इस पुस्तक की कहानी ‘उस तरफ’ का एक अंश :

‘क्या तुम जानते थे कि तुम मौत के मुंह में कूद रहे हो? वह कौन-सी भावना थी, जिसने तुम्हें इतना निर्भीक और साहसी बना दिया?

‘साहब वो जलकर मर जाते. वे जल रहे थे. क्या हम तमाशा देखते रहते? क्या तुम हमें जानवर समझते हों?...कोई मर रहा हो तो तुम तमाशा देखते रहोगे क्या? तुम लोग क्यों मुझे आसमान पर चढ़ा रहे हो? मैंने ऐसा क्या कर दिया. जो इन्सान को नहीं करना चाहिए? यह सम्मान मुझे दे रहे हो तो इसका मतलब है, तुम आदमी से उस व्यवहार की उम्मीद नहीं रखते, जो मैंने किया. क्योंकि मेरे व्यवहार को तुम असाधारण मान रहे हो. तुम लोग दया-माया-इंसानियत, सब भूल चुके हो. हमारे बच्चे मर रहे थे, हमने उन्हें बचा लिया तो तुम्हारे दिल में खलबली मच गई...हमें नहीं चाहिए ऐसे अमानुषों से कोई शोहरत, नहीं चाहिए. वैसे भी हम क्या करेंगे तुम्हारी बख्शी हुई इज्जत को? क्या काम आयेगी वह? तुमसे कह रहे हैं कि एक कुआं खुदवा दो सो तो होता नहीं, बड़े आये हैं इंटरव्यू लेने वाले!’


कहानी संग्रह : नन्हा क़ासिद

लेखक : स्वयं प्रकाश

प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान

कीमत : 200 रुपए


मामूलीपन लगभग हर जगह किसी न किसी रूप में उपस्थित होता है. आम से लेकर खास आदमी तक हर किसी के जीवन में बहुत-सी छोटी-छोटी, गैरजरूरी-सी दिखने वाली चीजें होती हैं. वह कोई आदत, शौक, इच्छा, मौका, घटना से लेकर सपने तक कुछ भी हो सकता है. जिंदगी के व्यापक फलक पर अक्सर ही उन छोटी और चिंदी-सी दिखने वाली चीजों की कोई अहमियत नहीं होती. लेकिन यह एक नजरिया होता है जो हर गैर जरूरी, छोटी और बहुत आम-सी चीज को बेहद खास बना देता है. जाहिर है, बेहद साधारण को खास दिखाने के लिए असाधारण सोच, नजर, नजरिए और अभिव्यक्ति की जरूरत होती है. इन कहानियों में पाठकों का राबता कुछ वैसी ही असाधारण नजर से होता है. यह संग्रह बहुत मामूली लोगों की, मामूली चीजों, मामूली सपनों और मामूली इच्छाओं की बहुत ‘गैर मामूली’ कहानियां परोसकर से हमें चमत्कृत करता है.

हमारे देश के कुछ इलाकों के लिए बाढ़ मानसून से जुड़ी एक स्थाई परिघटना बन चुकी है. यह शर्मनाक है कि आजादी के 70 सालों बाद आज भी कुछ क्षेत्र बाढ़ की विभीषिका को साल-दर-साल झेलने को अभिशप्त हैं. यहां रहने वाले लोगों के लिए बाढ़ कोई अनिश्चित प्राकृतिक आपदा न होकर, हर साल आने वाला एक अपशगुन हो गया है, और बाढ़ राहत सामग्री एक रस्म! टीवी के स्क्रीन पर भयंकर से भयंकर बाढ़ के दृश्य भी अब हमें व्यथित नहीं करते. स्वयं प्रकाश की कहानी ‘सूरज कब निकलेगा’ बाढ़ में फंसे एक बेहद गरीब परिवार की बहुत ही मार्मिक कहानी है. बाढ़ के कई दृश्यों की अपेक्षा यह कहानी भीतर तक ज्यादा द्रवित करती है. कैसे रात में बाढ़ के बढ़ते पानी के कारण चार लोगों वाला एक परिवार एक पेड़ पर शरण लेता है और अंत में वह पेड़ भी गिर जाता है. उसी मौके का विवरण देते हुए लेखक लिखता है –

‘पेड़ हिला, पेड़ कांपा, पेड़ की जड़ें उखड़ीं-टूटीं-और पेड़ गिर गया. भैराराम और सुगनी ने ज़िन्दगी में कभी इतनी सख्ती से कुछ नहीं पकड़ा होगा, जितनी सख्ती से इस समय एक हाथ से पेड़ की डाल और दूसरे से बच्चों को छाती से चिपटाकर उन्होंने पकड़ा-भींचा, गड़ गए-एक हो गए, और उन्हें आश्चर्य हुआ कि पेड़ के पानी में गिर पड़ने के बाद भी वे चारों सलामत थे-जिन्दा थे. क्योंकि पेड़ जमीन पर नहीं, गाड़े पर गिरा था, जो पानी में डूब गया था पर बहा नहीं था. अब वे पानी की सतह पर लटके हुए, बच्चों को थामे हुए...जिन्दा थे...और यह ज़िन्दगी मौत से भी बदतर थी...मौत का भी कलेजा दहला देने वाली थी...इसके बाद वे दोनों निरन्तर भगवान को गालियां बकते रहे और उससे अपने और अपने बच्चों के लिए मौत मांगते रहे.’

तृतीय या चतुर्थ श्रेणी के कुछ कर्मचारी अक्सर ही ऑफिसों में जिस रौब के साथ रहते हैं, उससे हममें से लगभग हर किसी का पाला पड़ा है. स्वयं प्रकाश बहुत ही व्यंग्यात्मक तरीके से टेलीफोन विभाग के एक तृतीय श्रेणी के कर्मचारी के विदाई समारोह का आखों-देखा हाल सुनाते हैं. विदाई समारोह, वहां बोलने वाले व्यक्तियों, उनकी बातों और सुनने वाले लोगों का इतनी चुटीला वर्णन लेखक करता है कि हंसी-मुस्कुराहट के साथ पाठक भीतर तक आनंदित हुए बिना नहीं रहेंगे. ‘विदाई समारोह’ नामक कहानी में तृतीय श्रेणी के कर्मचारी के सम्मान में लेखक द्वारा किए गए बखान का एक हिस्सा –

‘छोटा अफ़सर दरअसल कोई अफ़सर नहीं था. वह औरों की ही तरह एक तृतीय श्रेणी का कर्मचारी था और उसका दफ्तर भी यहीं नीचे था. लेकिन उसे जंचा दिया गया था कि वह अफ़सर है. इसलिए उसमें अफ़सरों से भी ज्यादा अफ़सरी घुसी हुई थी. वह अफ़सरों और कर्मचारियों के बीच की कड़ी हो गया था. और वह बिचौलिएपन को बड़ी मुस्तैदी से निभा रहा था. चापलूसी, चुगलखोरी और चतुराई का उसे लम्बा तजुर्बा था. नीचे वालों से कैसे काम लेना, उन्हें कैसे दबाकर रखना, उनसे पैसे कैसे खाना, उनमें से एक हिस्सा बड़े अफ़सर तक कैसे पहुंचाना, यह सब उसे लम्बा तजुर्बा था...जरूरत पड़ने पर वह किसी के भी सामने निस्संकोच होकर घिघिया सकता था. बड़ा अफ़सर उससे तू-तड़ाक से बात करता था. इससे वह बहुत खुश होता था. कभी-कभी बड़ा अफ़सर उसे एकदम गाली भी दे देता था इसे भी वो अपना अहोभाग्य समझता था. उसके और बड़े अफ़सर के संबंधों का अन्दाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि स्टाफ वालों ने उसका नाम ‘बहूरानी’ रख रखा था.’

बच्चों से लेकर गांव-शहर के हर आम-ओ-खास की सोच पर स्वयं प्रकाश की बेहद बारीक पकड़ है. वे संवेदनहीनता में सने लोगों की कानखिंचाई करने का एक भी मौका नहीं छोड़ते, फिर चाहे वह किसी भी पद पर क्यों न हो. लेकिन वह खिंचाई एक मजेदार चुटकी की शक्ल में इस किताब में हर जगह है, जो हमेशा एक स्वस्थ हास्य पैदा करके अपने पाठकों को तृप्त करती चलती है. राजस्थान के किसी गांव में एक पत्रकार द्वारा किसी वीरता पुरस्कार वाले की खोज में जाने का वर्णन करते हुए लेखक लिखता है –

‘शहरी आता है यानी नयी मुसीबत आती है. कभी थानेदार, कभी पटवारी, कभी हाकिम, कभी सुईवाला, कभी बच्चे रोकने वाली लुगाई. सब मुसीबत...भले आदमी ने एक दिशा में मुंह उठाकर बड़ी सुरीली जनानी-सी आवाज़ बनाकर एक लम्बी पुकार मारी-ओ नख्त्याउ....ऊ...ऊ... उसकी ‘ऊ’ इतनी पतली और लंबी थी जैसे कोई नई बहू ग़मी में रोने का अभ्यास कर रही हो. चटर्जी को लगा कि भले आदमी की इस लंबी पुकार में से ‘ओ नख्त्या’ तो छूटकर यहीं गिर गया है और दूर तक जो गया वह सिर्फ़ ‘ऊ...ऊ’ ... है जिसका कोई भी कैसा भी मतलब निकाल लेगा! कुछ पल सन्नाटा रहा. फिर उसी दिशा से ऐसी ही एक ‘ऊ...ऊ..’ आयी जिसका अनुवाद भले आदमी ने यों किया कि नख्त्या कह रहा है कि थोड़ी देर रुको, अभी आ रहा हूं. गांव की इस अबूझ, पर कारगर दूर-संचार प्रणाली से चटर्जी बहुत प्रभावित हुआ.’

इस कहानी संग्रह की लगभग सभी कहानियां पाठकों को बहुत आनंदित करती हैं. कहानियों का बेहद मार्मिक वर्णन कहीं-कहीं थर्राहट भी पैदा करता है. इन कहानियों के पात्र, उनके सपने, घटनाएं, इच्छाएं, मुश्किलें सभी कुछ अतिसाधारण हैं. लेकिन स्वयं प्रकाश ने जिस बारीकी से उन पर काम किया है, वह उन कहानियों को असाधारण बना देता है. ये कहानियां प्रेम, साथ, सहयोग, संवेदना, इंसानियत जैसे मूल्यों की पुरजोर वकालत करती हैं. ज्यादातर कहानियां किसी न किसी मोड़ पर एक जानदार व्यंग्य में तब्दील हो जाती हैं, जो जितना गुदगुदाता है उतनी ही चोट भी करता है. कुल मिलाकर यह संग्रह बहुत साधारण लोगों के संघर्ष, सपनों और जीवन स्थितियों को अपनी कहानियों में बहुत सम्मानजनक स्थान देता है. विषय की विविधता और आम के प्रति खास नजरिया इन कहानियों की जान है, जिससे पाठक प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे.