अयप्पा प्रभु, यह बताइए क्या सच में हमारे प्रवेश से आपका मंदिर अशुद्ध हो जाएगा?

जब आजकल के नेताओं के प्रवेश से लोकतंत्र का मंदिर गंदा नहीं हुआ तो फिर किसी महिला के प्रवेश से भला मेरा मंदिर गंदा या अशुद्ध कैसे हो जाएगा!

अच्छा यह बताइए, ज्यादा ताकतवर कौन है? आप या आपके भक्त?

मेरे भक्त! क्योंकि मैं सारा जोर लगाकर भी तुम्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करा सकता, लेकिन भक्त जब मर्जी ये काम कर सकते हैं! इसीलिए कह रहा हूं मेरे चक्कर में मत पड़ो...ये कलयुग है कलयुग, इसमें मुझसे ज्यादा ताकतवर मेरे भक्त हैं!

पर मेरे मन में तो आपकी सच्ची भक्ति है प्रभु, फिर मैं आपके दर्शन क्यों नहीं कर पा रही?

पहली बात तो ये समझो कि आजकल ताकत भक्ति में नहीं ‘भक्तों’ में है! सो भक्ति मत करो सिर्फ ‘भक्त’ बनो. दूसरी पते की बात ये है कि मेरे भक्त मुझसे ज्यादा ताकतवर हैं लेकिन उनसे भी ज्यादा ताकतवर ‘मोदी भक्त’ हैं! सो भक्ति छोड़ो, भक्त बनो और वो भी मेरे नहीं मोदी जी के.

लेकिन भगवन मोदी भक्त बनने से तो आपके मंदिर में प्रवेश नहीं मिल सकता. उनकी पार्टी तो खुद ही महिलाओं के मंदिर प्रवेश की विरोधी है. फिर मोदी भक्त बनने का भला क्या फायदा?

मंदिर प्रवेश की रट में क्या रखा है पगली! सच ये है कि मेरी भक्ति से तुम्हें कोई कमाई नहीं होने वाली. पर रोजमर्रा की जिंदगी में मोदी भक्ति के बहुत फायदे हैं. जैसे उनकी भक्त बनते ही तुम्हें डीजल-पेट्रोल का तेल महंगा महसूस होना बंद हो जाएगा, क्योंकि तुम उसमें भी कोई सकारात्मकता निकाल ही लोगी. मोदी भक्ति का सबसे बड़ा फायदा ये है कि तुम स्थाई रूप से महंगाई के तनाव से मुक्त हो जाओगी. रुपए की गिरती कीमत के बावजूद तुम हमेशा फील गुड करोगी. अपनी हर परेशानी तब तुम्हें देशहित का काम लगेगी. कुल मिलाकर मोदी भक्त बनते ही तुम्हारे भीतर सरकार और अच्छे दिनों को लेकर पल रही नकारात्मकता एक झटके में खत्म हो जाएगी. फिर तुम बिल्कुल हाइब्रिड किस्म के तर्कों की फसल काटोगी और हर समय बेहद प्रसन्नचित्त रहोगी.

अच्छा यह बताइए कि महिलाओं के मंदिर प्रवेश को लेकर आपका क्या सोचना है?

ये लिंगभेद और मनमानापन तो मनुष्यों का ट्रेडमार्क है, ईश्वर का नहीं. मुझे तो ऊर्जा के अनंत स्रोत से भरी महिलाओं का सानिध्य अच्छा ही लगेगा. पर भक्तों की जिद के आगे मैं भी विवश हूं. इस मामले में मुझे शिवजी से खासी चिढ़ है!

लेकिन आपके भक्तों का तो कहना है कि हमारे मंदिर प्रवेश से आपका ब्रह्मचर्य भंग हो जाएगा. इस बात में कितनी सच्चाई है?

अपने ब्रह्मचर्य के भंग होने की बात सुनकर तो मुझे लगता है कि वे लोग मुझे भगवान नहीं बल्कि कोई कामी और लंपट पुरुष समझते हैं! (गुस्से से) मेरा ख्याल है कि मेरे ब्रह्मचर्य की आड़ में, असल में वे अपने स्खलन के प्रति चिंतित हैं!

मंदिर प्रवेश के मामले में केरल के मुख्यमंत्री की स्थिति मुझे कुछ समझ नहीं आ रही. आपको क्या लगता है भगवन, वे हम महिलाओं का सबरीमला मंदिर में प्रवेश चाहते भी हैं या नहीं?

(मुस्कुराते हुए) महिलाओं का मंदिर प्रवेश मुख्यमंत्री के लिए ऐसी हड्डी बन गया है जिसे न वे चबाने के मजे ले पा रहे हैं और जो थूकी भी नहीं जा सकती...उनके लिए समबरीमला मंदिर बंगाल का सिंगूर बन चुका है. अब महिलाओं का मंदिर प्रवेश हो या न हो, वे खुद को केरल का बुद्धदेव भट्टचार्य बनने से बचाना चाहते हैं!

यह बताइए अयप्पा स्वामी, हम कभी आपके दर्शन के लिए मंदिर प्रवेश कर सकेंगी या नहीं?

ये तो अयोध्या में राम मंदिर निर्माण जैसा जटिल प्रश्न है.

आपके लिए भला क्या जटिल है प्रभु?

असल में जो इंसानों के लिए जटिल है, वह मेरे लिए आसान है. लेकिन जो इंसानों के लिए आसान है, वह मेरे लिए बड़ा जटिल है.

भला ऐसे कैसे?

ऐसा इसलिए क्योंकि जो चीजें इंसानों के लिए आसान हो जाती हैं, उसका वे ऐसा रायता फैलाते हैं कि उसे समेटने में मुझे भी अपनी नानी याद आ जाती है. पर जो चीजें इंसानों को मुश्किल लगती हैं, उसे करने में उन्हें नानी याद आती है इसलिए वहां वे ज्यादा रायता नहीं फैला पाते... (मुस्कुराते हुए) आप लोगों के मामले में भी आजकल सभी ने मिलकर बहुत सारा रायता फैलाया हुआ है.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का कहना है कि अदालत को ऐसे आदेश नहीं देने चाहिए जो लोगों की आस्था को तोड़ने का काम करें. इस बारे में आपका क्या सोचना है प्रभु?

इतने टूटेबल दौर में भला कोई तोड़ा-फोड़ी की शिकायत कैसे कर सकता है! यह दौर ही ‘तोड़ने’ और ‘टूटने’ का है. किसी ने मूर्तियां तोड़ी, कोई भरोसा तोड़ रहा है तो कोई वादे. बहुत से हैं जो सार्वजनिक संपत्ति तोड़ने में ही आनंदित होते रहते हैं. जिनको निर्जीव चीजों को तोड़ने से संतुष्टि नहीं, वे इंसानों को ही तोड़ने में लगे हैं. कहने का अर्थ ये है कि इस देश में आम आदमी से लेकर सरकार तक हर कोई तोड़ा-फोड़ी में अपना बहुमूल्य योगदान दे रहा है... और जिसने अभी तक ये सुख नहीं लिया, वह भी कुछ न कुछ तोड़ने की फिराक में है! मैं अमित शाह से पूछना चाहता हूं कि क्या तोड़ा-फोड़ी का सारा सुख सरकार और उसके भक्तों के हिस्से में ही आएगा?

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी कहती हैं कि जब हम दोस्तों के घर खून से भरे पैड्स लेकर नहीं जाते तो फिर आपके पास क्यों जाएं. आप ही बताओ प्रभु ऐसे-ऐसे बयानों का क्या जवाब दिया जाए?

महिलाओं के मंदिर प्रवेश से तो नहीं, लेकिन उनकी ऐसी ‘शौच जैसी सोच’ से जरूर मैं अपवित्र हो रहा हूं! ऐसे कुतर्कों के आगे तो मैं अयप्पा स्वामी भी अक्सर ही निरुत्तर हो जाता हूं, तो फिर भला तुम क्या जवाब दोगी!

बस एक आखरी सवाल प्रभु. आजकल चल रहे ‘मी टू’ अभियान के बारे में आप क्या कहेंगे?

मैं अपने कई भक्तों और गैरभक्तों के लिए कहूंगा - ‘ही टू’! इसके बाद हो सकता है मेरे कुछ भक्त मेरे ही खिलाफ आंदोलन शुरू कर दें. क्योंकि आजकल सच सुनकर हर तरह के भक्त बिल्कुल एक ही तरह से बौखलाते हैं!