हाल ही में महिला और बाल विकास मंत्रालय ने एक रिपोर्ट जारी की है. इसके अनुसार भारत में 2014 से 2018 के बीच कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न के मामलों में 43 फीसदी का इजाफा हुआ है. यह आंकड़ा रोज औसतन दो का है.

कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न के मामले में उत्तर प्रदेश पहले स्थान पर है. सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए आकंड़ों के अनुसार पिछले चार सालों के दौरान उत्तर प्रदेश में कार्यस्थल पर उत्पीड़न के 726 मामले दर्ज किए गए. यह देश भर में दर्ज ऐसे कुल मामलों का 29 फीसदी है. इसके बाद 369 मामलों के साथ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली दूसरे स्थान पर रही. हरियाणा 171 मामलों के साथ तीसरे और 154 मामलों के साथ मध्य प्रदेश चौथे स्थान पर रहा. वहीं मेघालय और मणिपुर दो ऐसे राज्य हैं जहां 2015 से 2018 तक कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का एक भी मामला दर्ज नहीं किया गया. मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि ऐसे मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है.

ऐसे में यह हैरत की बात लगती है कि हाल में चले मी टू अभियान में किसी भी पीड़ित द्वारा वर्तमान में हुए यौन शोषण का जिक्र नहीं किया गया. इस अभियान के दौरान कुछ फिल्म अभिनेत्रियों और महिला पत्रकारों ने बॉलीवुड अभिनेताओं, निर्देशकों, संगीतकारों, गायकों, पत्रकारों, नेताओं आदि पर जो यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं वे सभी सालों पुराने हैं.

इंडियन बार काउंसिल के एक सर्वे के मुताबिक 70 प्रतिशत कामकाजी महिलाएं कार्यस्थल पर होने वाली यौन हिंसा के खिलाफ शिकायत ही दर्ज नहीं कराती हैं. यह स्थिति तब है जब 2014-2015 के दौरान इस तरह की यौन हिंसा की रिपोर्टिंग में 51 फीसदी की वृद्धि हुई है.

कामकाजी महिलाओं के यौन उत्पीड़न से जुड़े कानून के तहत 10 या उससे ज्यादा कर्मचारियों वाली किसी भी संस्था में एक इंटर्नल कंप्लेंट कमेटी यानी आईसीसी का होना जरूरी है. लेकिन कुछ समय पहले फिक्की द्वारा कराए एक शोध में सामने आया था कि 36 प्रतिशत भारतीय और 25 प्रतिशत मल्टीनेशनल कंपनियों में आईसीसी का गठन ही नहीं हुआ है.

हालांकि मी टू अभियान ने कार्यस्थल पर होने वाली यौन हिंसा को सामने लाने का एक बड़ा मंच दिया है. लेकिन बहुत सारे लोगों का आरोप और नाराजगी इस बात पर है कि मी टू अभियान के दौरान कोई भी लड़की या महिला वर्तमान यौन शोषण के खुलासे क्यों नहीं कर रही.

इसके कई कारण हैं. वर्तमान नौकरी छूटने और इसके चलते फिर किसी दूसरे ऑफिस में भी काम न मिलने का डर महिलाओं या लड़कियों द्वारा यौन शोषण की शिकायत न करने की सबसे अहम वजह है. कार्य स्थल पर हुआ यौन शोषण लड़कियों की जिंदगी का पहला यौन शोषण नहीं होता, क्योंकि उनमें से कई अपने घरों में भी इससे गुजर चुकी होती हैं. लेकिन हां, नौकरी से मिली आर्थिक आजादी का सुख वे पहली बार ले रही होती हैं. ऐसी स्थिति में वे ऐसा कोई भी निर्णय नहीं लेना चाहतीं जो न सिर्फ उनकी वर्तमान आर्थिक आत्मनिर्भरता को खत्म कर दे, बल्कि उनके भावी करियर पर भी तलवार बनकर लटक जाए. वर्तमान में हुए या हो रहे यौन शोषण का खुलासा लड़कियों के उस करियर के लिए एक बड़े जोखिम की तरह होता है जिसके लिए उन्होंने सालों इंतजार किया और अच्छा-खासा पैसा खर्च किया.

बदनामी का डर भी एक बड़ी वजह है कि महिलाएं उनके साथ हो रहे यौन शोषण के मौजूदा मामलों पर चुप रहती हैं. अधिकांश मामलों में उनका साथ देने के लिए परिवार का भी कोई सदस्य तैयार नहीं होता. उन्हें डर होता है कि ऐसे खुलासों से न सिर्फ ऑफिस बल्कि, रिश्तेदारी और समाज में भी उसकी बदनामी होगी. इसके चलते उसकी शादी में भी बड़ी दिक्कत आने की संभावना होती है. क्योंकि हमारे समाज में अभी भी ज्यादातर पुरुषों की मानसिकता ऐसी नहीं है कि वे यौन शोषण पीड़िता से विवाह या किसी भी प्रकार का सहज संबंध बनाना चाहें.

आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) के सदस्यों को सही कानूनी जानकारी न होना भी यौन हिंसा की शिकायत न करने का एक कारण दिखाई देता है. इसके साथ ही पीड़िताओं को पूरा भरोसा नहीं होता कि समिति की जांच निष्पक्ष होगी. जानकारों के मुताबिक बहुत बार ऊपर वालों के दबाव के कारण केस को हल्का कर दिया जाता है या उसे तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है. ऐसे मामलों में अक्सर ही पीड़िता को अकेली पड़ते भी देखा गया है.

यौन शोषण के मामलों पर काम करने वाली वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन का मानना है कि ऐसे ज्यादातर मामलों में पीड़िताओं को जांच समिति के निष्पक्ष जांच करने का जरा भी भरोसा नहीं होता. एक साक्षात्कार में वे बताती हैं कि कुछ महिलाओं के लिए तो यह सब इतना ज्यादा पीड़ादायक होता है, कि वे आत्महत्या तक की कोशिश करने लगती हैं. यह भी देखने में आया है कि बहुत बार पीड़िता के व्यवहार को ही उसके यौन शोषण के लिए जिम्मेदार समझा जाने लगता है.

पुराने मामलों के खुलासे के फायदे -नुकसान

मी टू अभियान के तहत यौन शोषण के सिर्फ पुराने मामलों को सामने लाने का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि महिलाओं ने खुद को यौन शोषण से जुड़ी शर्म से दूर किया है. ऐसा पहली बार हुआ है कि महिलाओं ने अपनी पहचान, नाम और चेहरा छिपाए बिना यौन शोषण के खुलासे किए हैं.

अब इज्ज़त लुटना पीड़िताओं के लिए नहीं, बल्कि दोषी के सन्दर्भ में सोचा जाने लगा है. यह भी इस अभियान का ही प्रभाव है कि यौन शोषण के आरोपितों का बहुत तरह से बहिष्कार किया जा रहा है. उन्हें अलग-अलग मंचों, प्रोजेक्ट्स आदि से हटाया जा रहा है. एमजे अकबर का ही उदाहरण लें जिन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा. फिल्म निर्माता साजिद खान का भी बहिष्कार हो गया.

बहुतों के मुताबिक इस अभियान ने पुरुषों पर ऐसा दबाव बनाने की शुरुआत की है जिससे वे कार्यस्थल पर महिलाओं को अपना सहयोगी मानें न कि अपनी दमित इच्छाओं को पूरा करने का माध्यम भर. साथ ही पुरुषों द्वारा महिलाओं के साथ अंजाने में किए जाने और असहज करने वाले व्यवहार के प्रति भी उन्हें सचेत करने का माहौल बनाया है.

यौन शोषण के पुराने खुलासों का सबसे बड़ा फायदा यह है कि उन्होंने ‘विमन फ्रेंडली सोसायटी’ बनाने की तरफ एक मजबूत कदम उठाया है...और वह भी बिना किसी महिला या लड़की के करियर पर तलवार लटकाए! इन पुराने खुलासों का नुकसान सिर्फ यही है कि सबूतों के अभाव में दोषियों को सजा मिलने के आसार कम हैं.

असल में घरों की तरह कार्यस्थल पर भी यौन शोषण हमेशा से रहा है. लेकिन पहले जहां ऐसी घटनाओं को पूरी तरह अनदेखा किया जाता था, वहीं अब इन मामलों में रिपोर्ट दर्ज होने लगी है. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले चार सालों में कार्यस्थलों पर यौन शोषण के लगभग ढाई हजार मामले दर्ज हुए हैं. समाजशास्त्रियों का कहना है कि मी टू अभियान यौन शोषण के खिलाफ लंबी मुहिम की शुरुआत भर है. अभियान के पहले चरण में ही पीड़िताओं से इससे ज्यादा अपेक्षा रखना सही नहीं होगा. समाज का व्यवहार पीड़िताओं के प्रति जितना अधिक सहयोगी होगा, उतनी ज्यादा महिलाएं वर्तमान यौन शोषण पर चुप्पी तोड़ेंगी.