केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और आरबीआई (भारतीय रिज़र्व बैंक) के गवर्नर उर्जित पटेल के बीच तक़रार दिनों-दिन गंभीर होती जा रही है. सूत्र बताते हैं कि आरबीआई अधिनियम-1934 की धारा-7 का इस्तेमाल भी मोदी सरकार ने इसी वज़ह से किया है. इस धारा के लागू हाेने पर आरबीआई सरकार के फैसले पर मानने पर मज़बूर हो जाता है. ख़बरों की मानें तो मोदी सरकार ऐसा इसलिए भी कर सकती है क्योंकि उसके पास देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से जुड़ा एक ऐसा ही संदर्भ भी है.

द टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक मोदी सरकार के काम आने वाला पंडित जवाहरलाल नेहरू से जुड़ा संदर्भ 1957 का है. उस समय सर बेनेगल रामा राव आरबीआई के गवर्नर हुआ करते थे. बताते हैं कि उस समय भी नेहरू सरकार और रामा राव के बीच कई अहम नीतियों पर टकराव की स्थिति बन गई थी. तब पंडित नेहरू ने आरबीआई को पत्र लिखकर हिदायत दी थी. इसमें उन्होंने साफ कहा था, ‘नीतियां तय करना सरकार का काम है. आरबीआई ऐसी नीतियां लागू नहीं कर सकता जो सरकार के उलट जाती हों. मौद्रिक नीति भी सरकार की वृहद् नीतियों पर निर्भर होनी चाहिए. आरबीआई इन्हें चुनौती नहीं दे सकता.’

बताया जाता है कि नेहरू सरकार की ओर से मिली इस स्पष्ट हिदायत के बाद रामा राव ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. उस समय केंद्रीय वित्त मंत्री टीटी कृष्णमाचारी हुआ करते थे. उनकी कुछ अहम नीतियों पर आरबीआई से सीधा टकराव चल रहा था. तब पंडित नेहरू ने अपने वित्त मंत्री का समर्थन किया था. सूत्रों के मुताबिक क़रीब-क़रीब यही स्थिति अब मोदी सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली और आरबीआई के मौज़ूदा गवर्नर उर्जित पटेल के मामले में भी बनी है. ऐसे में सरकार नेहरू सरकार के संदर्भ को अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सकती है. ख़ास तौर पर आरबीआई अधिनियम की धारा-7 के इस्तेमाल के मामले में.

द इकॉनॉमिक टाइम्स ने सूत्रों के हवाले से वे स्थितियां बताई हैं जिनकी वज़ह से मोदी सरकार आरबीआई अधिनियम की धारा-7 का इस्तेमाल करने पर मज़बूर है. अख़बार को एक सूत्र ने बताया है, ‘हम बीते एक साल से भी अधिक समय से आरबीआई से तमाम मसलों पर बातचीत कर रहे थे. आरबीआई इनमें चार-पांच प्रस्तावों को स्वीकार कर सकता था. बाकियों को चाहता तो मना कर देता. लेकिन उसने एक भी प्रस्ताव पर अपना सकारात्मक रुख़ नहीं दिखाया. यहां तक कि हमारे प्रस्तावों को आरबीआई बोर्ड में विचार तक के लिए नहीं रखा गया. ऐसे में सरकार के सामने कोई और रास्ता (धारा-7 लागू करने के अलावा) ही कहां था.’