सोमवार को हैदराबाद में एक चुनावी रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेलंगाना में सत्ताधारी टीआरएस और विपक्षी कांग्रेस पर तीखा हमला बोला. प्रधानमंत्री ने कहा कि एक-दूसरे के खिलाफ लड़ रही ये दोनों पार्टियां एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. उनका यह भी कहना था कि कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस ने एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने के बाद सरकार बनाने के लिए हाथ मिला लिया था और तेलंगाना में भी वही होगा. प्रधानमंत्री ने कहा कि इसलिए राज्य के लोगों को भाजपा को वोट देना चाहिए.

केंद्र की सत्ताधारी भाजपा की ओर से वैसे तो यह दावा किया जा रहा है कि तेलंगाना विधानसभा चुनावों में उसे इतनी सीटें मिलेंगी कि वह सरकार बना सके. लेकिन जानकारों की मानें तो ये दावे चुनावों से पहले किए जाने वाले दावों की तरह हैं जिनका जमीनी सियासी हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है. तेलंगाना में सात दिसंबर को वोटिंग होगी.

दरअसल, तेलंगाना में भाजपा पारंपरिक तौर पर कोई बड़ी ताकत नहीं रही है. जब यह आंध्र प्रदेश का हिस्सा था तो उस दौर में भी इस क्षेत्र के कुछ नेता भाजपा के शीर्ष पदों तक पहुंचे, लेकिन प्रदेश की राजनीति में पार्टी की बहुत मजबूत स्थिति नहीं रही. लेकिन जब 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा सरकार बनी तो उसके बाद उसके लिए गैरपारंपरिक माने जाने वाले कई राज्यों में पार्टी को कामयाबी मिली. इसी उम्मीद के तहत भाजपा तेलंगाना में भी काफी सक्रिय हुई.

तेलंगाना चुनावों की तैयारी भाजपा लंबे समय से कर रही है. भाजपा के पक्ष में इस राज्य में माहौल बनाने के लिए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और उसमें भी खास तौर पर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने लगातार प्रयास किए हैं. वे हाल के समय में कई बार तेलंगाना जाकर चुनावी सभाएं संबोधित कर चुके हैं. पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने के मकसद से वहां हाल में भारतीय जनता युवा मोर्चा की ओर से भी एक बड़ा कार्यक्रम किया गया जिसमें अमित शाह समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए.

इन कोशिशों के बीच तेलंगाना में सक्रिय भाजपा नेताओं से बातचीत करने पर दूसरी ही कहानी मालूम पड़ती है. दरअसल, तेलंगाना में पिछले कुछ दिनों में जो राजनीतिक घटनाक्रम चला है, उसमें भाजपा के लिए विधानसभा चुनावों में कोई खास संभावना नहीं बची है. भाजपा को यह लग रहा था कि तेलंगाना विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की अगुवाई में प्रदेश में विपक्ष की प्रमुख ताकतें एकजुट नहीं होंगी. पार्टी को उम्मीद थी कि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की पार्टी तेलुगू देशम पार्टी अलग चुनाव लड़ेगी और प्रदेश की कुछ और पार्टियां भी अलग-अलग चुनाव लड़ेंगी. ऐसी स्थिति होने पर मतों का विभाजन होता और भाजपा को यह उम्मीद थी कि उसे इसका फायदा मिलता.

लेकिन ये सभी एक मंच पर आ गए हैं. ऐसे में अब तेलंगाना विधानसभा चुनाव कांग्रेस की अगुवाई वाले महागठबंधन और मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव की अगुवाई वाली तेलंगाना राष्ट्र समिति के बीच सीधे मुकाबले में तब्दील हो गया है. इससे भाजपा के लिए इन विधानसभा चुनावों में कोई खास संभावना नहीं बची है. तेलंगाना में 2014 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को सिर्फ पांच सीटें मिली थीं. राज्य की राजनीति को जानने-समझने वाले लोगों का कहना है कि अगर पार्टी अपनी ये सीटें बचाए भी रख सके तो उसके लिए यह एक बड़ी कामयाबी होगी.

दरअसल, तेलंगाना में भाजपा की एक अड़चन यह भी है कि उसे कई लोग टीआरएस की बी-टीम मानते हैं. लोगों को लगता है कि टीआरएस और भाजपा के बीच आंतरिक तौर पर कोई सांठ-गांठ है लेकिन, दोनों अपने-अपने फायदे के लिए अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं. क्योंकि अगर भाजपा साथ होती तो टीआरएस के लिए मुस्लिम मतदाताओं को अपने साथ गोलबंद करना मुश्किल होता. भाजपा को लगता है कि अकेले चुनाव लड़कर वह हिंदुत्व वाले मुद्दों पर गोलबंदी की कोशिश कर सकती है. भाजपा और टीआरएस की गुपचुप सांठ-गांठ के संदेह को उस वक्त मजबूती मिली जब टीआरएस ने शुरुआत में उन पांच सीटों पर उम्मीदवार नहीं घोषित किए जिन पर भाजपा के विधायक हैं. कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि अगर भाजपा को कुछ सीटें मिलती हैं तो चुनावों के बाद फिर से वह टीआरएस के साथ मिल सकती है.

इन स्थितियों में सवाल यह उठता है कि आखिर भाजपा इन चुनावों से क्या हासिल करना चाहती है. इस बारे में तेलंगाना में सक्रिय पार्टी के एक नेता बताते हैं, ‘तेलंगाना में हमारे पास न तो कोई मजबूत स्थानीय नेतृत्व है और न ही हर सीट पर मजबूत उम्मीदवार. कुछ सीटें तो ऐसी हैं जिन पर ठीक से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार भी नहीं हैं. हमारा मजबूत सांगठनिक ढांचा तेलंगाना में अभी बनने की प्रक्रिया में है. इसके अलावा महागठबंधन की स्थिति ने भी हमारी चुनावी संभावनाओं को खराब किया है.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘ऐसे में अब हमारी कोशिश यह है कि हम पार्टी का सांगठनिक ढांचा मजबूत करें. हर विधानसभा क्षेत्र में हमारे पास तीन-चार चुनाव लड़ने लायक लोग तैयार हो जाएं. इन विधानसभा चुनावों के जरिए हमारी कोशिश है कि हर बूथ के स्तर पर कुछ प्रतिबद्ध पार्टी कार्यकर्ता बन जाएं और पार्टी आपस में उनकी नेटवर्किंग करे.’

भाजपा को लगता है कि ऐसा करने से उसे विधानसभा चुनावों में तो तुरंत कोई खास फायदा नहीं होगा, लेकिन लोकसभा चुनावों में उसे इसका लाभ मिल सकता है क्योंकि वह चुनाव सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम और चेहरे पर होगा. अभी तेलंगाना में स्थानीय मुद्दे प्रमुख हैं. पार्टी के ये नेता कहते हैं, ‘लोकसभा चुनावों में इसमें कुछ राष्ट्रीय मुद्दे भी जुड़ेंगे. इसके अलावा लोकसभा चुनावों में दूसरे राज्यों में अगर हिंदुत्व से संबंधित मुद्दे उठते हैं तो उन्हें तेलंगाना में मजबूती से उठाने का काम तेलंगाना में भी किया जाएगा. स्वामी परिपूर्णानंद भाजपा में लाए गए हैं. इन विधानसभा चुनावों के जरिए उनकी भी एक प्रदेशव्यापी पहचान बनेगी और इसका फायदा लोकसभा चुनावों के दौरान चुनावी लाभ वाले मुद्दों को मजबूती से उठाने में मिलेगा. हमें उम्मीद है कि विधानसभा चुनावों में भाजपा की ओर से जो भी कोशिशें की जा रही हैं, उनका फायदा उठाने की स्थिति में हम एक संगठन के तौर पर लोकसभा चुनावों के दौरान रहेंगे.’