25 अक्टूबर 1917 को 20वीं सदी का एक युगप्रवर्तक दिन कहा जा सकता है. उस दिन रूसी युद्धपोत ‘औउरोरा’ द्वारा पेत्रोग्राद (अब सेंट पीटर्सबर्ग) के शीत प्रासाद (विंटर पैलेस) पर गोले दागने के साथ मानव इतिहास की पहली समाजवादी क्रांति का बिगुल बजा था. क्रांति के नेता थे व्लादिमीर इल्यिच लेनिन.

अगले ही दिन नेवा नदी के तट पर बने इस आलीशान राजमहल पर क्रांतिकारियों ने क़ब्ज़ा कर लिया. रूस में सदियों से चल रही ज़ार (सम्राट) शाही का रक्तरंजित सूर्यास्त हो गया. दो सप्ताह बाद यानी सात नवंबर 1917 के दिन उसकी जगह ली मज़दूर-किसान वर्ग की तानाशाही कहलाने वाली मार्क्सवादी विचारधारा की कम्युनिस्ट शासन प्रणाली ने. लेकिन उसका सूर्य सात दशकों में ही डूब गया, भले ही दुनिया भर के वामपंथी मार्क्सवाद के मोह से अपने आप को अब भी मुक्त नहीं कर पा रहे हैं!

क्रांति या भ्रांति

महान समाजवादी अक्टूबर क्रांति’ कहलाने वाली उस भ्रांति के नेता लेनिन 21 जनवरी 1924 को 53 साल की उम्र में चल बसे. इसके साथ ही उनके संभावित उत्तराधिकारियों योसेफ़ स्टालिन और लेओ त्रोत्स्की के बीच उत्तराधिकार के लिए शक्तिपरीक्षण शुरू हो गया. दोनों समवयस्क (45-46 साल के) थे. लेनिन ने कोई उत्तराधिकारी नहीं चुना था, हालांकि उनका झुकाव त्रोत्स्की की तरफ़ ही अधिक था. स्टालिन जॉर्जिया के बहुत ही साधारण परिवार से था, जबकि त्रोत्स्की यूक्रेन के एक धनी यहूदी किसान परिवार से था.

लेनिन का देहांत होने तक सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी पर स्टालिन की पकड़ एक जकड़ में बदल चुकी थी. मार्च 1922 से वही पार्टी का महासचिव भी था. शक्तिपरीक्षण में अंततः स्टालिन का ही पलड़ा भारी रहा. अपनी जान बचाने के लिए लेओ त्रोत्स्की को 1929 में देश छोड़ कर भागना पड़ा. स्टालिन के आदेश पर ही 1940 में एक रूसी एजेंट ने अंततः मेक्सिको में त्रोत्स्की की हत्या कर दी. रूसी इतिहासकार ओल्गा त्रिफ़ोनोवा के मुताबिक स्टालिन लेनिन या त्रोत्स्की जैसे करिश्माई व्यक्तित्व वाला नहीं था. वह हृदयहीन, शांत किंतु भितरघाती स्वभाव का था.

यथा नाम, तथा गुण

स्टालिन भूतपूर्व सेवियत संघ वाले जॉर्जिया गणराज्य के एक मोची का बेटा था. उसका जन्म 18 दिसंबर 1878 को हुआ था. सारे भाई-बहन जन्म के कुछ ही महीनों के भीतर मर चुके थे. मां-बाप की वही एकमात्र जीवित संतान था. उसका असली नाम योसिफ़ विसारियोनोविच जुग़ाश्विली था. लेकिन 1912 से वह अपने आप को योसेफ़ स्टालिन (इस्पाती) कहने लगा था. यथा नाम, तथा गुण. उसका हृदय इस्पात की ही तरह निर्मम और कठोर था. न्याय, दया या संवेदना के लिए उसके मन में तिल भर भी जगह नहीं थी. सभी – उसके अपने बीवी-बच्चे भी – उसके आगे थर-थर कांपते थे.

स्टालिन की पहली पत्नी की, 11 साल के वैवाहिक जीवन के बाद, 1907 में मृत्यु हो गयी थी. कुछ स्रोतों के अनुसार उसे सूख कर कंकाल-जैसा बना देने वाला सुखंडी रोग (रिकेट्स) हो गया था. कुछ अन्य स्रोतों का कहना है कि उसे तंद्रिक ज्वर (टाइफस फ़ीवर) हो गया था. ये दोनों बीमारियां जूं या पिस्सू में रहने वाले ख़ास क़िस्म के बैक्टीरिया के संक्रमण से होती हैं. अपनी पहली पत्नी से स्टालिन का एक बेटा था - याकोव जुग़ाश्विली.

41 साल की उम्र में 16 साल की पत्नी

1919 में स्टालिन ने दोबारा शादी की. दूसरी पत्नी नदेज़्दा अलिलुयेवा अक्टूबर क्रांति के नेता लेनिन की और विवाह से कुछ पहले स्टालिन की भी सेक्रेट्री (टाइपिस्ट) हुआ करती थी. विवाह के समय नदेज़्दा की उम्र सिर्फ 16 साल और स्टालिन की 41 साल थी. विवाह के कुछ समय बाद ही स्टालिन की इच्छानुसार विवाह के दोनों साक्षियों पर झूठे आरोप लगाकर उन्हें गोली से उड़ा दिया गया. उनमें से एक स्टालिन की ही तरह जॉर्जिया का निवासी और उसकी पहली पत्नी का रिश्तेदार था. दूसरा स्टालिन की नयी पत्नी नदेज़्दा का संरक्षक और मुंहबोला चाचा था.

रूस की इतिहासकार ओल्गा त्रिफ़ोनोवा का कहना है कि स्टालिन की दूसरी पत्नी नदेज़्दा ने लेनिन के साथ काम किया था. इससे स्टालिन को पार्टी और नई सरकार की बहुत-सी ऐसी भीतरी बातों का पता चला, जिनका लाभ उठा कर, 1924 में लेनिन की मृत्यु के बाद, उसे अपने प्रतिद्वंदियों को पछाड़ने और सारी सत्ता हथियाने में आसानी हुई.

स्वेतलाना का भारतीय जीवनसंगी

त्रिफ़ोनोवा के अनुसार स्टालिन अपनी दूसरी पत्नी नदेज़्दा से आरंभ में बहुत प्यार करता था. उस पर विश्वास करता था और उससे परामर्श भी लिया करता था. 1921 में दोनों के साझे बेटे वसीली का, और पांच साल बाद साझी बेटी स्वेतलाना का जन्म हुआ. यह वही स्वेतलाना थी जो इंदिरा गांधी के समय भारत के विदेशमंत्री रहे दिनेश सिंह के चाचा कुंवर ब्रजेश सिंह की तीन वर्षों तक जीवनसंगिनी रही. कुंवर ब्रजेश सिंह इलाहाबाद के पास स्थित कालाकांकर रियासत के राजपरिवार से थे और एक जाने-माने कम्युनिस्ट भी थे.

ब्रजेश सिंह फेफड़ों की एक प्राणघातक बीमारी से पीड़ित थे. अक्टूबर 1966 में रूस में ही उनकी मृत्यु हो गयी. उनकी अस्थियों को गंगा में विसर्जित करने के लिए स्वेतलाना, दिसंबर 1966 में, भारत पहुंची. मार्च 1967 में वह भारत से ही एक दिन अचानक ग़ायब हो गयी और अमेरिका पहुंच गयी. इस रोचक-रोमांचाक कहानी की चर्चा बाद में कभी. फ़िलहाल हम देखते हैं कि स्टालिन ने, 1924 में लेनिन की मृत्यु के बाद और 1953 में अपनी मृत्यु होने तक, कैसे-कैसे न केवल अपने आस-पास के लोगों का बल्कि खुद अपने परिवार का भी सफ़ाया कर दिया.

सोवियत नेता पड़ोसी बने

कम्युनिस्टों द्वारा 1917 में सत्ता हथियाने के बाद, 22 दिसंबर 1922 को रूस, ट्रांसकॉकेशिया के कई जनतंत्रों, यूक्रेन और बेलारूस को मिला कर ‘सोवियत समाजवादी गणतंत्र संघ’ नाम से सोवियत संघ बना. बाद में मध्य एशिया के कई देश भी इस संघराज्य में शामिल हो गए. स्टालिन सहित रूसी क्रांति के सभी नेता संघ की राजधानी मॉस्को के मध्य में स्थित ‘क्रेमलिन’ कहलाने वाले पुराने नगर-दुर्ग के भीतर एक-दूसरे के पड़ोसी बन कर रहते थे. स्टालिन की दूसरी पत्नी नदेज़्दा को लगने लगा कि उसे स्टालिन की केवल पत्नी-भर ही नहीं रह जाना चाहिये. स्वयं भी कुछ बनना चाहिये. वह ख़ास पढ़ी-लिखी नहीं थी. इसलिए बेटी स्वेतलाना के जन्म के बाद उसने विश्वविद्यालय जाना शुरू कर दिया.

इतिहासकार ओल्गा त्रिफ़ोनोवा के पिता नदेज़्दा के सहपाठी थे. अपने पिता से उन्होंने सुना था कि नदेज़्दा अपने आप को इस तरह रखती थी कि ‘अकादमी में कोई जानता तक नहीं था कि वह कौन है. वह अपनी कार कई मकान पहले ही कहीं पार्क कर दिया करती थी और बाक़ी रास्ता पैदल चल कर तय किया करती थी.’ त्रिफ़ोनोवा के पिता के लिए भी वह लंबे समय तक केवल ‘नदेज़्दा’ ही थी. बहुत सुंदर पुरुष उस पर फ़िदा थे.’ त्रिफ़ोनोवा के अनुसार नदेज़्दा सोवियत संघ में समाजवाद के निर्माण में अपना भी सक्रिय योगदान देना चाहती थी.

निकिता ख्रुश्चेव, जो 1953 में स्टालिन की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी और उसके पापों का कच्चा चिट्ठा खोलने वाले प्रखर आलोचक बने, विश्वविद्यालय में नदेज़्दा के सहपाठी और एक अच्छे मित्र हुआ करते थे. नदेज़्दा ने ही उनका परिचय स्टालिन से करवाया था.

नदेज़्दा की सादगी

इस मुलाकात के बारे में निकिता ख्रुश्चेव के पुत्र सेर्गेई ख्रुश्चोव ने एक टेलीविज़न इंटरव्यू में कहा था कि उनके पिता उस समय एक पार्टी-सचिव थे. उन्हें कहा गया था कि उन्हें नदेज़्दा पर नज़र रखनी है. सहपाठी होने के नाते नदेज़्दा सलाह-मशविरे के लिए उन के पास आया करती थी. पर, उन्होंने कभी मालूम नहीं पड़ने दिया कि वे स्टालिन की पत्नी हैं. सेर्गेई ख्रुश्चोव का कहना था, ‘मेरे पिता को स्टालिन से मिलने के लिए एक बार जब बुलाया गया तो वे यह देख कर सन्न रह गये कि नदेज़्दा तो स्टालिन की पत्नी है!’ 1935 में जन्मे सेर्गेई ख्रुश्चोव रॉकेट इंजीनियर हैं और 1991 से अमेरिका में बस गये हैं.

1927 से स्टालिन सोवियत संघ का एकछत्र निरंकुश शासक बन गया था. डंडे के बल पर वह पूरी निष्ठुरता से खेती-किसानी का सहकारीकरण करने लगा. इससे जो व्यापक उथल-पुथल मची, उससे फैली भुखमरी और असंतोष को दबाने के दमनचक्र ने दो करोड़ लोगों की जान ले ली. रूसी इतिहासकार रॉय मेद्वेदेव के 1989 में प्रकाशित एक लेख के अनुसार
तब भी अपना मुंह खोलने या कुछ भी कहने की हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा था. केवल कानाफूसी होती थी कि खेती चौपट हो रही है. लोग अनायास मर रहे हैं.

भुखमरी से मरते लोग

नदेज़्दा जब विश्वविद्यालय जाने लगी तो उसने कई बार देखा कि भूखे-प्यासे बच्चे सड़कों पर भीख मांग रहे हैं. लोग भुखमरी से मर रहे हैं, पर इस भुखमरी की कहीं कोई चर्चा नहीं है. जर्मनी की इतिहासकार मार्था शाड के अनुसार, नदेज़्दा ने जब एक बार स्टालिन से पूछा कि ऐसा क्यों है, तो ‘स्टालिन आपे से बाहर हो गया.’ उसे यह बिल्कुल पसन्द नहीं था कि उससे कोई कुछ पूछे. वह बस आदेश देने का आदी था, न कि आलोचना या प्रश्न सुनने का.

जिन लोगों ने 1920 वाले दशक के अंतिम वर्षों में नदेज़्दा को देखा था, उन्होंने इतिहासकार ओल्गा त्रिफ़ोनोवा को बताया कि वह बहुत दुखी और उदास लगती थी. अपनी शाल में लिपटी हुई गुमसुम और एकाकी प्रतीत होती थी. ऐसे भी प्रमाण हैं कि स्टालिन उसे ‘मारता-पीटता’ था. यानी, स्टालिन ने अपनी दूसरी पत्नी नदेज़्दा का भी सारा सुख-चैन छीन लिया था.

आठ नवंबर 1932 का दिन

इन्हीं परिस्थितियों में आठ नवंबर 1932 का दिन आया. उस दिन तत्कालीन सोवियत नेताओं ने बड़े धूमधाम से ‘महान समाजवादी अक्टूबर क्रांति’ की 15वीं वर्षगांठ मनाई. नदेज़्दा उस दिन शुरू से ही नेताओं के बीच होने के बदले श्रमिकों की एक टोली के साथ समारोह-स्थल पर पहुंची. वहां पहुंचने के बाद ही वे श्रमिकों से अलग हो कर स्टालिन के पास गईं. स्टालिन के साथ उसके बच्चे भी थे.

शाम को क्रेमलिन के भीतर नेताओं का अपना एक अलग जश्न था. वहां स्टालिन बहुत पिये हुए था. अपने आस-पास की महिलाओं के साथ वह ख़ूब इश्कबाज़ी कर रहा था. त्रिफ़ोनोवा का कहना है कि स्टालिन जम कर पी रहा था और नदेज़्दा चुपचाप बैठी सब देख रही थी. इससे वह बुरी तरह बौखला गया. वह नदेज़्दा पर मौसंबी के छिलके और ब्रेड के टुकड़े फेंकने लगा. बोला, ‘ओ, तू भी पी!’’ इसी दौरान फेंकी जा रही चीज़ों में से कुछ नदेज़्दा की आंख पर जा लगा. उसने इतना ही कहा, ‘मैं तुम्हारी कोई ‘ओ’ नहीं हूं.’ ऐसा कहते ही दोनों के बीच सबके सामने एक तल्ख़ तू- तू, मैं- मैं छिड़ गया.

जब स्टालिन की दूसरी पत्नी अंतिम बार जीवित दिखी

ओल्गा त्रिफ़ोनोवा का कहना है कि आठ नवंबर 1932 वाले ‘उसी दिन स्टालिन की दूसरी पत्नी नदेज़्दा को अंतिम बार जीवित देखा गया था. अगली सुबह घर की नौकरानी नाश्ता ले कर जब नदेज़्दा के कमरे में गई तो उसे फ़र्श पर पड़ा देखा. उसकी कनपटी के पास गोली लगी थी. इसके बाद बड़ी अजीब-अजीब बातें हुईं. कुछ लोगों ने कहा कि स्टालिन काफ़ी देर तक अपने कमरे से बाहर नहीं निकला. दोनों अलग-अलग कमरों में सोते थे. स्टालिन 10 बजे अपने कमरे से बाहर आया. वहां काफ़ी शोर मचा हुआ था. आपातकालीन (इमर्जेन्सी) डॉक्टर को बुलाया गया. और भी कई लोग आ गये. स्टालिन बार-बार यही कह रहा था कि रात में वह घर पर नहीं था.’

नदेज़्दा का शव कुछ समय के लिए क्रेमलिन में रखा गया. औपचारिक तौर पर प्रचारित किया गया कि उसकी मृत्यु अपेंडिक्स के सूज कर फट जाने से हुई है. ओल्गा त्रिफ़ोनोवा बताती हैं कि डॉक्टरों ने नदेज़्दा की शवपरीक्षा रिपोर्ट में यह लिखने और उस पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया कि उसकी मृत्यु अपेंडिक्स के फट जाने से हुई है. बाद में ‘इन सभी डॉक्टरों को गिरफ़्तार कर गोली से उड़ा दिया गया... नदेज़्दा को दफ़नाते समय स्टालिन ने अपना असली चेहरा दिखाया. उसके ताबूत को धक्का देते हुए कहा, वह एक दुश्मन की तरह जा रही है.’

पत्नी की बहन को श्रमशिविर भिजवा दिया

नदेज़्दा की एक बहन अना सेर्गेयेवा रेदेन्स 1948 में उसके संस्मरणों को प्रकाशित करना चाहती थी. स्टालिन को जैसे ही इसका पता चला, उसने उसे दस साल के लिए श्रमशिविर में भिजवा दिया. स्टालिन की मृत्यु के बाद 1954 में उसे रिहाई मिली. बताया जाता है कि वह मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गई थी. मां की वीभत्स मृत्यु के समय स्टालिन की बेटी स्वेतलाना केवल साढ़े छह साल की थी. उससे कहा गया कि उसकी मां अपेन्डिक्स के एक ऑपरेशन के समय चल बसी.

स्टालिन ने उस रात क्या किया? घर पर नहीं था तो कहां था? यह सब आज तक रहस्य बना हुआ है. कई अटकलें लगाई जाती हैं. मसलन स्टालिन ने ही नदेज़्दा को गोली मारी, या फिर किसी को कह कर उसकी हत्या करवाई. उस हत्यारे को भी उसने संभवतः मरवा डाला ताकि वह कभी कुछ बता न सके. एक संभावना यह भी जताई जाती है कि रात वाले जश्न में अपने अपमान से आहत नदेज़्दा ने आत्महत्या कर ली.

जीवन-मरण स्टालिन के हाथ में

नदेज़्दा की मृत्यु के बाद स्टालिन का हिंसक स्वभाव बद से बदतर होता गया. स्वेतलाना और उसके सगे भाई वसिली और सौतेले भाई याकोव सहित स्टालिन के तीनों बच्चे अपनी माताएं खो चुके थे. लोगों के कहने के अनुसार, नदेज़्दा की मृत्यु के बाद स्टालिन की एक ही पत्नी रह गयी थी, और वह थी सत्ता.

स्तेफ़ान मिकोयान स्तालिन के बच्चों को तब से जानते हैं, जब वे उन्हीं की आयु के हुआ करते थे. वसिली के साथ ही वे भी उन दिनों सोवियत वायुसेना में एक अफ़सर थे. उनके पिता अनस्तास मिकोयान सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के पोलितब्यूरो सदस्य और स्टालिन से लेकर ख्रुश्चोव की सरकार तक में अलग-अलग मंत्री रह चुके हैं. स्तेफ़ान मिकोयान के पिता ने एक बार उनसे कहा कि ‘कोई नहीं जान सकता था कि स्टालिन कब किस के साथ अचानक क्या कर बैठेगा. कोई घर पहुंचेगा, या सीधे जेल!’

स्टालिन का सफ़ाई अभियान

1930 वाले दशक के मध्य में स्टालिन का सफ़ाई अभियान शुरू हुआ. इस अभियान से वे लोग भी सुरक्षित नहीं थे, जो सत्ता के केंद्र में थे या अपने आप को स्टालिन का विश्वासपात्र समझते थे. बेटी स्वेतलाना और उसके सगे भई वसिली को भी इसका भुक्तभोगी बनना पड़ा. हालांकि स्वेतलाना जब तक छोटी थी तब तक किसी हद तक बची रही. स्टालिन अपना अधिकतर समय ‘दाचा’ कहलाने वाले मॉस्को से 31 किलोमीटर दूर स्थित एक बंगले में बिताने लगा था. स्वेतलाना एक दाई और पहरेदार के साथ मॉस्को में अकेले ही रहती थी. पिता स्टालिन के साथ उसका संपर्क अधिकतर चिट्ठियों तक ही सीमित हो गया था.

स्वेतलाना की एक सहेली रही हैं मार्फ़ा पेश्कोवा. प्रसिद्ध रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की उनके दादा थे. स्टालिन को निजी तौर पर जानने वाली वही इस समय संभवतः एकमात्र जीवित प्रत्यक्षदर्शी हैं. वे और 22 नवंबर 2011 को अमेरिका में गुज़र चुकी स्वेतलाना अपने युवाकाल में समवयस्क सहेलियां हुआ करती थीं. स्कूल में दोनों एक ही कक्षा में थीं. दोनों सप्ताहांत को अक्सर स्टालिन के ‘दाचा’ जाया करती थीं.

स्वेतलाना को भुलावे में रखा

एक टेलीविज़न भेंटवार्ता में मार्फ़ा ने कहा कि उन्हें स्टालिऩ के साथ शामों को खाना खाने में बहुत डर लगता था. इस भेंटवार्ता में मार्फ़ा ने बताया कि ‘स्वेतलाना ने एक दिन मुझे अंग्रेज़ी की एक पत्रिका दिखाई और कहा, ‘ज़रा यह फ़ोटो तो देखो!’ मैंने ध्यान से देखा, फ़ोटो में एक महिला ताबूत में लेटी हुई है. उसने कहा, यह मेरी मां है. पत्रिका में एक लेख भी छपा था. स्वेतलाना ने उसे पढ़ कर सुनाया कि उसकी मां ने आत्महत्या की थी. जबकि उसे यही बताया गया था कि उसकी मां एक ऑपरेशन के दौरान मरी थी.’’

मार्फ़ा पेश्कोवा ने बताया कि स्वेतलाना ने डर के मारे इस झूठ के बारे में अपने पिता से कभी बात नहीं की. उसका भाई वसिली भी मां के न होने से बहुत दुखी था. उसे तो पिता का स्नेह कभी मिला ही नहीं. सोवियत वायुसेना में वसिली के साथ रह चुके स्तेफ़ान मिकोयान की नजर में वसिली बहुत प्रतिभावान था, पर एकदम गुपचुप रहता था. अच्छे हाथों में रहा होता, तो उसमें और भी निखार आ सकता था. मां का साया तो बचपन से ही उठ गया था. अब एक जासूस, किसी छाया की तरह, उसके आस-पास बना रहता था.

जनरल बेटा थर-थर कांपता था

मार्फ़ा पेश्कोवा ने देखा था कि स्टालिन ने जब कभी वसिली को अपने पास बुलाया तो वह वायुसेना में एक जनरल होते हुए भी सिर से पैर तक थर-थर कांपने लगता था. दूसरी ओर, स्टालिन का प्रचारतंत्र उसे पूरे देश के सबसे बड़े शुभचिंतिक के रूप में पेश किया करता था. वसिली के पुत्र अलेकसांदर बुर्दोव्स्की का जन्म 1941 में हुआ था. वे याद करते हैं कि उनके पिता अपनी इच्छानुसार स्टालिन के पास नहीं जा सकते थे. पहले फ़ोन करके समय लेना पड़ता था. फ़ोन स्टालिन के कर्मचारियों से हो कर आगे जाता था.

1937 के सफ़ाई अभियान के साथ स्टालिन का आतंक अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचने लगा. दसियों लाख लोगों को कड़ी मेहनत करते हुए मरने के लिए साइबेरिया के श्रमशिविरों में ठूंस दिया गया या सीधे मार ही डाला गया. इतिहास में जिन दुष्टताओं और जघन्यताओं के लिए जर्मनी के हिटलर के नाम पर थूका जाता है, स्टालिन भी उन सब कुकर्मों में हिटलर से कतई पीछे नहीं था.

स्टालिन के निशाने पर सभी लोग थे

हिटलर फ़ासिस्ट था. उसके निशाने पर यहूदी, कम्युनिस्ट, भारतवंशी रोमा और सिन्ती बंजारे तथा उसके राजनैतिक विरोधी थे. जबकि स्टालिन कम्युनिस्ट था. उसके निशाने पर सभी लोग थे – मज़दूर, किसान और पूंजीवीदी ही नहीं, उसकी अपनी ही पार्टी के अपने ही मंत्री व सहयोगी भी. वह कब किस के लिए यमराज बन जायेगा, कोई नहीं जान सकता था.

सेर्गेई ख्रुश्चेव के अनुसार सफ़ाई अभियान की चरम सीमा पर उनके पिता निकिता ख्रुश्चेव की जान भी बुरी तरह ख़तरे में थी. एक बार उन्हें क्रेमलिन में बुलाया गया. स्टालिन ने उन्हें घूर कर देखा और कहा, ‘तुम्हारा नाम ख्रुश्चेव नहीं है!’ पिताजी को मानो साप सूंघ गया. हिम्मत जुटा कर बोले, ‘कॉमरेड स्टालिन, आप मेरे गांव में किसी से भी पूछ सकते हैं, मैं ही ख्रुश्चेव हूं.’ स्टालिन ने फिर घूर कर देखा और कहा, ‘लगता है मेरी गुप्तचर सेवा का प्रमुख पिये हुए था.’’

‘उड़ा दो गोली से’

स्टालिन के लिए हर आदमी संभावित जासूस और ग़द्दार था, इसलिए उसने भी, हिटलर की तरह ही, सबके पीछे जासूस लगा रखे थे. उसके पुराने दोस्त भी संदेह से परे नहीं थे. उसका ऐसा ही एक दोस्त था व्याचेस्लाव मोलोतोव. स्टालिन के शासनकाल में 1930 से 1941 तक वह सरकार प्रमुख (प्रधानमंत्री) और बाद में विदेशमंत्री रहा. 1941 में स्टालिन स्वयं ही सरकार प्रमुख भी बन गया था. उसे मोलोतोव की पत्नी की निष्ठा पर कहीं से शक हो गया और उसे तुरंत साइबेरिया के एक श्रमशिविर में सड़ने के लिए भिजवा दिया गया. यही नहीं, उसे कई प्रमुख लोगों की कथित रूप से संदेहास्पद पत्नियों की एक लिस्ट दी गई और उस लिस्ट पर उसने सबकी आंखों के सामने लिखा, ‘उड़ा दो गोली से!’

1941 में हिटलर के नाज़ीवादी जर्मनी ने जब सोवियत संघ पर हमला कर दिया तो स्टालिन का सबसे बड़ा बेटा याकोव युद्ध छिड़ते ही जर्मन सेना के हाथ लग गया. स्टालिनग्राद (आज के वोल्गोग्राद) वाले 1943 के घनघोर युद्ध के बाद, जिसमें जर्मन सेना को नीचा देखना पड़ा था, जर्मनों ने प्रस्ताव रखा कि रूसी यदि बंदी बना लिये गये उनके फ़ील्डमार्शल फ़्रीड्रिश पाउलुस को रिहा कर दें, तो वे भी स्टालिन के बेटे याकोव को रिहा कर देंगे. स्टालिन का दो टूक उत्तर था, ‘मैं एक सैनिक के बदले एक फ़ील्डमार्शल को रिहा नहीं करता!’

बेटे की पत्नी को गिरफ्तार करवाया

इतना ही नहीं, स्टालिन को जैसे ही य़ह ख़बर मिली कि जर्मन सेना ने याकोव को बंदी बना लिया है, उसने हृदयहीनता की सारी सीमाएं पार करते हुए याकोव की पत्नी यूलिया को गिरफ्तार करवा दिया और उसकी बेटी गलीना को एक सुधारगृह में भिजवा दिया. उसने मान लिया था कि उसका बेटा बंदी नहीं बनाया गया है, बल्कि जर्मनों के साथ मिल गया है. यह उसकी नज़र में एक ऐसा अक्षम्य अपराध था जिससे उसकी अपनी राजनैतिक साख पर भी आंच आ सकती थी.

याकोव बर्लिन के पास स्थित ज़ाख्सनहाउज़न यातना शिविर में बंदी था. वहां उसने 14 अप्रैल 1943 के दिन बिजली के करंट वाली शिविर की बाड़ से टकराकर आत्महत्या कर ली. फ़ील्डमार्शल फ़्रीड्रिश पाउलुस 1943 से 1953 तक तत्कालीन सोवियत संघ में युद्धबंदी रहने के बाद रिहा होते ही उस समय के पूर्वी जर्मनी में वापस लौटा. वहीं 1957 में उसकी मृत्यु हुई. इस तरह स्टालिऩ ने शत्रु को तो जीने दिया पर अपने बेटे को मरने से नहीं बचाया. उसके बच्चों से सुपरिचित स्तेफ़ान मिकोयान के अनुसार, ‘याकोव बहुत ही निराशाजनक स्थिति में था. जीवित वापस लौटने पर अपने पिता से उसे कोई अच्छा बर्ताव नहीं मिलता. उस बेचारे के पास कोई चारा ही नहीं था.’

हर रात गिरफ्तारी अभियान

उन दिनों मॉस्को में हर रात गिरफ्तारी अभियान चला करते थे. स्टालिन के आदेश पर उसकी गुप्तचर पुलिस वसिली और स्वेतलाना की मौसियों तथा रिश्ते की बहनों को भी पकड़ कर ले गयी. उनके मामा को तो अपनी जान भी गंवानी पड़ी. स्टालिन के बच्चे इसे अनदेखा नहीं कर पा रहे थे, पर वे कुछ कर भी नहीं सकते थे. जर्मनी की इतिहासकार मार्था शाड ने अमेरिका में स्वेतलाना के साथ एक बातचीत में जब यह प्रसंग छेड़ा, तो उसने उन्हें बताया कि एक दिन उसके पिता ने टेलीफ़ोन पर उससे कहा, ‘हम इन्हें दुर्घटनाएं कहते हैं.’ वह एक ऐसा पिता था, जो अपने परिवार तक को नहीं बख़्श रहा था.

यहूदी पसंद नहीं थे

स्टालिन को अपनी बेटी स्वेतलाना से ज़रूर काफ़ी लगाव था, लेकिन एक सीमा के भीतर ही. यह लगाव तब तेज़ी से घटने लगा, जब स्वेतलाना सयानी हो गई और उसके प्रेमप्रसंग शुरू होने लगे. पहला प्रेमी स्वेतलाना से 20 साल बड़ा एक यहूदी फ़िल्म निर्माता था. नाम था अलेक्सेई काप्लर. वर्ष था 1943.

स्वेतलाना उस समय 16 साल की थी. काप्लर एक प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता था. उसने लेनिन के बारे में भी एक फ़िल्म बनाई थी. स्टालिन को पता था कि स्वेतलाना उससे मिला करती है. लेकिन, एक दिन जब काप्लर को लेकर वह अपने पिता के ‘दाचा’ वाले बंगले पर गई और उसे काप्लर का परिचय दिया, तो स्टालिन की प्रतिक्रिया से वह स्तब्ध रह गई. स्टालिन ने कहा, ‘क्या तुझे कोई रूसी नहीं मिल रहा था?’ स्टालिन ने काप्लर को गिरफ्तार करवा कर दस साल के लिए साइबेरियाई श्रमशिविरों में भिजवा दिया. उसे यहूदी पसंद नहीं थे.

स्वेतलाना इससे विचलित हुए बिना एक ही साल में एक नये प्रेमी को दिल दे बैठी. वह भी यहूदी था. नाम था ग्रिगोरी मोरोसोव. वह मॉस्को विश्वविद्यालय में स्वेतलाना की पढ़ाई के समय का एक सहपाठी था. स्टालिन ने बहुत अनिच्छापूर्वक इस शर्त पर दोनों को विवाह करने की अनुमति दे दी कि वह अपने भावी दामाद से कभी नहीं मिलेगा.

नाती को नकारा

1945 में स्वेतलाना ने 19 साल की उम्र में एक पुत्र को जन्म दिया. नाम रखा इयोसेफ़. उसे लेकर स्वेतलाना जब पहली बार पिता स्टालिन से मिलने गई, तो वह अपने नाती को देखने के लिए कमरे से बाहर ही नहीं आया. मोरोसोव के साथ स्वेतलाना का यह विवाह अधिक समय तक नहीं चल पाया. स्टालिन के हस्तक्षेप के चलते यह दो ही वर्षों के भीतर 1947 में टूट गया. विवाह टूटते ही स्वेतलाना का पति अपनी नौकरी भी खो बैठा और उसके पिता को गिरफ्तार कर लिया गया.

स्टालिन ने तय किया कि अब वह खुद ही स्वेतलाना के लिए कोई नया पति ढूंढेगा. उसकी नज़र अपने मंत्री और पोलितब्यूरो सदस्य अनस्तास मिकोयान के पुत्र स्तेफ़ान मिकोयान पर पड़ी, जो स्वेतलाना और उसके भाइयों को पहले से ही जानता था. स्टालिन को शायद पता नहीं था कि स्तेफ़ान शादीशुदा है. स्तेफ़ान ने स्टालिन की पसंद के बारे में जब अपने पिता से बात की, तो उनका उत्तर था, ‘यदि यह शादी हुई, तो बहुत बुरा होगा. स्टालिन से रिश्तेदारी का मतलब है अपनी आफ़त बुलाना!’ यह शादी नहीं हुई.

स्टालिन ने तब अपनी कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेतृत्वमंडल, यानी पोलितब्यूरो के एक दूसरे सदस्य, आंद्रेई श्दानोव के पुत्र यूरी श्दानोव के साथ स्वेतलाना का विवाह करना तय किया. यह विवाह 1949 में हुआ. 1950 में दोनों अलग हो गये. 1952 में बाक़ायदा तलाक़ भी हो गया. इस विवाह से स्वेतलाना की एक बेटी हुई येकातरीना. स्वेतलाना अपने बेटे इयोसेफ़ और बेटी य़ेकातरीना के साथ स्टालिन द्वारा मॉस्को में दिये गए एक फ्लैट में रहने लगी. दोनों बच्चों ने अपने नाना को शायद ही कभी देखा. नाना की इसमें दिलचस्पी ही नहीं थी.

स्टालिन की मृत्यु

अपने ‘दाचा’ में मस्तिष्काघात (ब्रेन स्ट्रोक) के बाद चार दिनों तक बेहोश रहने के बाद पांच मार्च 1953 को, स्टालिन की मृत्यु हो गयी. परिवार के एकमात्र सदस्य के तौर पर स्वेतलाना को स्टालिन की मृत्युशैया पर बुलाया गया. उसका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ हुआ. अंतिम संस्कार से पहले उसके शव को जनता की श्रद्धांजलि के लिए क्रेमलिन के स्तंभ-हॉल में रखा गया. तीन दिनों तक राजकीय शोक मनाया गया.

स्टालिन के मरते ही स्वेतलाना अपनी मां का कुलनाम अपनाते हुए ‘स्वेतलाना स्टालिना’ से ‘स्वेतलाना अलिलुयेवा’ बन गयी. वह नहीं चाहती थी कि देश-दुनिया के लोग उसका नाम सुनते ही समझ जाएं कि वह 20वीं सदी के एक सबसे बड़े महापापी की बेटी है. नाम बदलने के बाद वह मॉस्को में एक शिक्षिका और अनुवादक के तौर पर काम करने लगी. मां की असमय मृत्यु और पिता के अत्याचारी स्वभाव से उसके जीवन में जिस लाड़-प्यार की कमी रह गयी, उसकी पूर्ति के लिए वह जीवनपर्यंत (2011 तक) बार-बार प्रेमविवाह करती और तलाक़ देती रही. भारत के कुंवर ब्रजेश सिंह के साथ का प्रेमप्रसंग भी इसी कड़ी की एक लड़ी भर था. वह कहानी बाद में कभी.

महिमामंडन के बाद महिमा- खंडन

स्टालिन जब तक जीवित था, तब तक सोवियत संघ में उसका अंतहीन महिमामंडन होता रहा. दुनिया से उसके जाते ही उसका महिमा- खंडन शुरू हो गया. मार्च 1939 से सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्षमंडल (पहले पोलित ब्यूरो) के सदस्य और स्टालिन की दूसरी पत्नी नदेज़्दा के मित्र रहे निकिता ख्रुश्चेव ने स्टालिन की मृत्यु के बाद उसका स्थान लिया. पार्टी के भीतर भारी उथल-पुथल हुई. स्टालिन के सबसे अधिक विश्वासपात्रों को तेज़ी से हटाया गया. स्टालिन के गृह और गुप्तचरसेवा मंत्री लावरेन्त बेरिया और उसके कई सहयोगियों को गिरफ्तार कर गोली मार दी गई.

सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के 20वें अधिवेशन के दौरान, 25 फ़रवरी 1956 के दिन, ख्रुश्चेव ने एक सनसनीख़ेज़ गोपनीय भाषण में स्टालिन द्वारा चलाई गई ‘व्यक्तिपूजा’ और उसके घृणित परिणामों का कच्चा चिट्ठा खोल कर रख दिया. देश-दुनिया को पहली बार पता चला कि स्टालिन कितना अकल्पनीय अत्याचारी शासक था. बहुत से बंदीशिविर खोल दिये गये. निर्दोषों को रिहा कर दिया गया. सोवियत जनता ने पहली बार राहत की सांस ली.

स्वेतलाना के मित्र स्तेफ़ान मिकोयान के पिता ने ख्रुश्चेव के भाषण की एक प्रति स्तेफ़ान को दी और स्तेफ़ान ने उसे उसी समय स्वेतलाना को दिखाया. उसे पढ़ने के बाद स्वेतलाना की टिप्पणी थी, ‘सबसे भयानक बात यह है कि यही सच्चाई है.’

दो सच्चाइयां भारत से संबंधित भी

कम से कम दो अप्रिय सच्चाइयां भारत से संबंधित भी हैं. अपने समय के दुनिया के प्रमुख नेताओं में स्टालिन एकमात्र ऐसा सरकार प्रमुख था, जिसने महात्मा गांधी के निधन पर न तो कोई शोक प्रकट किया और न भारत सरकार को कोई शोकसंदेश भेजा. जबकि भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सोवियत संघ के महत्व का सम्मान करते हुए अपनी बहन विजयलक्ष्मी पंडित को मॉस्को में भारत का पहला राजदूत बना कर भेजा था. कहा तो यह भी जाता है कि स्टालिन ने विजयलक्षमी पंडित को मिलने का समय भी कभी नहीं दिया.

दूसरी सच्चाई का संबंध नेताजी सुभाषचंद्र बोस से है. 16 जनवरी 1941 के दिन जब कलकत्ता में वे अपने घर से ग़ायब हुए, तब वे सीधे बर्लिन नहीं, पहले मॉस्को पहुंचना चाहते थे. रास्ते में काबुल उनका पहला मुख्य पड़ाव था. काबुल में उन्हें इतालवी दूतावास से ‘ओर्लांदो मसोता’ बताने वाला राजनयिक (डिप्लोमैटिक) पासपोर्ट मिला. वे क़रीब एक महीने तक काबुल में ही रहे और सोवियत रेल अधिकारियों से हरी झंडी मिलने के बाद मॉस्को की दिशा में रवाना हुए.

नेताजी मॉस्को में

नेताजी कब मॉस्को पहुंचे, यह ज्ञात नहीं है. पर मॉस्को से ही ट्रेन द्वारा, दो अप्रैल 1941 के दिन, वे बर्लिन के उस समय के अंतरराष्ट्रीय रेलवे स्टेशन ‘अनहाल्टर बानहोफ़’ पहुंचे थे. काबुल छोड़ने के बाद बर्लिन पहुंचने में लगभग एक महीने का समय लगने का अर्थ है कि नेताजी बोस ने कुछ समय रूस में बिताया और रूसी नेताओं से भारत को स्वतंत्रता दिलाने की अपनी योजना में सहयोग पाने का प्रयास किया. इस सहयोग का आश्वासन उन्हें नहीं मिला, इसलिए उन्हें अंततः बर्लिन जाना पड़ा. तत्कालीन जर्मन विदंशमंत्रालय के दो अधिकारियों ने रेलवे स्टेशन पर उनका स्वागत किया और पास के ही एक होटल में ठहराया.

बताया जाता है कि हर किसी पर शक करने के आदी स्टालिन को शक था कि नेताजी ब्रिटिश जासूस हैं और उन्हें अंग्रेज़ों ने अपनी किसी गुप्त योजना के तौर पर भेजा है. उसे या उसके सलाहकारों को शायद विश्वास नहीं हो पा रहा था कि अंग्रेज़ों को चकमा देकर कोई इतना नामी भारतीय वाकई भारत छोड़ भी सकता है. निराश हो कर नेताजी को अंततः बर्लिन ही जाना पड़ा. यह भी संभव है कि महाघमंडी स्टालिन को भारत और उसकी स्वतंत्रता में कोई दिलचस्पी ही नहीं रही हो.

स्टालिन ने हाथ नहीं बढ़ाया

नेताजी सुभाष चंद्र बोस हिटलर के प्रशंसक कभी नहीं थे. अपने एक जर्मन मित्र को लिखे 25 मार्च 1936 के एक पत्र में हिटलर के 14 मार्च 1936 के एक भाषण की और उसकी पुस्तक ‘माइन काम्फ़’ में लिखे विचारों की वे ‘उपनिवेशवादी’, ‘स्वार्थी’, ‘घमंडी’, ‘संकीर्ण’ जैसे स्पष्ट शब्दों में कड़ी आलोचना भी कर चुके थे.

तब भी नेताजी ने हिटलर से हाथ मिलाया तो इसलिए कि स्टालिन ने हाथ नहीं बढ़ाया. नेताजी भारत को आज़ादी दिलाने के लिए तड़प रहे थे. बेचैन थे. व्याकुल थे. और स्टालिन अपनी जनता ही नहीं, अपने परिवार को भी नष्ट करने में व्यस्त था. नेताजी के बर्लिन पहुंचने तक हिटलर ने रूस पर आक्रमण नहीं किया था. वे यह मान कर चल रहे थे कि दोनों देशों की अनाक्रमण संधि युध्द नहीं होने देगी.

लेकिन दुर्भाग्य से यही हुआ. हिटलर ने अनाक्रमण संधि की धज्जियां उड़ाते हुए, 22 जून 1941 को, रूस पर हमला बोल दिया. हिटलर का यह दुस्साहस अंततः अप्रैल 1945 के अंत में उसकी आत्महत्या और सप्ताह-भर बाद जर्मनी के बिना शर्त आत्मसमर्पण के साथ समाप्त हुआ. नेताजी सुभाष चंद्र बोस, फरवरी 1943 में ही, एक पनडुब्बी द्वारा जापान की दिशा में रवाना हो चुके थे.