पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही है. ये राज्य हैं मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और मिजोरम. इन पांच राज्यों में से कम से कम चार ऐसे हैं जहां के मौजूदा मुख्यमंत्रियों की सत्ता बचाने के लिए न सिर्फ मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी संघर्ष कर रहे हैं, बल्कि उनकी संतानें भी एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं. बाकी बचे एक राज्य में मुख्यमंत्री के बेटा या बेटी तो सक्रिय नहीं हैं, लेकिन भाई और दूसरे रिश्तेदार सत्ता बनाए रखने के लिए सीधा संघर्ष करते दिख रहे हैं.

भारतीय राजनीति में वंशवाद कोई नया नहीं है. इस बार के चुनावों में भी राजनीतिक परिवारों के लोगों को विरासत के आधार पर टिकट देने का काम हर पार्टी ने किया है. चाहे वह भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां हों या फिर तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसे क्षेत्रीय दल. लेकिन मुख्यमंत्री के नातेदारों और रिश्तेदारों की इन चुनावों में राजनीतिक सक्रियता वंशवादी राजनीति की एक नई कहानी कहती है.

मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बतौर मुख्यमंत्री इस बार सबसे कड़े मुकाबले का सामना कर रहे हैं. 2003 में मध्य प्रदेश में भाजपा उमा भारती के नेतृत्व में चुनाव लड़ी थी और उसने कांग्रेस के दिग्विजय सिंह के दस साल के कार्यकाल को खत्म किया था. इसके बाद भाजपा के अंदर चली आंतरिक खींचतान में मुख्यमंत्री की कुर्सी उमा भारती से शुरू होकर बाबू लाल गौर से होते हुए शिवराज सिंह चौहान तक पहुंची. उसके बाद 2008 और 2013 के चुनावों में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा विधानसभा चुनाव जीती.

लेकिन इस बार स्थितियां ऐसी हैं कि शिवराज के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाना बेहद मुश्किल लग रहा है. इस संघर्ष में सरकार और पार्टी के अलावा शिवराज सिंह चौहान का साथ देने के लिए उनके बेटे कार्तिकेय सिंह चौहान भी खासे स​क्रिय दिख रहे हैं. अपने पिता के विधानसभा क्षेत्र बुधनी में तो वे पहले से ही सक्रिय रहे हैं, इस बार वे दूसरे विधानसभा क्षेत्रों में भी जाकर सभाएं कर रहे हैं. बुधनी में शिवराज सिंह चौहान के चुनाव को पूरी तरह कार्तिकेय ही संभाल रहे हैं.

मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र और उसके बाहर भी कार्तिकेय इस बात के लिए लगातार सक्रिय दिख रहे हैं कि उनके पिता की की कुर्सी बची रहे. हाल ही में जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पनामा पेपर्स के संदर्भ में कार्तिकेय का नाम लिया तो कार्तिकेय ने राहुल गांधी पर मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया. मध्य प्रदेश भाजपा की जानकारी रखने वाले कुछ लोगों का तो यह भी दावा है कि अगर एक बार फिर से शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बनने में कामयाब होते हैं तो उनके पुत्र कार्तिकेय अगले लोकसभा चुनावों में भोपाल सीट पर भाजपा उम्मीदवार हो सकते हैं.

राजस्थान

राजस्थान के बारे में सारे चुनावी सर्वेक्षण और अनुमान यही कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लिए इस बार अपनी कुर्सी बचा पाना बहुत मुश्किल है. माना जा रहा है कि राजस्थान की सत्ता इस बार कांग्रेस भाजपा से छीनने जा रही है. इसके बावजूद वसुंधरा सरकार के मंत्रियों और भाजपा के राष्ट्रीय-स्थानीय नेताओं के अलावा मुख्यमंत्री के पुत्र दुष्यंत सिंह पूरे जी-जान से सक्रिय दिख रहे हैं.

45 साल के दुष्यंत सिंह को राजनीति में अब नया नहीं कहा जा सकता. वे झालावाड़ संसदीय क्षेत्र से तीसरी बार सांसद हैं. इस बार के विधानसभा चुनावों के लिए चल रहे प्रचार में कई जगह दुष्यंत सिंह अपनी मां वसुंधरा राजे के साथ दिखते हैं तो कई सभाएं वे अकेले भी कर रहे हैं. राजस्थान के लोग मानते हैं कि वसुंधरा सरकार में भी दुष्यंत सिंह का ठीक-ठाक दखल रहता है. प्रदेश स्तर पर पार्टी के कुछ निर्णयों को भी वे प्रभावित करते हैं. वसुंधरा राजे के विधानसभा क्षेत्र में भी दुष्यंत सिंह ने मोर्चा संभाल रखा है.

दुष्यंत सिंह के अलावा वसुंधरा राजे के लिए चुनाव प्रचार का काम दुष्यंत की पत्नी निहारिका सिंह भी कर रही हैं. निहारिका गुर्जर समाज से हैं और अंदरूनी सूत्रों की मानें तो वसुंधरा राजे और दुष्यंत सिंह को लगता है कि निहारिका सिंह के चुनाव प्रचार करने से इस समाज के मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में लाया जा सकता है. निहारिका के संपर्क कार्यक्रमों में इस समाज के लोग अच्छी संख्या में दिखते भी हैं.

छत्तीसगढ़

रमन सिंह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के तौर पर पिछले 15 साल से काम कर रहे हैं. अगर वे इस बार भी चुनाव जीत जाते हैं तो बतौर मुख्यमंत्री यह उनका चौ​था कार्यकाल होगा. हालांकि, कांग्रेस यह दावा कर रही है कि इस बार छत्तीसगढ़ से रमन सिंह की सरकार जा रही है, लेकिन पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजीत जोगी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी के जरिए छत्तीसगढ़ में जो सियासी त्रिकोण बना है, उसमें अगर अंत में बाजी रमन सिंह के साथ लग जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए.

रमन सिंह को चौथा कार्यकाल दिलाने के लिए इस बार उनके बेटे अभिषेक सिंह खासे सक्रिय दिखे. 37 साल के अभिषेक सिंह 2014 में ही राजनंदगांव से भाजपा के टिकट पर सांसद बन गए थे. इस बार के चुनावों में वे अपने पिता की कुर्सी बचाने के लिए कई सभाएं करते नजर आए. उनके पिता रमन सिंह का विधानसभा क्षेत्र भी राजनंदगांव संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आता है. इस वजह से भी अभिषेक सिंह अपने पिता को चुनावी जीत दिलाने के लिए सक्रिय रहे. अभिषेक की इन चुनावों में सक्रियता का अंदाजा बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रदेश के मीडिया ने उनसे जुड़ी खबरों को प्रमुखता से जगह दी.

तेलंगाना

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) भी इस बार कड़े मुकाबले का सामना कर रहे हैं. 2014 के विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति को बहुमत मिला था. माना जा रहा है कि अब समय से पहले विधानसभा भंग कराके चुनाव कराने का दांव केसीआर को उल्टा भी पड़ सकता है. जिस तरह से कांग्रेस और चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी समेत दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों ने महागठबंधन बनाया है, उसमें केसीआर के लिए दूसरा कार्यकाल हासिल कर पाना मुश्किल दिख रहा है.

यही वजह है कि केसीआर को बतौर मुख्यमंत्री दूसरा कार्यकाल दिलाने के लिए उनके बेटे, बेटी और भतीजे खासे सक्रिय दिख रहे हैं. केसीआर के बेटे केटी रामा राव और भतीजे हरीश राव उनकी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं जबकि उनकी बेटी के कविता निजामाबाद लोकसभा सीट से सांसद हैं.

ये तीनों चंद्रशेखर राव को फिर से मुख्यमंत्री बनाने के लिए चुनाव प्रचार में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं. इन तीनों की कई चुनावी सभाएं लगातार पूरे राज्य में हो रही हैं. हरीश राव के बारे में तो यह भी कहा जाता है कि टिकटों के बंटवारे में भी चंद्रशेखर राव उनकी काफी सुनते हैं. वहीं चंद्रशेखर राव के बेटे केटी रामा राव पार्टी के भविष्य में गठबंधन जैसे रणनीतिक मसलों पर खुलकर बोलते दिखते हैं. चंद्रशेखर राव की बेटी के कविता तेलुगू देशम पार्टी पर लगातार आक्रामक ढंग से हमले करती दिखती हैं. वे चुनावों को तेलंगाना की अस्मिता से जोड़कर अपने पिता के लिए बतौर मुख्यमंत्री दूसरा कार्यकाल हासिल करने की कोशिश करते हुए दिख रही हैं.

मिजोरम

मिजोरम में 28 नवंबर को चुनाव होने हैं. बतौर मुख्यमंत्री कांग्रेस के ललथनहवला का यह पांचवां कार्यकाल है. 78 साल के ललथनहवला छठे कार्यकाल के लिए संघर्ष कर रहे हैं. अगर वे इस बार भी विधायक बनने में कामयाब होते हैं तो यह बतौर विधायक दसवां कार्यकाल होगा. ललथनहवला के दो बेटे और एक बेटी हैं. इनमें से सीधे तौर पर राजनीति में कोई उतना सक्रिय नहीं दिखता. ऐसे में जो काम दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों के लिए उनकी संतानें कर रही हैं, वही काम मिजोरम के मुख्यमंत्री के लिए उनके भाई ललथनजारा करते दिख रहे हैं.

ललथनजारा दो बार से विधायक हैं. वे तीसरी बार विधायक बनने के लिए चुनावी मैदान में हैं. वे मिजोरम की राजनीति में मुख्यमंत्री ललथनहवा की ओर से इस कदर सक्रिय हैं कि वहां बहुत सारे लोग ललथनजारा को ‘डिफैक्टो’ मुख्यमंत्री भी कहते हैं. वे अपने भाई की सरकार में मंत्री भी हैं और मिजोरम फुटबॉल एसोसिएशन के अध्यक्ष भी. एक बार उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से इस्तीफा भी देना पड़ा था लेकिन बाद में वे अपने सरकार में वापस आ गए. कहा तो यह भी जा रहा है कि अगर ललथनहवला एक बार फिर मुख्यमंत्री बने तो हो सकता है वे कुछ समय बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी अपने छोटे भाई ललथनजारा के लिए छोड़ दें.