महाराष्ट्र के यवतमाल में एक बाघिन ‘अवनी’ को मार गिराए जाने का मामला राज्य की देवेंद्र फडणवीस सरकार के लिए सिरदर्द बन गया है. अवनी को मारे जाने की वजह उसका ‘आदमख़ोर’ होना बताया गया है. ख़बरों के मुताबिक़ पांच साल की अवनी ने कथित रूप से जिले के पांढरकवडा गांव और उसके आसपास कुल 13 लोगों पर हमलाकर उनकी जान ले ली थी. कुछ रिपोर्टों में बताया गया है कि अवनी की दहशत इतनी थी कि उसके मरने पर गांव के लोगों ने जश्न मनाया और मिठाइयां बांटीं.

वहीं सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं और कुछ अन्य मीडिया रिपोर्टों पर ग़ौर करें तो पता चलता है कि इस बाघिन के मरने से पांढरकवडा गांव के लोगों से लेकर केंद्र सरकार में मंत्री मेनका गांधी तक ख़ुश नहीं हैं. केंद्रीय मंत्री ने तो इस मामले को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के सामने उठाने और बाघिन की मौत के लिए ज़िम्मेदार बताए जा रहे वन मंत्री सुधीर मनगुंटीवार को बर्खास्त करने की मांग भी की है. वहीं, जानवरों के संरक्षण के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं और अवनी को बचाने की कोशिश में लगे लोगों को उसकी मौत से सदमा लगा है. इन सभी ने राज्य सरकार और वन विभाग की तीखी आलोचना की है.

एक ‘आदमख़ोर’ बाघिन के मरने पर इतना विवाद हुआ तो इसकी वजह वे परिस्थितियां जिनमें उसे मारा गया. अवनी को मारने का आदेश ख़ुद महाराष्ट्र के प्रधान मुख्य वनसंरक्षक (पीसीसीएफ) तथा मुख्य वन्यजीव संरक्षक ने दिया था जिसे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने कुछ निर्देशों के साथ क़ायम रखा था. लेकिन जिन हालात में उसे गोली मारी गई उसे लेकर कई सवाल उठ रहे हैं.

‘बाघिन ने अभियान दल पर हमला किया था’

अवनी को तीन नवंबर की रात को मारा गया था. उसे जाने-माने, लेकिन विवादित शूटर नवाब शफ़ात अली ख़ान के बेटे असगर अली ख़ान ने निशाना बनाया था. इन दोनों पिता-पुत्र का दावा है कि बेहोशी का इंजेक्शन दागे जाने पर अवनी ने वनकर्मियों की टीम पर हमला कर दिया था. असगर अली के मुताबिक अवनी की मौत का विरोध कर रहे लोग नहीं जानते कि किन हालात में बाघिन को मारना पड़ा. उन्होंने बताया है कि अवनी को बेहोश करना संभव नहीं था क्योंकि वह घनी झाड़ियों में छिपी हुई थी और विजिबिलिटी इतनी नहीं थी कि उसे साफ़ देखा जा सके. असगर की दलील है कि अचानक हुए हमले में उनके पास गोली चलाने के अलावा और कोई चारा नहीं था.

शफ़ात अली विवादित शिकारी हैं

वन्य विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं को शफ़ात अली और असगर अली की इस बात पर यक़ीन नहीं है. उनका आरोप है कि शफ़ात अली को इस तलाशी अभियान में शामिल ही अवनी को मारने के लिए किया गया था. शफ़ात अली निजी तौर पर जानवरों का शिकार करते रहे हैं और इस मामले में उनके विचार पहले भी विवाद खड़े कर चुके हैं. वहीं अवनी को पकड़ने के लिए उन्हें बुलाए जाने पर मेनका गांधी शुरू से ऐतराज़ जता रही थीं. इसके चलते बीते सितंबर में महाराष्ट्र सरकार ने शफ़ात को वापस जाने को भी कह दिया था.

इस पूरे घटनाक्रम में मिड-डे अख़बार की रिपोर्टें ग़ौर करने वाली हैं. अखबार की 21 सितंबर की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ शफ़ात को इसलिए वापस जाने को कहा गया था कि क्योंकि अवनी के मामले में राज्य सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ता जा रहा था. हालांकि इस रिपोर्ट में एक वन अधिकारी के हवाले से जानकारी दी गई थी कि शफ़ात को वापस बुलाया जाएगा. और बाद में यह जानकारी सही साबित हुई.

उससे पहले 18 सितंबर को इसी अख़बार ने बताया था कि शफ़ात यवतमाल की बाघिन को ‘आतंकी’ और ‘हत्यारी’ मानते थे. शफ़ात ने अख़बार को दिए इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें जानवरों को मारना अच्छा नहीं लगता लेकिन, शवों के साथ पोज़ देने में उन्हें कोई समस्या नहीं है. इस इंटरव्यू में उन्होंने यहां तक कहा कि ‘बड़ी बिल्लियां’ (यानी शेर) और इंसान एक साथ नहीं रह सकते. बाघों को ख़त्म होने से बचाने के लिए भले ही गैर-सरकारी संगठनों ने मुहिम छेड़ी हुई है, लेकिन शफ़ात का कहना था कि वह दिन दूर नहीं जब बंगाल में बढ़ते बाघों की संख्या को कम करने की ज़रूरत पड़ेगी. शफ़ात की ये बातें कार्यकर्ताओं के इस दावे को बल देती हैं कि सरकार उन्हें अवनी को मारने के लिए ही लाई थी.

‘अवनी ‘आदमख़ोर’ नहीं थी’

कार्यकर्ताओं का कहना है कि अवनी की मौत को लेकर कहानी गढ़ी गई है. उनका आरोप है कि सरकार अवनी को मारना ही चाहती थी जिसके लिए पहले बाघिन को ‘आदमख़ोर’ घोषित किया गया और बाद में उसे मारने के पीछे ‘परिस्थितियों’ को वजह बताया गया. इन लोगों का कहना है कि अवनी आदमख़ोर नहीं थी और वन विभाग के पास इस बात के ठोस सबूत नहीं हैं कि 13 लोगों की मौतों के लिए वही ज़िम्मेदार थी.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने भी अपनी एक रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से बताया है कि परीक्षण के बाद यह साबित नहीं हो सका कि अवनी के हमले से ही इन लोगों की मौत हुई. वहीं, बाघिन को बचाने के लिए एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील आनंद ग्रोवर ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि अगर बाघ जंगल में घुसे इंसानों का शिकार करता है, तो उसे आदमख़ोर नहीं कहा जा सकता.

अवनी को मारने में नियमों का ‘उल्लंघन’ हुआ

रिपोर्टों के मुताबिक़ सुप्रीम कोर्ट का निर्देश था कि मारने से पहले अवनी को बेहोश करने वाला इंजेक्शन दिया जाए. कोर्ट ने कहा था कि पहले बाघिन को पकड़ा जाए और फिर गोली मारी जाए. सर्वोच्च अदालत का यह भी निर्देश था कि बाघिन को मारने से पहले उसके दस महीने के दोनों बच्चों को क़ब्जे में लिया जाए, क्योंकि अवनी की मौत के बाद उनका जंगल में जी पाना संभव नहीं होगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और अब मां के मरने के बाद इन बच्चों की जान भी ख़तरे में पड़ गई है. फ़िलहाल वन विभाग उन्हें ढूंढ रहा है. कहा जा रहा है कि अगर वे ज़्यादा दिनों तक नहीं मिले तो शायद मृत ही मिलें.

जेरिल ए बनाइट वन्य जीवन पर काम करने वाले कार्यकर्ता हैं. अवनी के मामले में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी. जेरिल का दावा है कि अवनी को मारने में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के नियमों का घोर उल्लंघन हुआ है. जेरिल कहते हैं, ‘पहली बात तो यही है कि इस तरह के अभियान केवल उजाले में चलाए जाते हैं. वहीं एनटीसीए के नियमों के विपरीत अवनी की हत्या के समय कोई पशुचिकित्सक मौके पर मौजूद नहीं था, न ही वहां पुलिस थी. अवनी जैसे किसी विशेष बाघ की बात छोड़ भी दें, तो इतनी रात में किसी बाघ की लैंगिक पहचान भी मुश्किल है.’

घटना के समय पशुचिकित्सक टीम के साथ नहीं थे

प्रेसरीडर.कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ सूत्रों ने इस बात की पुष्टि की है कि अवनी को पकड़ने के लिए जो टीम बनाई गई थी, उसमें शामिल पशुचिकित्सक घटना वाले दिन शाम को 6.30 बजे के बाद अपने घर लौट गए थे. अवनी को बेहोश करने के लिए दी जाने वाली दवाई का डोज़ कितना रखा जाए, यह उनकी मौजूदगी में तय होना था. लेकिन नवाब शफ़ात अली ख़ान और उनके बेटे असगर अली ने अवनी को ढूंढने का काम पशुचिकित्सकों के बिना ही जारी रखा. तीन नवंबर की रात वे एक खुले गश्ती वाहन में कुछ अन्य वन्यकर्मियों के साथ उसकी तलाश में निकले थे. बाद में देर रात को वन विभाग को ख़बर मिली अवनी को मार गिराया गया है.

पशुचिकित्सा विशेषज्ञ और अवनी को पकड़ने के अभियान का हिस्सा रहे डॉ एचएस प्रयाग ने भी मिड-डे से बातचीत में कहा है, ‘यह अभियान सुप्रीम कोर्ट और एनटीसीएस के नियमों का उल्लंघन है. अगर अवनी टीम पर झपटी भी थी तो असगर हवा में फ़ायरिंग कर सकते थे. बाघ आम तौर पर झपट्टा मारकर भाग जाते हैं और दोबारा हमले नहीं करते. मेरे अनुभव के मुताबिक एक भी बाघ ने कभी इस तरह हमला नहीं किया.’

अवनी की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट क्या कहती है?

अवनी की मौत को लेकर जारी हंगामे के बीच एक जानकारी असगर अली की मुश्किलें बढ़ा सकती है. इस बाघिन के पोस्टमॉर्टम की जानकारी रखने वाले सूत्रों ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया है कि गोली अवनी के शरीर के बाएं हिस्से में लगी थी. यह बात असगर अली के दावे पर सवाल खड़ा करती है. उनका कहना था कि अवनी ने बेहोशी का इंजेक्शन लगने के बाद सीधे हमला कर दिया था. वहीं, रिपोर्ट के हवाले से एक विशेषज्ञ का कहना है, ‘बाघिन ने जब हमला किया तो यह सामने से किया गया हमला होना चाहिए. इस हिसाब से गोली सिर, कंधे या सीने पर लगनी चाहिए थी, लेकिन यह बाएं हिस्से से होती हुई दाएं हिस्से निकल गई. इससे साफ़ है कि गोली सामने से नहीं बल्कि बाईं तरफ़ से चलाई गई. लगता है ऐसा मारने के इरादे से ही किया गया था.’

अवनी की हत्या के लिए सरकार और कॉर्पोरेट भी ज़िम्मेदार

बाघिन अवनी की मौत का यह मामला सरकार और कॉर्पोरेट के गठजोड़ तक जाता है. विकास के नाम पर जंगलों का अतिक्रमण बाघ और इंसान के बीच चल रहे संघर्ष का एक प्रमुख कारण है. सरकारें बाघों को तो आदमख़ोर घोषित कर देती हैं, लेकिन जंगलों में बढ़ते इंसानी दख़ल को रोकने का काम वे नहीं करतीं. वहीं दूसरी तरफ कॉर्पोरेट को जंगल की ज़मीनें दी जा रही हैं. अवनी का मामला भी इससे जुड़ा हुआ है. एक तरफ़ जहां महाराष्ट्र सरकार उसे पकड़ने के लिए शिकारियों को भेज रही थी, वहीं दूसरी तरफ़ वह यवतमाल का 467 हेक्टेयर का ऐसा वनीय इलाक़ा पहले ही अनिल अंबानी की रिलायंस कंपनी को दे चुकी थी जहां बाघ रहते हैं.

कुछ रिपोर्टों के मुताबिक़ रिलायंस को वहां एक सीमेंट प्लांट लगाने के लिए ज़मीन दी गई है. साल 2009 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने रिलायंस को ज़मीन देने का काम शुरू किया था जिसे मौजूदा सरकार ने इस साल जनवरी में पूरा कर दिया. इसके लिए राज्य सरकार ने एक विशेषज्ञ समिति की सर्वेक्षण रिपोर्ट की भी अनदेखी की जिसमें जंगल की ज़मीन कॉर्पोरेट को देने का विरोध किया गया था. वहीं, एक और रिपोर्ट में बताया गया था कि जिस इलाक़े में रिलायंस को ज़मीन दी गई है वहां एक बाघिन बच्चों के साथ रहती है.