ड्रग्स और गैंगवॉर पर आधारित किसी भी नयी हिंदुस्तानी वेब सीरीज के लिए ‘नार्कोस’ और ‘सेक्रेड गेम्स’ से होने वाली तुलना से बच पाना मुमकिन नहीं है. ‘नार्कोस’ ने जहां ड्रग्स के धंधे और भिन्न-भिन्न ड्रग कार्टेल्स के बीच की हिंसक जंग को अलहदे अंदाज में दिखाकर क्राइम-ड्रामा जॉनर में नए मानक स्थापित किए हैं, वहीं गैंगवॉर की महा-हिंसक कहानी कहने वाली ‘सेक्रेड गेम्स’ ने अंतरराष्ट्रीय मानकों वाली पहली और अब तक की इकलौती ‘हिंदी’ वेब सीरीज हमारी नजर की है. इसलिए ‘स्मोक’ देखते वक्त विषयवस्तु समान होने के बावजूद इसका इन दोनों वेब सीरीज जितना स्टाइलिश न होना पसंद आता है.

कुछ दर्शकों को यह नये-नवेले निर्देशक और अनुराग कश्यप के सहयोगी रहे नील गुहा की अनुभवहीनता भी लग सकती है, कि वे पारंगत निर्देशकों की तरह उस तरह की स्टाइल इस वेब सीरीज में समाहित नहीं कर पाए जो कि आजकल का मानक हो गई है. लेकिन एक तरह से ‘स्मोक’ का यह रॉ-पन (रॉ होना!) समान विषय पर बनी मशहूर कृतियों से खुद को अलग दिखाने के लिए खेला गया एक सुघड़ स्ट्रोक मालूम होता है.

11 एपीसोड लंबी यह वेब सीरीज प्रतिष्ठित हिंदी फिल्म निर्माण कंपनी इरोस इंटरनेशनल की पेशकश है और इसे आप इरोस नाउ नामक एप के अलावा जियो सिम धारी होने पर जियो सिनेमा एप पर भी देख सकते हैं. नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम जैसे स्थापित अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म पर न आने और किसी जाने-पहचाने निर्देशक की पेशकश न होने के बावजूद ‘स्मोक’ के प्रति ट्रेलर लॉन्च के वक्त से ही उत्सुकता से पूरे भर जाने की मुख्य वजह कई सारे दमदार व अलहदा कलाकारों का एक जगह नजर आना था. बहुत, बहुत और बहुत कम होता है कि टॉम ऑल्टर से लेकर प्रकाश बेलावड़ी, अमित सियाल, गुलशन देवैया, जिम सार्ब, कल्कि केकला, नील भूपालम, मंदिरा बेदी, गिरीश कुलकर्णी और सत्यदीप मिश्रा जैसे अभिनय में पारंगत और अनोखी व दिलचस्प स्क्रीन प्रेजेंस रखने वाले कलाकार एक साथ कहीं देखने को मिलते हैं. और अगर कहानी का फैलाव 11 एपीसोड जितना लंबा व सघन हो, तो इन सब का साथ आना उम्मीद के पांवों में ग्यारह जोड़ी पहिए लगाने का काम करता है.

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इस लिहाज से ‘स्मोक’ उम्मीदों पर खरी उतरती है. वो अपने कई अभिनेताओं को बेजोड़ अभिनय करने का मौका देती है और उन्हें दिलचस्प किरदारों का पैरहन पहनाकर देखने वाले को भरपूर सुख देती है. नशे के स्वर्ग गोवा में रूसी मोशे बराक (टॉम ऑल्टर) और मराठी विलास साटम ‘भाऊ’ (प्रकाश बेलावड़ी) मिलकर ड्रग्स का धंधा चलाते हैं और गोवा के सबसे बड़े ड्रग माफिया कहलाए जाते हैं. कई दूसरे देसी-विदेशी नागरिकता वाले गैंगस्टर इस नशे के स्वर्ग पर कब्जा जमाने की फिराक में हरदम रहते हैं और इस फ्रिक्शन से उपजे गैंगवॉर से ही ‘स्मोक’ की कहानी निकलकर परदे पर नजर आती है. इस गैंगवॉर में छोटे-मोटे प्यादों और सच का साथ देने वाले नायकों की भी अपनी-अपनी महत्वाकांक्षा होती है जिस वजह से छोटे-बड़े-सच्चे किरदारों के आपसी टकराव से ‘स्मोक’ खुद को लगातार दिलचस्प बनाए रखने की कोशिश करती है.

यहां सभी एक्टरों को दिलचस्प व रंगीन किरदार निभाने को मिलते हैं. ऑल्टर व बेलावड़ी के अलावा अमित सियाल भाऊ के सिरफिरे बेटे के रोल में हैं जो कि हर दम मुंह से गाली देने और उंगली से गन का ट्रिगर दबाने के लिए तत्पर रहता है. गुलशन देवैया सर्वथा कूल बिहारी कॉन्ट्रैक्ट किलर की भूमिका निभाते हैं जो कि अमित सियाल के किरदार पुष्कर के ‘दोस्त कम भाई’ बनते हैं. जिम सार्ब रूसी गैंगस्टर ऑल्टर के खबरी, ड्राइवर, दुख के साथी, सब बनते हैं और चप्पल चटकाता हुआ अलमस्त रहने वाला उनका चालाक किरदार रॉय स्क्रीन पर जब नहीं होता तब भी आपकी नजरों से ओझल नहीं होता.

नील भूपालम रॉय के सीधे-सादे गूंगे-बहरे दोस्त की भूमिका में हैं तो मंदिरा बेदी टॉम ऑल्टर के किरदार मोशे बराक की पत्नी की. कल्कि केकला डीजे बनी हैं और ऑल्टर के किरदार की कैद में छटपटाने वाली युवती की कम दमदार लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. ‘पीओके : बंदी युद्ध के’ नामक सीरियल में बेहतरीन के स्तर वाला सहज अभिनय करने वाले सत्यदीप मिश्रा कड़क एसीपी बने हैं और सख्त व ईमानदार मुख्यमंत्री का किरदार निभाने वाले गिरीश कुलकर्णी के आदेश पर गोवा से ड्रग्स का सफाया करने का काम करते हैं.

‘स्मोक’ इन सभी किरदारों को दिलचस्प ट्रेजेक्टरी देती है और एपीसोड दर एपीसोड उनके कैरेक्टर-ग्राफ को आगे बढ़ाती चलती है. सभी को कुशलता से स्थापित करती है और शुरुआती कुछ एपीसोड तक आप कहानी से ज्यादा इन किरदारों में रमे रहते हैं. स्वर्गीय टॉम ऑल्टर इस सीरीज के मुख्य खलनायक हैं और उन्हें क्रूर व लाउड अभिनय करते देखना दिलचस्प अनुभव साबित होता है. बॉलीवुड कभी उनकी प्रतिभा का सही दोहन नहीं कर पाया – अगर आपने इस अंग्रेज एक्टर का एकल उर्दू नाटक ‘मौलाना आजाद’ देखा है तो आप समझ सकते हैं कि हम क्या कहना चाह रहे हैं – इसलिए कैंसर से लड़ते हुए मृत्यु को प्राप्त होने के कुछ महीने पहले ही शूट किया गया उनका यह महत्वपूर्ण किरदार गहरा असर छोड़ता है. हालांकि मोशे बराक बेहद क्रूर है और कभी-कभी उसके बोले गए संवाद मुश्किल से समझ आते हैं, लेकिन एक दर्द है जो हरदम टॉम ऑल्टर साहब के चेहरे और जिस्म में जज्ब मिलता है, जो कि जाहिर तौर पर कैंसर से उपजा दर्द होगा. ऐसा समझ आते ही उनके अभिनय में गलतियां ढूंढ़ने का मन नहीं करता.

दक्षिण भारतीय चरित्र अभिनेता प्रकाश बेलावड़ी मोशे बराक के मराठी मूल के जिगरी दोस्त और पार्टनर इन क्राइम भाऊ का किरदार निभाते हैं और उनको अब तक आपने इस तरह के कठोर व खालिस खलनायक वाले रोल में नहीं देखा होगा. एक तो उनका संवादों को डिलिवर करने का अंदाज बाकी एक्टरों से इतना भिन्न है कि सिर्फ इसी वजह से वे हद दर्शनीय अभिनेता बन जाते हैं. ऊपर से मुख्तलिफ इमोशन्स को इतनी आसानी से व्यक्त कर लेते हैं कि उनकी रेंज हतप्रभ करती है. इस सीरीज में उन्हें शबाब पर चढ़ते हुए देखना अलग ही आनंद देता है.

लेकिन, ‘स्मोक’ में सबसे ज्यादा आनंद – वो भी अलग वाला! - गुलशन देवैया देते हैं. बिहारी कॉन्ट्रैक्ट किलर जयराम झा की उनकी भूमिका कूलत्व को नए सिरे से वेब सीरीज स्पेस में स्थापित करती है. दक्षिण भारतीय मूल के इस एक्टर ने ‘द गर्ल इन येलो बूट्स’ में कुशलता से साउथ इंडियन किरदार निभाया था तो ‘हंटर’ में वे सेक्स-एडिक्ट मराठी मानुष बेजोड़ अंदाज में बने थे. अब वे ‘स्मोक’ मे खालिस बिहारी बनकर इतना बेहतरीन अभिनय करते हैं कि इस वाक्य और पिछले वाक्य वाली जानकारी भर ही उनकी रेंज बताने के लिए काफी नजर आती है!

संवादों के मामले में भी गुलशन देवैया को सीरीज के सबसे बेहतरीन संवाद दिए जाते हैं और वे उसी आत्मविश्वास से उन्हें ताली-पीट बनाते हैं जिस आत्मविश्वास के साथ कभी एंग्री यंग मैन बच्चन बनाया करते थे. उनके किरदार में कई सारे शेड्स मौजूद हैं जिस वजह से वे ‘स्मोक’ के बाकी सभी एक्टरों से अलग खड़े नजर आते हैं और धीर-गंभीर किरदारों के जमावड़े के बीच उनका मारक ह्यूमर का उपयोग करना दिल जीत लेता है (रशियन गैंगस्टर को जब वे कहते हैं कि ‘अच्छा रूसी है’, तो एक दूसरा किरदार उनके हिंदी मीडियम से होने पर हंसता है और वे तन कर उस अंग्रेजियत के खिलाफ खड़े हो जाते हैं! एक कॉन्ट्रैक्ट किलर भी हिंदी के सम्मान के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करता!).

बस कि उनकी मूंछें बीच सीरीज सफाचट नहीं की जानी चाहिए थी, क्योंकि ऐसा होने के बाद ही उनका किरदार थोड़ा कम असर करना शुरू हो जाता है.

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अमित सियाल भाऊ के सिरफिरे बेटे और अजनबी गुलशन देवैया के किरदार को दिलो-जान से चाहने वाले गैंगस्टर बने हैं और इन दोनों की दोस्ती ‘स्मोक’ को काफी दिलचस्प बनाती है. यह अभिनेता ‘तितली’ से लेकर ‘इनसाइड एज’ नामक वेब सीरीज तक में आलातरीन अभिनय कर चुका है लेकिन हमेशा प्रशंसा पाने के मामले में पीछे छूट जाता है. इस बार ऐसा नहीं हो तो बेहतर, क्योंकि ‘स्मोक’ में गुलशन देवैया के बाद अगर कोई अभिनेता सबसे ज्यादा छाप छोड़ता है तो वो लाउड नकारात्मक किरदार निभाने वाला यही अंडररेटिड अभिनेता है.

इनके अलावा कल्कि केकला, नील भूपालम, मंदिरा बेदी और गिरीश कुलकर्णी अपने-अपने सीमित ग्राफ वाले किरदारों में भी प्रभावित करते हैं और इंस्पेक्टर गुणे के रोल में गणेश यादव को कुछ दमदार सीन मिलते हैं. अंत में पारसी मूल के जिम सार्ब के बारे में यह कहना बनता है कि उनकी स्क्रीन प्रेजेंस फिल्मों व वेब-सीरीजों में इतनी खुशनुमा होती है कि सहज-सरल नजर आ रहे किरदार के भीतर कुटिलता छिपी है या मासूमियत, इसका अंदाजा लगाते-लगाते दर्शक उनके किरदार के प्यार में हमेशा ही गिरफ्तार होता जाता है.

‘स्मोक’ का अति दिलचस्प किरदार रॉय भी कोई अपवाद नहीं है, बल्कि बिना अपवाद यह मुनादी है कि वे एक विलक्षण कलाकार हैं जिनकी अनोखी संवाद अदायगी से लेकर किसी सुंदर हीरो जैसी स्क्रीन प्रेजेंस उन्हें एक दिन हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का बहुत सम्मानित नाम बनाने वाली है.

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लेकिन, दिलचस्प किरदारों और उन्हें अभिनीत करने वाले एक्टरों के उच्च के अभिनय के बावजूद ‘स्मोक’ एक बेहतरीन वेब सीरीज नहीं बन पाती. कारण? सुस्त चाल और लचर पटकथा.

वेब सीरीज का माध्यम इन दिनों निर्देशकों को इतना उत्साहित इसलिए कर रहा है क्योंकि वे इस माध्यम में फीचर फिल्मों में कही जाने वाली कहानियों को ज्यादा विस्तार देकर तफ्सील से कह सकते हैं. उनके किरदारों को बेहतर तरीके से एपीसोड दर एपीसोड तराश सकते हैं और इन किरदारों द्वारा उठाए गए ‘कदमों’ (एक्शन) के पीछे के कारणों (मोटिव) को बेहतर तरीके से अभिव्यक्त कर सकते हैं. ‘स्मोक’ यह काम कुशलता से करती है और अपने किरदारों को इतना सारा समय लेकर गढ़ती है कि धीरे-धीरे वे हम पर चढ़ते जाते हैं और हम इस सीरीज को कहानी के लिए देखने से ज्यादा उन किरदारों के लिए देखने लगते हैं. यह वेब सीरीज स्पेस की बड़ी जीत है क्योंकि यही महत्वाकांक्षा बॉलीवुड के निर्देशकों की होती भी है. लेकिन बेहतरीन किरदारों का एक बेहतर कहानी कहना भी तो जरूरी होता है!

‘स्मोक’ के ट्विस्ट्स एंड टर्न्स आखिर तक बांधे जरूर रखते हैं लेकिन इसकी सुस्त चाल और लचर पटकथा बार-बार कोफ्त पैदा करती है. शुरुआती कुछ एपीसोड में किरदारों को बेहद दिलचस्प अंदाज में स्थापित करने के बाद लंबे समय तक कहानी में नए-नए छोटे-मोटे किरदार इंट्रोड्यूस किए जाते रहते हैं और कश्मीरी, श्रीलंकाई, नाइजीरियन व रूसी जैसे कम महत्वपूर्ण किरदारों के माध्यम से ड्रग्स के धंधे में शामिल होने की चाह रखने वालों को कहानी का हिस्सा बनाया जाता है.

शुरुआत में यह सब रोचक लगता है कि चलो डायवर्सिटी हिंदी फिल्मों में न सही वेब सीरीज स्पेस में तो नजर आई. लेकिन बार-बार उन्हीं बातों पर कहानी लौटने लगती है – खासकर श्रीलंकाई व नाइजीरियन मूल के अपराधियों पर - और इस दौरान न तो ड्रग्स के धंधे से जुड़ी कोई अंदरुनी जानकारियां दर्शकों को हतप्रभ करने के लिए शामिल की जाती हैं और न ही गैंगवॉर को दिलचस्प बनाने के लिए पटकथा को कसा जाता है. 11 एसीपोड जरूरत से ज्यादा जान पड़ते हैं और कुछ सात या आठ एपीसोड में अगर ‘स्मोक’ को खत्म कर दिया जाता तो इसके एक बेहतर सीरीज के तौर पर पसंद किए जाने की संभावनाएं यकीनन बढ़ जातीं. अभी तो 11 एपीसोड तक इसे देख-देखकर थकते वक्त ऐसा लग रहा था कि जैसे एक वेब सीरीज को हिंदुस्तानी धारावाहिकों की बुरी नजर लग गई हो.

एक दूसरी कमी इसके पूरे ढांचे का बॉलीवुड फार्मूलों से बंधा होना है. यानी बंधक होना. कई सारे गैंग मिलकर ड्रग्स के धंधे में अपना वर्चस्व कायम रखना चाहते हैं यह कोई नयी कहानी नहीं है. लेकिन इसे अलग तरह से कहने में ‘पाउडर’ से लेकर ‘नार्कोस’ तक ने सफलता हासिल की थी क्योंकि उन्होंने ड्रग माफिया के विरुद्ध लड़ रहे नायकों को भी बराबरी की टक्कर का दिखाया था. ‘स्मोक’ यह बिलकुल भी नहीं कर पाती और एसीपी परेरा के रोल में सत्यदीप मिश्रा का किरदार बस बाकी किरदारों पर चिल्लाने और मुख्यमंत्री को फोन पर ‘जी सर’ कहने में ही अधिकतर खर्च होता रहता है.

हमारी देसी नेटफ्लिक्स सीरीज ‘पाउडर’ ने इतनी खूबसूरती के साथ ड्रग माफिया नावेद अंसारी का पीछा करने वाली पुलिस टीमों का खाका खींचा था कि पुलिस प्रोसीजरल सब-जॉनर की अहम चीजों को क्राइम-ड्रामा फिल्मों व वेब सीरीज में कैसे पिरोया जाना चाहिए, इसका सुघड़ उदाहरण पेश किया था. ‘नार्कोस’ ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यही किया था, लेकिन ‘स्मोक’ ने समान विषयवस्तु पर कहानी कहने के बावजूद इस सब-जॉनर के अहम बिंदुओं को खुद की पटकथा में शामिल न करने की गलती की, और अंजाम बहुत भारी भुगता.

‘स्मोक’ देखिए जरूर, क्योंकि यह दिलचस्प है और हमारे यहां विकास के जाने व अनजाने चरणों से गुजर रहे वेब सीरीज स्पेस में एक सराहनीय कोशिश है. बस इस उम्मीद के साथ मत देखिए कि कुछ हैरतअंगेज या लीक से हटकर देखने जा रहे हैं. उम्मीदें धुआं-धुआं हो जाएंगी. स्मोक-स्मोक, यू सी!