अगले साल आम चुनाव के मद्देनजर पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों को काफी अहम माना जा रहा है. इन राज्यों में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजों को लेकर कांग्रेस को काफी उम्मीदें हैं. इन तीनों राज्यों में भाजपा सत्ता में है और उसकी सबसे बड़ी चुनौती अपने मुख्यमंत्रियों को एक बार फिर सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाना है. वहीं, कांग्रेस के सामने छत्तीसगढ़ सहित तीनों सूबों में मुख्यमंत्री पद के लिए किसी एक सर्वस्वीकृत चेहरे को मतदाता के सामने ला पाने की चुनौती है.

बीते हफ्ते कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ के लिए अपने उम्मीदवारों की तीसरी और आखिरी सूची जारी की थी. इसमें एक नाम सबसे चौंकाने वाला था. यह नाम था ताम्रध्वज साहू का. साहू दुर्ग (ग्रामीण) से सांसद हैं. लेकिन कांग्रेस ने उन्हें विधानसभा के दंगल में उतार दिया है. उन्हें प्रतिभा चंद्राकर का टिकट काटकर यह सीट लड़ने के लिए दी गई है.

आखिर ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस को अपने मौजूदा सांसद को विधायक की सीट के लिए लड़वाना पड़ रहा है? जानकारों के मुताबिक इस सवाल के जवाब के तार छत्तीसगढ़ में पार्टी के अध्यक्ष भूपेश बघेल से भी जुड़ते हैं. कुर्मी समुदाय से आने वाली प्रतिभा चंद्राकर छत्तीसगढ़ पार्टी अध्यक्ष भूपेश बघेल की करीबी मानी जाती हैं. मीडिया रिपोर्टों की मानें तो कांग्रेस के उम्मीदवारों की तीसरी और आखिरी सूची जारी होने से पहले सूबे में पार्टी प्रभारी पीएल पुनिया के साथ भूपेश बघेल का विवाद हुआ था. साथ ही, पार्टी नेतृत्व के सामने यह बात भी आई कि कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पद के संभावित उम्मीदवारों के अलग-अलग गुट बन चुके हैं.

पार्टी के लिए इन गुटों से निपटकर भाजपा को कड़ी टक्कर देना एक बड़ी चुनौती है. माना जा रहा है कि सूबे से अपने एकमात्र सांसद को चुनावी मैदान में उतारकर पार्टी ने इससे निपटने की कोशिश की है. साथ ही, इस फैसले को भूपेश बघेल पर लगाम कसने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है. ताम्रध्वज साहू कांग्रेस वर्किंग कमेटी में होने के साथ पार्टी की राष्ट्रीय ओबीसी सेल के प्रमुख भी हैं.

भूपेश बघेल और ताम्रध्वज साहू अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समुदाय से आते हैं. प्रदेश पार्टी अध्यक्ष का संबंध कुर्मी समुदाय से है. इस समुदाय की सूबे की आबादी में करीब 36 फीसदी हिस्सेदारी है. वहीं, दुर्ग से सांसद ताम्रध्वज 16 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले साहू समाज से आते हैं. बताया जाता है कि कांग्रेस उम्मीदवारों की पहली और दूसरी सूची में साहू समुदाय से किसी बड़े चेहरे को टिकट नहीं दिया गया था जिसके चलते इस समुदाय के मतदाताओं के कांग्रेस से नाराज होने की संभावना जाहिर की गई थी. माना जाता है कि ताम्रध्वज साहू को मैदान में उतारकर पार्टी ने इस नाराजगी को दूर करने की कोशिश की है.

बीते चुनावों में यह बात सामने आई है कि साहू मतदाताओं पर भाजपा की अच्छी पकड़ रही है. उधर, दलितों और आदिवासियों को कांग्रेस का कोर वोटर माना जाता है. लेकिन इस चुनाव में इन समुदायों के पास अजीत जोगी और बसपा के गठबंधन के रूप में एक नया विकल्प आ गया है. इसकी वजह से संभावित नुकसान को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस सूबे के ओबीसी मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कोशिश में है. जातीय समीकरणों की मानें तो सूबे की 20 फीसदी यानी 18 सीटों पर साहू समुदाय निर्णायक भूमिका की स्थिति में है.

ताम्रध्वज साहू को मैदान में उतारने की एक और वजह भी बताई जा रही है. मुख्यमंत्री पद के लिए कांग्रेस में फिलहाल ‘एक अनार, सौ बीमार’ वाली स्थिति है. अलग-अलग नेताओं के बीच आपसी टकराव की आशंका से होने वाले नुकसान को ध्यान में रखते हुए पार्टी अभी तक किसी नाम पर मुहर नहीं लगा पाई है. जिन नामों को इस पद की दौड़ में आगे माना जा रहा है उनमें भूपेश बघेल के साथ विधानसभा में प्रतिपक्ष नेता टीएस सिंह देव भी हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत भी इस दौड़ में शामिल बताए जा रहे हैं. जानकारों के मुताबिक सांसद ताम्रध्वज साहू को उतारकर पार्टी ने इस रेस को नियंत्रित करने की कोशिश भी की है.