात हैं. इस बार तेलंगाना में खास तौर पर ग्रामीण इलाकों से जमकर शराब बांटे जाने की खबरें भी आ रही हैं. चुनाव आयोग इस बार शुरुआत से ही पैसा बांटने और शराब बांटने के खिलाफ अभियान चलाए हुए है. इसके बावजूद किसी भी दल ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत चुनाव को नकारात्मक तौर पर प्रभावित कर रहे धनबल और शराब के इस्तेमाल को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया है.

तेलंगाना में चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के बाद से चार दिसंबर तक करीब 118 करोड़ रुपये के करीब की बेहिसाबी नकदी जब्त की गई है. दक्षिण भारतीय राज्यों में मतदाताओं को लुभाने के लिए सोना-चांदी भी बांटे जाते हैं. जब्त की इस रकम में सोना, चांदी और शराब की कीमत जोड़ दी जाए तो यह आंकड़ा कहीं ज्यादा हो सकता है. 2014 के चुनावों में 76 करोड़ रुपये नगद जब्त किए गए थे. यानी वह रिकार्ड टूट गया है. लेकिन हैरानी की बात है कि चुनावों में धनबल का इस कदर का प्रकोप होने के बावजूद यह तेलंगाना में चुनावी मुद्दा नहीं है.

शिक्षा की बुरी स्थिति

चंद्रशेखर राव और उनकी पार्टी टीआरएस किसानों के लिए किए गए अपने कार्यों को तो गिना रहे हैं लेकिन, सामाजिक विकास और मानव विकास के मोर्चे पर तेलंगाना की खराब स्थिति को ठीक करने के लिए न तो सत्ताधारी पक्ष कुछ बोल रहा है और न ही विपक्षी पार्टियां इसे चुनावी मुद्दा बनाते दिख रही हैं.

शिक्षा के मामले में तेलंगाना की स्थिति बहुत खराब है. 2011 की जनगणना के मुताबिक राज्य की साक्षरता दर 66.46 फीसदी है. पूरे भारत के राज्यों में साक्षरता के मामले में तेलंगाना 25वें स्थान पर है. यहां तक कि साक्षरता दर के मामले में तेलंगाना अपेक्षाकृत पिछड़ा माने जाने वाले मध्य प्रदेश और ओडिशा से भी पीछे है.

इसमें भी ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात यह है कि यहां पुरुष साक्षरता दर और महिला साक्षरता दर में अपेक्षाकृत अधिक फासला है. पुरुष साक्षरता दर जहां 74.95 फीसदी है. वहीं महिला साक्षरता दर 57.92 फीसदी है. इस तरह से देखें तो पुरुषों और महिलाओं की साक्षरता दर का फासला तकरीबन 17 फीसदी है जो अपेक्षाकृत पिछड़े माने जाने वाले कई राज्यों की तुलना में अधिक है. लेकिन यह कोई चुनावी मुद्दा न तो सत्ता पक्ष के लिए है और न ही विपक्ष इसे मुद्दा बनाकर चंद्रशेखर राव और उनकी सरकार को घेरने की प्रभावी कोशिश करते दिखता है.

हैदराबाद की छवि

भारत में उदारीकरण के दौर के बाद जो प्रमुख आर्थिक केंद्र विकसित हुए उनमें से हैदराबाद प्रमुख है. सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग ने यहां इस तरह से जड़ें जमाईं कि हैदराबाद का दूसरा नाम साइबराबाद भी प्रचलित हो गया. आंध्र प्रदेश से अलग होने के बाद हैदराबाद तेलंगाना के हिस्से में आया और सत्ताधारी टीआरएस की ओर से कुछ ऐसी घटनाएं हुईं जिससे हैदराबाद की छवि खराब हुई.

अलग राज्य के तौर पर तेलंगाना के अस्तित्व में आने के बाद शुरुआती दिनों में यहां बाहरी बनाम भीतरी का विवाद पैदा करने की कोशिश हुई और कुछ मौकों पर हिंसा भी भड़की. इसमें टीआरएस की ओर से कई बार ऐसी बयानबाजी हुई जिससे यह लगा कि चंद्रशेखर राव सरकार हैदराबाद को एक संकुचित दायरे में रखना चाहती है. जबकि हैदराबाद की पहचान देश के प्रमुख आर्थिक केंद्रों में होने लगी थी.

हैदराबाद को सिर्फ तेलंगाना के लोगों में सीमित करके देखने की कोशिश की वजह से हैदराबाद को लेकर निवेशकों का आत्मविश्वास थोड़ा गड़बड़ाया और इसका फायदा पड़ोसी आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने अमरावती और आंध्र प्रदेश के दूसरे केंद्रों में निवेश आकर्षित करके उठाया. जाहिर है कि इस प्रक्रिया में नुकसान तेलंगाना को हुआ लेकिन विपक्ष की ओर से इसे भी चुनावी मुद्दा नहीं बनाया जा रहा है.