लेखक-निर्देशक : विजय कृष्णा आचार्य

कलाकार : अमिताभ बच्चन, आमिर खान, कैटरीना कैफ, फातिमा सना शेख, लॉयड ओवन, मोहम्मद जीशान अय्यूब, रोनित रॉय

रेटिंग : 1/5

बंदनवार बांधकर अस्सी के फिल्मी दशक का स्वागत कीजिए! इस दीवाली जिस फिल्म को आपके माथे पर मढ़ा गया है वह हिंदी फिल्म इतिहास के सबसे बुरे दौर में गिने जाने वाले अस्सी व (कुछ-कुछ) नब्बे के दशक की खराब फिल्मों को ही श्रद्धांजलि है. नाम है – ठग्स ऑफ बॉलीवुड. आई मीन टू से, ‘ठग्स ऑफ हिंदोस्तान’!

बहुत कयास लगाए जा रहे थे कि आमिर खान और अमिताभ बच्चन कृत यह फिल्म फिलिप टेलर के लिखे सत्य घटनाओं पर आधारित उपन्यास ‘कन्फेशन्स ऑफ अ ठग’ पर आधारित होगी. लेकिन हमारा बॉलीवुड इत्ता बुद्धू थोड़े न है कि अपने 500-600 करोड़ रुपए एक दमदार और पहले कभी न कही गई कहानी पर लगा दे. एक था राजा एक थी रानी, दोनों अंग्रेजों के हाथों मारे गए लेकिन जिंदा बच गई उनकी बेटी ने खुदाबख्श की मदद लेकर अंग्रेजों का सफाया किया और इस लड़ाई में फिरंगी मल्लाह नाम के ठग ने उनका साथ दिया. ऑब्वियसली, बॉलीवुड इसी कहानी पर तो पैसा लगाएगा!

तो जनाब, बॉलीवुड ने बहुत पैसा लगाया और दो पंक्तियों की जिस कहानी को हमने ऊपर एक पंक्ति में सिमटा दिया, उसे पौने तीन घंटे की फिल्म बनाकर हमें दिखाया. (पटाखे फोड़ने की मियाद दो घंटे करने के बाद सुप्रीम कोर्ट को अब यह आदेश भी निकाल देना चाहिए कि सिनेमा को प्रदूषित करने वाली फिल्मों की अवधि दो घंटे से ज्यादा नहीं होनी चाहिए!).

बॉलीवुड यहीं नहीं रुका, उसने दीवाली की खुशियों के सिमट जाने का भी इंतजार नहीं किया, और इन ‘तीन में पंद्रह कम’ घंटों में घनघोर तरीके से अस्सी-नब्बे के दशक की खराब पीरियड फिल्मों के नाम खुद को समर्पित कर दिया. ‘क्रांति’ याद है न आपको? मनोज कुमार, दिलीप कुमार, शशि कपूर, शत्रुघ्न सिन्हा और हेमा मालिनी की 1981 में आई सो-कॉल्ड हिस्टॉरिकल ड्रामा फिल्म. इसमें बरसों की गुलामी के खिलाफ अंग्रेजों से लड़ते वक्त इन नायकों ने अति के मेलोड्रामा का सहारा लेकर दर्शकों को खराब सिनेमा का गुलाम बनाया था. ‘चना जोर गरम’ गाते हुए मनोज कुमार व दिलीप कुमार को फांसी से बचाया था और ‘जिंदगी की न टूटे लड़ी’ नामक गीत में बंधी हुईं हेमा मालिनी को तैरते जहाज में इधर से उधर लुढ़काया था! कुछ इसी स्तर की बेवकूफाना है ठग्स ऑफ बॉलीवुड. आई मीन टू से, ‘ठग्स ऑफ हिंदोस्तान’!

इस फिल्म में एक बाज हमेशा बच्चन के किरदार का साथी ऐसे बना रहता है जैसे कि वो कोई जीपीएस इंडिकेटर हो. कुछ मुख्य अंग्रेज किरदार ऐसी हिंदी में बात करते हैं जैसे ‘लगान’ के मशहूर हो जाने के बाद कई पैरोडी कार्यक्रमों में दोयम दर्जे के गोरे अदाकार हंसी-ठिठोली करते हुए ‘हम तुमसे दुगना लगान वसूल करेगा’ बोलते हुए पाए जाते रहे हैं.

एक सीन में कारखाने के अंदर रखा एक विशालकाय जहाज बच्चन के नायकत्व के प्रभाव में इतना ज्यादा फिसलना शुरू कर देता है कि कारखाने के दरवाजे के बाहर खड़े अंग्रेजों को ही नहीं गिरा देता, बल्कि दूर मौजूद समंदर तक फिसल-फिसलकर पहुंच जाता है! एक मुख्य फाइट सीन में बच्चन और उनकी सेना एक रावण के अंदर छिपकर खड़ी हो जाती है (क्योंकि निर्देशक को ‘ट्रॉय’ नामक फिल्म से प्यार जो ठहरा!) और पहले एक विशालकाय मूर्ति बनने के बनिस्बत यह किया-धरा इस बार क्यों किया गया, समझ नहीं आता.

यही नहीं, ठग्स ऑफ हिंदुस्तान तकरीबन हर फाइट सीक्वेंस अस्सी के दशक की पीरियड फिल्मों वाली समझ लिए हुए है. जहाज और किले वगैरह के विशाल सेट बनाकर उन्हें नयनाभिराम दिखाने की कोशिश काफी की जाती है, लेकिन जब अस्सी के दशक की फिल्मों की तरह अब भी मुख्य सितारों के डुप्लीकेट्स ही ज्यादातर फाइट सीन में उपयोग हों, तो यह कामचोरी आसानी से नजर आती है और बहुत कोफ्त पैदा करती है.

फिर, फिल्म में इतने लंबे-लंबे मोटिवेशनल संवाद हैं कि लगता है जैसे शिव खेड़ा अपनी किताबों के साथ इस फिल्म के सेट पर बतौर संवाद-लेखक मौजूद रहे होंगे. बच्चन साहब अपनी सत्तर और अस्सी के दशक की एक्टिंग स्टाइल में ही इन भारी-भरकम संवादों को बोलते हैं और कहना नहीं चाहिए, लेकिन बेहद साधारण और घिसे-पिटे लगते हैं. वहीं इमोशनल दृश्यों वाला पार्श्व संगीत ऐसा है कि हर पल रोने को तैयार रहता है. करण जौहर की ‘कभी खुशी कभी गम’ में जया बच्चन के किरदार के इमोशनल होने पर ‘आआआआ....’ कम बार बजा होगा, ‘ठग्स ऑफ…’ में बच्चन, फातिमा और खान साहब के इमोशनल होने पर इसी मिजाज के दूसरे भी अक्षरों का कोरस गान ज्यादा बार सुनाई देता है. बेहद तकलीफदेह!

कैटरीना कैफ फिल्म में सिर्फ दो-तीन बार नाचने-गाने के लिए आती हैं और फिल्म के पोस्टर में उनको अहम तौर पर आमिर व बच्चन के साथ दिखाया जाना उनकी यूनिवर्सल खूबसूरती का दस्तावेज है. वे ज्यादातर गानों में बेअसर नृत्य करती हैं और ‘सुरैया जान लेगी क्या’ गाने में तो रामदेव की तरह पेट के करतब भी दिखाती हैं. तवायफ सुरैया के रोल में वे जब नाचने-गाने से पहले तथा बाद में बेखौफ, इश्क, ऐलान, दशहरा, सैनिक, दस्तूर जैसे (उनके लिए) मुश्किल हिंदी-उर्दू के शब्द बोलती हैं तो ख्याल आता है कि पीवीआर सिनेमा को सीट के साथ सीट-बेल्ट भी मुहैया कराना चाहिए. इन शब्दों को कैटरीना कैफ की जुबान से सुनने वाला लोटपोट होकर सीट से गिर भी सकता है!

फातिमा सना शेख को भी ‘ठग्स ऑफ…’ में नहीं होना था क्योंकि एक मजबूत योद्धा की भूमिका लायक न उनकी बॉडी लेंग्वेज फिल्म में थी और न ही संवाद अदायगी से आत्मविश्वास टपकता हुआ कहीं दिखा. उनकी छुई-मुई खूबसूरती ‘दंगल’ में उनके बेहतरीन किरदार के आड़े नहीं आई थी, लेकिन यहां निर्देशक की उन पर नहीं की गई मेहनत आसानी से आड़े आई. अपनी विद्रोही सेना को एक बार लंबी प्रेरणादायक स्पीच देते वक्त तो उनका बोलना इस कदर हास्यास्पद था कि अगर कोई कुशल निर्देशक आंखों पर पट्टी बांधकर भी एडिट मशीन पर एडिटर संग बैठता तो वो इस सीन को केवल सुनकर फिल्म से डिलीट कर देता.

खुदाबख्श बनकर अमिताभ बच्चन भी भरपूर निराश करते हैं और तमाम एक्शन करने व सिग्नेचर स्टाइल में संवाद बोलने के बावजूद कभी भी किसी भी सीन में दिल नहीं छू पाते. उनकी ‘अजूबा’ से लेकर ‘एकलव्य’ तक याद आती है और शायद अब वक्त आ गया है कि वे अपनी दोहाराई जा चुकी भूमिकाओं को दोबारा व तिबारा दोहराना छोड़ दें. या फिर बेहतर पटकथाओं का चुनाव करें.

फिलिप टेलर का उपन्यास ‘कन्फेशन्स ऑफ अ ठग’ अगर आपने थोड़ा भी पढ़ा है, तो ‘ठग्स ऑफ…’ में आमिर खान को देखते वक्त आप आसानी से अनुमान लगा लेंगे कि यह बंदा उस उपन्यास के मुख्य किरदार क्रूर ठग ‘अमीर अली’ पर गजब फबता. आमिर खान ‘ठग्स ऑफ…’के अपने किरदार फिरंगी मल्लाह को कई शेड्स देते हैं जो कि सकरात्मक किरदार से लेकर नकारात्मक किरदार के बीच के सभी शेड़्स कहलाएंगे. यह करना आसान नहीं होता क्योंकि किसी ऐय्यार किरदार को प्ले करते वक्त सच और झूठ के बीच भ्रम पैदा करना बहुत मुश्किल काम है. किताब अनुसार अगर फिल्म बनती तो आमिर खान बेहद सुघड़ता से अपने को इस जोकरनुमा लेकिन बेहद क्रूर किरदार में ढाल लेते और दर्शकों को भी बहुत मजा आता. लेकिन ऐसा नायक जो केवल राहगीरों को लूटता ही नहीं बल्कि सैकड़ों निर्दोषों को मार चुका था (किताब अनुसार अमीर अली ने 719 राहगीरों को मारा था) और जिसने कभी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत नहीं की थी, बॉलीवुड के लिए बेहद रिस्की नायक कहलाता!

इसलिए निर्देशक विजय कृष्णा आचार्य ने उन्हें मसखरा ठग दिखाना ही सही समझा, जो कि बॉलीवुड के सही-सच्चे नायक के खांचे में एकदम फिट बैठता है. इस तरह आमिर खान को वैसा वाला अभिनय करना पड़ा जिसकी झलक हम ‘मेला’, ‘राजा हिंदुस्तानी’, ‘मंगल पांडे’ जैसी फिल्मों में देख चुके हैं और जो ‘दंगल’, ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ व ‘पीके’ से बहुत दूर का अभिनय है. मेलोड्रामा की हाई डोज वाला अभिनय, जो कि दर्शनीय जरूर है – इतना कि उनकी ही वजह से यह अझेल फिल्म अंत तक झिल जाए – लेकिन प्रभावी व यादगार नहीं.

‘ठग्स ऑफ हिंदोस्तान’ जरूर देखिए, अगर दीवाली पर आपको ऐसी ‘ठग’ गुझिया का स्वाद लेना पसंद हो जिसमें मावा-काजू-किशमिश-चिरौंजी नहीं, बल्कि उबले हुए आलू भरे हों!