भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता रहे केएन गोविंदाचार्य ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के मसले पर पत्र लिखा है. छह पन्ने के इस पत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बेहद करीब माने जाने वाले गोविंदाचार्य ने राम मंदिर बनाने के लिए जरूरी कानूनी बदलावों पर अपने सुझाव विस्तार से दिए हैं.

संघ प्रमुख मोहन भागवत समेत भाजपा के भी कुछ नेता राम मंदिर निर्माण के लिए नया कानून लाने की बात कर रहे हैं. इसी संदर्भ में अब अध्यादेश की बात चल पड़ी है. लेकिन गोविंदाचार्य ने प्रधानमंत्री को सुझाव दिया है कि ऐसा करने के लिए बिल्कुल नया अध्यादेश लाने की जरूरत नहीं है. उनका कहना है कि विवादित जमीन से संबंधित 1993 का कानून इस जमीन का स्वामित्व केंद्र सरकार को देता है. इस पर अभी अदालती रोक है. 1993 के कानून में संशोधन के जरिये इस रोक को निरस्त के बाद केंद्र सरकार जैसे चाहे इस जमीन का इस्तेमाल कर सकती है.

वैसे तो गोविंदाचार्य लंबे समय से सक्रिय राजनीति से दूर हैं और भाजपा के सदस्य भी नहीं हैं लेकिन संघ और उसके सहयोगी संगठनों में अब भी उनकी बातों को गंभीरता से लिया जाता है. वे भी खुद को संघ का आजीवन स्वयंसेवक मानते हैं. भाजपा के आम कार्यकर्ताओं के बीच भी उनकी बातों की चर्चा होती है. इस पत्र को लेकर भी संघ, उसके सहयोगी संगठनों और भाजपा में भी ऐसा ही हो रहा है. इसकी एक वजह यह भी है कि गोविंदाचार्य को एक चिंतक और विचारक के तौर पर देखा जाता है और उनकी वैचारिक गहराई को लेकर एक खास दायरे में बेहद सम्मान का भाव रहा है.

कुछ राजनीतिक लोग यह भी कह रहे हैं कि गोविंदाचार्य इस पत्र के जरिए संघ और भाजपा के उन लोगों की आवाज बनने की कोशिश कर रहे हैं जो अपने संगठन के दायरे में बंधकर उतने आक्रामक ढंग से राम मंदिर पर अपनी बात नहीं रख पा रहे हैं. गोविंदाचार्य सीधे तौर पर राजनीति में सक्रिय भले नहीं हों लेकिन संघ और उसके सहयोगी संगठनों के लोगों से उनका संपर्क लगातार रहता है. इस नाते कहें तो गोविंदाचार्य के इस पत्र का एक राजनीतिक मतलब भी है. उन्होंने अपने इस पत्र में न्यायपालिका के प्रति भी आक्रामक रुख अपनाया है.

गोविंदाचार्य के इस पत्र पर मोदी सरकार कोई पहल करे या नहीं करे लेकिन वह और भाजपा, राम मंदिर के मुद्दे पर जिस तरह का राजनीतिक माहौल तैयार करना चाह रहे हैं, उस प्रक्रिया को थोड़ी गति जरूर मिल सकती है.

गोविंदाचार्य द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे गए इस पत्र की कुछ मुख्य बातें

1. देश की एकता के नायक ‘लौह पुरूष’ सरदार वल्लभ भाई पटेल की स्मृति में रिकार्ड समय में विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति बनवाने के लिए समस्त देशवासियों की तरफ से आपका आभार. उसी तेजी से अयोध्या में श्री राम मन्दिर जन्मभूमि पर मन्दिर का निर्माण भी यदि हो जाए, तो देश की जनता द्वारा आपके लिए दिया गया ऐतिहासिक जनादेश सार्थक होगा.

2. राम जन्मभूमि के 2.7744 एकड़ समेत पूरे परिसर की 67.703 एकड़ भूमि का स्वामित्व केन्द्र की सरकार के पास है. इसके लिए संसद ने 1993 में कानून बनाया था, जिसको सर्वोच्च न्यायालय ने 1994 के फैसले से मान्यता भी दे दी है. जब भारत सरकार इस भूमि की मालिक है तो फिर इसके लिए नये अध्यादेश या कानून की आवश्यकता नहीं है. तत्कालीन नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार द्वारा बनाये गये उपरोक्त कानून में भूमि के इस्तेमाल पर लगाई गई पाबंदियों पर सर्वोच्च न्यायालय ने मुहर लगा दी, जिसकी वजह से मन्दिर निर्माण में संवैधानिक अड़चनें आ रही हैं.

3. अदालतों के साथ सभी पक्ष भी सहमत हैं कि यह भूमि की मिल्कियत का विवाद है, तो फिर इसका त्वरित निबटारा क्यों नहीं किया जा रहा? संसद द्वारा 1993 में बनाये गये कानून के अनुसार केन्द्र सरकार के पास राम-जन्मभूमि परिसर की संपूर्ण भूमि का स्वामित्व है, तो फिर इन मुकदमों में केन्द्र सरकार औपचारिक पक्षकार क्यों नहीं है? इलाहाबाद उच्च न्यायालय की कार्यवाही के अवलोकन से यह ज्ञात होता है कि केन्द्र सरकार को मुकदमे में पार्टी बनाने के लिए सुनवाई हुई थी. तत्कालीन नरसिंहा राव सरकार द्वारा इस मामले से बचने के कारण उच्च न्यायालय ने मई, 1995 के आदेश से केन्द्र सरकार को मुकदमे में औपचारिक पक्ष नहीं बनाया. भाजपा ने अपने घोषणा-पत्र में राम मन्दिर निर्माण की बात कही है तो फिर केन्द्र सरकार को इस मामले में औपचारिक पक्षकार बनकर अपना पूरा पक्ष क्यों नहीं प्रस्तुत करना चाहिए. सिविल प्रोसिजर कोड कानून के तहत जमीन की मिल्कियत के मुकदमे में भू-स्वामी को पक्षकार होना जरूरी है, तो फिर इस मुकदमे में केन्द्र सरकार पार्टी बनकर राम मन्दिर निर्माण का मार्ग क्यों नहीं प्रशस्त करती? इस मामले में केन्द्र सरकार द्वारा निम्न बिन्दुओं पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख विस्तार से अपना पक्ष रखा जा सकता है:

  • बाबरी ढांचे के बावजूद गर्भ-गृह का स्थान सदैव रामलला का ही रहा है. राजकाज की दृष्टि से बादशाह होने के नाते सन् 1528 में बाबर के पास यदि इस भूमि की मिल्कियत आ भी गई तो आज की चुनी हुयी सरकारें अब अयोध्या में उस भूमि की मालिक हैं. यह बात संसद के 1993 के कानून से भी स्पष्ट है जिसको माननीय सर्वोच्च न्यायालय की 1994 में स्वीकृति मिल चुकी है.
  • बाबरी ढांचे के ध्वस्त होने का मामला जमीन के विवाद से पूरी तरह से अलग है. उस मामले में कार सेवकों और अनेक नेताओं के खिलाफ लखनऊ की अदालत में आपराधिक मुकदमों में ट्रायल चल रहा है. हजारों गवाह वाले मामलों के अप्रैल, 2019 तक समयबद्ध निस्तारण हेतु सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया है, तो फिर जमीन के मामले पर भी रोजाना सुनवाई करके त्वरित फैसला होना चाहिए.
  • संविधान के अनुसार सरकार, संसद और न्यायपालिका का कार्यक्षेत्र पूर्णतः विभाजित है. सरकार ने जब संसद के कानून के माध्यम से भूमि का अधिग्रहण कर लिया है तो फिर उस पर न्यायपालिका का हस्तक्षेप कैसे संभव है?

4. देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारों को हर पांच साल में जनता के पास चुनाव के लिए जाना पड़ता है. सरकारी नौकरी के लिए युवाओं को कठिन परीक्षा के अनेक दौरों से गुजरना पड़ता है. लेकिन जज बनने के लिए कोई भी पारदर्शी प्रक्रिया नहीं है. जजों द्वारा अपने परिचित दायरे में से ही नये जजों को नियुक्त करने की कोलेजियम प्रणाली की सर्वोच्च न्यायालय के पांच जजों ने 2015 में सख्त आलोचना की थी. न्यायिक व्यवस्था में आम जनता के प्रति जवाबदेही नहीं होने के साथ आभिजात्य एजेंडे को आगे बढ़ाया जाता है. देश में तीन करोड़ मुकदमों से 25 करोड़ आबादी पीड़ित है. आम जनता को राहत देने के बजाय न्यायपालिका में व्यभिचार, समलैंगिकता और सबरीमला जैसे मामलों को वरीयता मिलती है. सवाल यह है कि अनेक मामलों पर आधी रात को सुनवाई करने वाली उच्चतम न्यायालय के लिए अयोध्या का मामला सर्वोपरि क्यों नहीं है? जजों की नियुक्ति प्रणाली में पारदर्शिता और सुधार के लिए मैंने सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी लगाने के साथ केन्द्र सरकार को भी प्रतिवेदन दिया था, जिसपर अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई. देश के युवाओं में योग्यता की कोई कमी नहीं है. जजों की नियुक्ति में नेटवर्किंग की बजाय यदि योग्यता और ईमानदारी को प्राथमिकता मिले तो देश में न्यायिक क्रांति संभव है. इससे आम लोगों को जल्द न्याय के साथ अयोध्या जैसे मामलों का भी त्वरित निबटारा संभव हो सकेगा.

5. रामलला का मामला पिछली दो शताब्दियों से विभिन्न अदालतों की ठोकर खाते हुए विश्व के सबसे पुराने मुकदमों में शामिल हो गया है. आजादी के बाद संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत लोगों को जल्द न्याय का मौलिक अधिकार है. देश की अदालतों में गीता की सर्वोच्चता के बावजूद, आराध्य राम को जल्द न्याय क्यों नहीं मिल रहा? उच्चतम न्यायालय द्वारा इस मामले की सुनवाई अब अगले वर्ष जनवरी 2019 के बाद ही संभव हो पाएगी. इलाहाबाद हाईकोर्ट के अक्टूबर, 2010 के 8000 पेज से लम्बे फैसले के विरूद्ध अपील में सर्वोच्च न्यायालय ने मई, 2011 में मुकदमे के हजारों-लाखों दस्तावेज मंगाये. हाईकोर्ट से दस्तावेजों को सर्वोच्च न्यायालय आने में तीन साल लग गये. उसके बाद इस मामले की सुनवाई कई साल तक टलती रही क्योंकि हजारों पेज का अंग्रेजी में अनुवाद नहीं हुआ था. हालिया विधानसभा चुनावों में जीत हासिल करने के लिए सभी पार्टी के नेता मन्दिरों में माथा टेक रहे हैं, परन्तु राम मन्दिर के दस्तावेजों के अनुवाद की प्राथमिकता राजनेताओं के लिए क्यों नहीं है? राष्ट्रीय महत्व के इस मसले को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा टालने पर हाय-तौबा मचाई जा रही है लेकिन जब केन्द्र सरकार इस मामले में औपचारिक पक्षकार ही नहीं बनी तो फिर वकीलों के दांव-पेंच को कौन संभालेगा?

जनवरी, 2019 में सर्वोच्च न्यायालय की बेंच यदि अयोध्या मामले की सुनवाई शुरू भी कर दे तो सुनवाई, फैसला, पुर्नविचार याचिका और फिर क्यूरेटिव याचिका के अनेक दौर में कई साल लग सकते हैं. प्राइवेसी, आधार, सबरीमाला जैसे मामलों की तर्ज पर यदि अयोध्या मामले के लिए भी संविधान पीठ की मांग उठी तो फिर नये सिरे से सुनवाई करनी होगी. सर्वोच्च न्यायालय ने यदि अपने फैसले से मामले को फिर से इलाहाबाद हाईकोर्ट के पास पुर्नविचार के लिए भेज दिया तो यह मामला दसों साल के लिए फिर से ठंडे बस्ते में चला जाएगा. नये मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने लम्बित मामलों पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि न्याय के लिए लोगों की पीढ़ियां गुजर जाती हैं, इसके बावजूद उनके कार्यकाल में अयोध्या मामले पर न्यायिक विलम्ब दुर्भाग्यपूर्ण है.

6. अयोध्या मामले में भी पुराने स्थगन या यथा-स्थिति के आदेशों को निरस्त करने के लिए उच्चतम न्यायालय यदि स्वतः पहल नहीं करता तो उन्हें निरस्त करने के लिए सरकार को 1993 के कानून में संशोधन करने का पूरा अधिकार है. संवैधानिक प्रावधानों और 1994 के बोम्मई मामले की दुहाई देते हुए यह भी कहा जा रहा है कि धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में सरकार द्वारा मन्दिर निर्माण के लिए भूमि नहीं दी जा सकती. धर्मनिरपेक्षता के बारे में संविधान में प्रावधानों को आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा शामिल किया गया था. देश के संविधान में महात्मा गांधी और डॉ. भीम राव अम्बेडकर की विशेष छाप है. संविधान की मूल प्रस्तावना और नीति निर्देशक सिद्धान्तों में कल्याणकारी राज्य की संकल्पना महात्मा गांधी के रामराज्य का ही विस्तार है. महात्मा गांधी सदैव ही रामराज्य के पक्षधर रहे हैं तो फिर अयोध्या में राम मन्दिर के निर्माण से धर्मनिरपेक्षता के उसूलों का उल्लंघन कैसे होगा? लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की अपेक्षाओं को साकार करने के लिए संविधान एक कानूनी दस्तावेज है. भारत में लोग जन्म से लेकर मृत्यु तक राम नाम से बंधे हैं तो फिर राम लला के मन्दिर का निर्माण असंवैधानिक कैसे हो सकता है?

7. संसद द्वारा 1993 में बनाये गये कानून के अनुसार 67.703 एकड़ भूमि की मालिक केन्द्र सरकार को गलत अदालती आदेश की वजह से रिसीवर माना जा रहा है. सरकार जब भूमि की मालिक है तो फिर उसी जमीन को दुबारा कैसे अधिग्रहीत किया जा सकता है. राज्य सभा में निजी बिल यदि पेश हुआ तो उस पर सहमति ही नहीं बन पाएगी. इस मामले के समाधान के नाम पर संसद में नये कानून की पहल से राम मन्दिर का मामला और पेंचीदा हो जाएगा. तीन तलाक जैसे मामलों पर सरकार ने अध्यादेश जारी किया है तो फिर जनादेश के अनुसार 1993 के कानून में संशोधन के लिए केन्द्र सरकार तुरन्त अध्यादेश जारी करके राम मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करे.

सर्वोच्च न्यायालय के 13 जजों की पीठ ने केशवानन्द भारती मामले में सरकार, संसद और न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र और अधिकारों की व्याख्या की थी. अयोध्या में भूमि अधिग्रहण का मामला राज्य और केन्द्र सरकार के दायरे में आता है और संसद द्वारा 1993 में पारित कानून को सर्वोच्च न्यायालय की सहमति मिल चुकी है. अदालती आदेशों और बंधनों से मुक्त होकर सोमनाथ मन्दिर की तर्ज पर सरकार इस भूमि को सौंपे, जिससे ‘‘स्टेच्यू आॅफ यूनिटी’’ की तर्ज पर रामलला के विशालतम मन्दिर का निर्माण हो सके. सरकारी टाल-मटोल और न्यायपालिका द्वारा बेवजह हस्तक्षेप के अनेक अध्यायों का समापन करके अब अयोध्या में रामलला के मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो, तभी दिवाली में सही रोशनी होगी.